Jagadguru MahaBrahmrishi Shree Kumar Swami ji

Author name: Team - Mahabrahmrishi Shree Kumar Swami Ji

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ब्रह्मर्षि कुमार स्वामी हो गए ‘महाब्रह्मर्षि’ !!

महाब्रह्मर्षि‘ यह पद कैसे निष्पन्न होता है, इसका शास्त्रों में उद्धृत प्रमाण के आलोक में चिंतन करते हैं-‘महाब्रह्मर्षि’ में तीन शब्द (पद) हैं-महा (महत्) + ब्रह्म+ ऋषि। इस पर प्रतिशब्द की शास्त्रीय व्याख्या करते हैं- महा-‘मह्यते पूज्यते असौ इति-महान् ‘महपूजायां’ धातु से उणादि सूत्र ‘वर्त्तमाने पृष-महज्जच्शतृवच्च’ (उणा. 2/84) से अति निपातित होता है-शत् प्रत्यय के पश्चात्, नुम्, दीर्घ आदि होकर महान् (पु.) महत् (नपुं क्तिङ में सिद्ध होता है यह शब्द बृहत् का द्योतक है अर्थात् बृहत्वात् ब्रह्म उच्यते जो व्यापक है, वही महान अर्थात ब्रह्म है। और भी निघण्टुकार कहते हैं- ‘श्रुतेन श्रोत्रियो भवति तपसा विन्दते महत्’ अर्थात् वेदादि का श्रवण करने से श्रोत्रिय होता है तथा तप-साधना के द्वारा महत को प्राप्त करता है। ‘महा’ महती साधना-तपस्या का बोधक है। ब्रह्म-‘बृहंति वर्धते-निरतिश। महत्व-लक्षण बुद्धिमान भवति’ ‘बृहि बृद्धौ’ धातु से – ‘ बृहे नोंऽच्च’ (उणा. 4/145) से ‘मनिन्’ प्रत्यय तथा नकार को अकार तथा रत्व होकर ब्रह्म सिद्ध होता है। ब्रह्म का अर्थ वेद भी होता है। ‘तस्मात् एतद् ब्रह्म-नामरूपमन्त्रञ्च जायत-अर्थात् यही ब्रह्म नाम-रूप तथा अन्न के रूप में आविर्भूत होता है। श्रीमद्भागवत में ‘ब्रह्म पद से’ तेने ब्रह्म हृदा। आदि कवये हृदा = मनसा मन से आदिकवि=ब्रह्मा जी के लिये वेद का विस्तार किया। वेदान्त मत में-वस्तु सच्चिदानन्दाद्वय ब्रह्म अर्थात् सत्-चित् तथा आनन्द रूप ही अद्वैत रूप से ब्रह्म है। ‘ब्रह्मैव नित्यं वस्तु तदन्यदखिलमनित्यम्’ अर्थात् ब्रह्म ही नित्यवस्तु है, अन्य जितने भी जागतिक पदार्थ हैं वे सभी अनित्य हैं। और भी ब्रह्म के विषय में कहा गया-‘ आकाशवत् सर्वगतश्च नित्यः। अजो नित्यः शाश्वतः ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, रातेर्दातुः परायणं यत्र नान्यत् पश्यति, नान्यत् श्रृणोति, नान्यत् विजानाति सभूमा यो वै भूमा तदमृतम्। अर्थात् ब्रह्म आकाश की तरह सर्व व्यापक है तथा नित्य है। अज, शाश्वत है, सत्य रूप ज्ञान स्वरूप, अनंत सत्तात्मक ब्रह्म है। जो उस ब्रह्म के अतिरिक्त न देखता है, न सुनता है तथा न जानकारी करने का प्रयास करता है, वह भी भूमा है। जो भूमा है उसी से मुक्ति है। इत्यादि श्रुतियों के अनुसार नित्य, शुद्ध, मुक्त परमात्मा ही है। शास्त्रों में कहा गया है- ‘आनन्दो ब्रह्म व्यजानात् आनन्दरूपममृतं पदं विभाति- ब्रह्म का स्वरूप आनंद है आनंद ही अमृत अर्थात् मुक्ति है।’ ‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। यतो वा इमानि-भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तत् विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्मेति । अर्थात् जहां वाणी मन के साथ मौन हो जाती है। जिससे सभी भूतों की उत्पत्ति होती है जिससे स्थिति है तथा जिसमें प्रविष्ट होते हैं यही ब्रह्म है। भगवान शिव कहते हैं-देह आदि माया के सभी कार्यों को मरुमरीचिका समान असत् जानना चाहिए। जीवात्मा स्वरूपतः ब्रहा है। किंतु माया के प्रभाव से वह स्वयं को अलग मानता है। ज्ञानी माया के चपेट में नहीं आता है। उसे अपने स्वरूप का बोध होता है। ऐसा ब्रह्मविद् महापुरुष ब्रह्म स्वरूप होता है। ऋषि-‘ऋषति प्राप्नोति सर्वान् मंत्रान् ज्ञानेन पश्यति संसारपारं वा इति। ‘ऋष प्राप्तौ’ धातु से ‘इगुपधात् कित’ (उणा. 41/19) इस उणादि सूत्र से इन्. होकर ऋषि शब्द सिद्ध होता है। जिसका अर्थ-मंत्रों को प्राप्त करे, अथवा ज्ञान व मंत्रों के द्वारा संसार से पार का दर्शन करने वाला ऋषि होता है। ‘अग्निः पूर्वभिः ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत स देवा एह वक्ष्यति’। (ऋग्वेद-1/1/2) वह परमात्मा पूर्व ऋषियों के द्वारा स्तुत्य है। ‘विद्याविदग्धमतयो रिषयः प्रसिद्धाः’ विद्या में निपुण बुद्धि वाले ऋषि प्रसिद्ध हैं और भी ‘ऋषयो मंत्रदृष्टार:’ ऋषि वही है जिसने मंत्रों का साक्षात्कार कर लिया है। तात्पर्य है कि महा+ब्रह्म ऋषि वही है जो संपूर्ण विश्व में पूजित-सम्मानित है, जिसकी दृष्टि व्यापक है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ संपूर्ण पृथ्वी और चराचर जगत को जो अपना परिवार मानता है तथा ब्रह्म के अतिरिक्त संसार का जो वास्तविक दर्शन कर लेता है अर्थात् ‘सीयराम मय सब जग जानी’ ब्रह्ममय जगत का दर्शन करने वाले। मंत्रों को प्राप्त अर्थात् साक्षात्कार करने वाले ही ऋषि हैं। अर्थात् सम्मानित-ब्रह्मविद्-मंत्रदृष्टा ही महाब्रह्मर्षि है। काशी विद्वत परिषद के ऋषियों व महनीय विद्वानों ने आपकी जगत् प्रसिद्धि देश-विदेश में अनेक शीर्षस्थ राष्ट्रपति आदि से सम्मानित साधु समाज में अतिप्रतिष्ठित, जीवमात्र के सुख-दुख, मान-अपमान, लाभ-हानि, काम-क्रोध लोभ से ग्रस्त लोगों के कल्याण हेतु सदा तत्पर ऐसे पूज्य श्री सद्‌गुरुदेव जी को इस महान् पद से समलंकृत किया। ऐसे ‘महाब्रह्मर्षि’ को हम कोटि-कोटि वंदन करते हैं। ‘महाब्रह्मर्षि‘ महामंत्र है, महावाक्य है। ‘महाब्रह्मर्षि’ ही साक्षात ब्रह्म, परमात्मा, मां दुर्गा, भगवान शिव, भगवान श्रीराम व भगवान श्रीकृष्ण हैं। ब्रह्म का जाप करते-करते व्यक्ति ब्रह्म रूप हो जाता है। इसका प्रतिदिन पाठ, जाप, पूजन, मनन, मंथन, चिंतन करके शास्त्रों, वेदों, ग्रंथों से पार सभी ब्रह्ममय हो जाते हैं। जो कष्ट में हैं, दुखों में हैं, परेशान हैं, भगवान को पाना चाहते हैं, इसके जाप से वे मुक्त हो जाते हैं, ऐसा वेद में वर्णित है। ‘महाब्रह्मर्षि’ का जाप 7 हजार करोड़ मंत्रों में सबसे श्रेष्ठ है। इसके जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता। इसे गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखते हुए गुप्त रखना अति आवश्यक है। डा. दिनेश कुमार गर्गकोषाध्यक्ष एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता, काशी विद्वत परिषद, वाराणसी

