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पेड़ों को काटने के दुष्परिणाम

पेड़ों को काटना नहीं चाहिए। पेड़ों को काटने का अपराध भी मनुष्य की हत्या करने के समान ही है। पेड़ हमें जीवन प्रदान करते हैं। आज जितनी भी प्रदूषण व पर्यावरण की समस्या पूरे विश्व के सामने है, वह पेड़ों को काटे जाने की वजह से है। हमें जितना भी संभव हो वृक्ष लगाने चाहिए। पेड़ हमें प्राण वायु प्रदान करते हैं, ऊर्जा देते हैं। महाभारत की एक कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपनी मृत्यु के अंतिम क्षण शर-शैय्या पर लेट कर बिताए थे। उल्लेखनीय है कि उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान मिला हुआ था और वे सूर्य के उत्तरायण होने पर ही प्राण त्याग करना चाहते थे, जिसमें अभी देर थी। उतने दिनों तक वे रणभूमि में ही शर-शैय्या पर लेटे रहे। एक दिन उनसे मिलने के लिए भगवान श्रीकृष्ण आए। भीष्म पितामह ने विनम्र भाव से उनसे पूछा कि हे प्रभु, मैंने तो पूरा जीवन सनातन मर्यादाओं का पालन करते हुए धर्माचरण से व्यतीत किया है लेकिन मुझे यह क्यों भोगना पड़ रहा है कि मैं इस शर-शैय्या पर कष्टपूर्वक लेटा हुआ हूं? भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि हे पितामह, आपने एक समय पीपल के पेड़ के पत्ते को अपने बाण की नोक से बींध दिया था जिसके फलस्वरूप आपको यह संताप भोगना पड़ रहा है। पीपल के पेड़ को बींधने मात्र की इतनी बड़ी सजा भीष्म पितामह को भोगनी पड़ी तो वृक्ष को काटने की सजा क्या हो सकती है, वह आप अंदाजा लगा सकते हैं। पेड़ों की सेवा करने और उनका पालन करने से परमात्मा प्रसन्न होते हैं और इनकी दुआएं मिलती हैं। इनको कष्ट पहुंचाने व काटने से ऐसी बदुआएं मिलती हैं कि मनुष्य का जीवन नर्क बन जाता है। 

हमें इन पेड़-पौधों से वे जड़ी-बूटियां प्राप्त होती है जो जीवनदायिनी होती हैं। अब यह दुखद स्थिति है कि जंगल तो नाममात्र के लिए रह गए हैं, पहाड़ों तक पर लोग वृक्षों व पौधों को उजाड़ रहे हैं। अज्ञान के अभाव में हम जड़ी-बूटियों की और औषधीय गुणों वाले पौधों की पहचान नहीं कर पाते और उन्हें नष्ट कर देते हैं। हमारे ऋषि-मुनियों के आश्रमों की भूमि में ऐसे-ऐसे विलक्षण पेड़-पौधे होते थे कि जो तत्क्षण प्रभाव करने वाले औषधीयगुणों से युक्त होते थे। आज की एजुकेशन इस तरह का ज्ञान नहीं देती। साथ ही यह भी बता देना चाहता हूं कि विदेशों के वैज्ञानिकों ने इस ज्ञान को पकड़ लिया है। अब हमारी इन जड़ी-बूटियों का उपयोग वे कर रहे हैं। वह दिन दूर नहीं कि वे इन्हें अपना पेटेंट भी करा लें। हमें समय आते जाग जाना चाहिए। जो आयुर्वेद हमारी धरोहर है अब उपयोग दूसरे देश कर रहे हैं।

-प्रभु कृपा पत्रिका, जनवरी, 2019

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