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Episode 5: दिव्य भारत भूमि के परिवेश को छोड़ने से आते हैं रोग 

00:00:02 एक पत्र हमारे पास आया है ऑस्ट्रेलिया से मिस्टर कुलवीर सिंह भौरिया जी का और ये जानना चाहते है कि इनको क्या-क्या रोग हैं? 00:00:09 जब यह बचपन में थे कोई 5-6 साल की अवस्था में, तब ये गिर गए थे । उस चोट के कारण इनके गर्दन के हिस्से में, बैक के हिस्से में काफ़ी दर्द होता है । 00:00:24 इसे स्नायु शोध भी कहते हैं, नाड़ी शोध भी कहते हैं, नाड़ी प्रदाह इन्हे हो गया है । तो इन्हें इतना दर्द होता है कि कभी-कभी ये पीड़ा असहनीय हो जाती है । 00:00:38 इसका चिकित्सा, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में कोई निदान नहीं है, कोई डायग्नोज़ नहीं है। एम आर आई भी करेंगे, तो उसमें इतना 00:00:48 क्योंकि जो है ये कैट स्कैन है या एम् आर आई है या इतने टेस्ट है ऑस्ट्रेलिया में तो और भी अच्छे टेस्ट हैं। लेकिन ये सूक्ष्म नाड़ी प्रदाह है। 00:00:57 इसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान कोई भी पकड़ नहीं पाता। तो ये दर्द की कोई भी औषधि लेंगे? 00:01:04 थोड़ी समय के लिए उनको आराम मिलेगा। लेकिन वो जो दवाईयाँ है दर्द वाली वो सभी मस्तिष्क पर प्रभाव करती है, उससे इनके मस्तिष्क में तनाव आ जाएगा। उसके ये हैबिचुअल हो जाएंगे तो ये काफी समय से उसकी दवाई ले रहे हैं। 00:01:20 उस मेडिसिन के साइड इफेक्ट भी है, उससे एसिडिटी भी होती है, इनडाइजेस्शन भी होता है। उनसे पेप्टिक अल्सर होने की भी संभावना है। 00:01:28 तो इसका आधुनिक विज्ञान में, चिकित्सा जगत में कोई इलाज नहीं है, डाइग्नोस भी नहीं है पूरा क्योंकि पीड़ा से परेशान हो जाते हैं । 00:01:36 तो जो मैं इन्हें औषधि बताऊँगा प्रभु की कृपा से इन्हें थोड़े दिनों में ही आराम मिलेगा ।औषधि लेकर ये अपने चिकित्सक से राय भी लेते रहें और प्रभु की कृपा से ये ठीक हो जाएंगे । 00:01:48 एक तो डोडा-पोस्त, अश्वगंध, सुरंजन, विधारा की जड़, नागरमोथा, कुलंजना, दारुहरिद्रा और गूगल। 00:02:05 सभी को 20-20 ग्राम की मात्रा में लेकर कूटलें और उसके अंदर आधा ग्राम स्वर्ण भस्म और वज्र भस्म मिलाकर, छानकर 00:02:17 और छेह ग्राम की मात्रा में सुबह शाम प्रयोग करें। तो तीन माह के प्रयोग से ही ये रोग से पूर्ण मुक्ति प्राप्त करेंगे। इनको आराम एक माह में ही आ जाएगा। 00:02:28 और उसके बाद ये अपने चिकित्सक से राय भी लें तो ये दर्द इन्हें काफ़ी समय से काफ़ी सालों से परेशान करता है। 00:02:36 और ये तीन माह में ही पूर्ण रूप से रोग से मुक्ति प्राप्त करेंगे। उसके बाद अपने चिकित्सकों की भी राय ले और चिकित्सकों को भी दिखा दें कि आयुर्वेद ऐसा विज्ञान है जिससे आप भी लाभ उठा सकते हैं। 00:02:49 और पूरा जगत भी लाभ उठा सकता है क्योंकि भारत की जो दिव्य औषधियाँ हैं इन औषधियों में ऋषि मुनियों का जो 00:02:57 तप है, जो साधना है, जो ध्यान है वो भी कार्य करता है, दिव्य औषधियाँ भी कार्य करती हैं । जैसे ये वास्तविक सत्य है कि भारत भूमि जो है वो दिव्यशक्तियों का, दिव्य औषधियों का एक बहुत बड़ा केंद्र रहा है तो इस भारत भूमि के दिव्य परिवेश से ये विदेशों में गए, तो क्या इस तरह से जो लोग जाते है क्या उनको किसी तरह के रोग होते हैं? 00:03:20 आप कभी अगर विदेशों में जाएंगे देखेंगे ऑस्ट्रेलिया में, अमेरिका में, कनाडा में, यूरोप में तो आपको वहाँ बड़े अच्छे-अच्छे सुन्दर फूल मिलेंगे 00:03:33 इतने सुंदर फूल बड़े-बड़े मिलेंगे जो भारत की भूमि पर नहीं मिलेंगे। लेकिन उन फूलों में सुगंध नहीं है। सुगंध जो भारत की भूमि के फूलों की है वो विश्व में कहीं भी नहीं है। 00:03:48 सब्जियाँ आपको बड़ी सुन्दर मिलेंगी, फल आपको बड़े-बड़े मिलेंगे। आम आपको बहुत बड़े-बड़े मिलेंगे, लेकिन जो आमों का स्वाद भारत की भूमि पर है, भारत की धरती पे है। 00:03:59 ये इसलिए नहीं है कि यह भारत हमारा है, हम इसलिए बोल रहे है । इसलिए कह रहे हैं कि भारत भूमि तपों से भरी हुई है, ऋषियों की तपो से भरी हुई है। 00:04:09 तो ऐसे जब आप ऑस्ट्रेलिया में जाएंगे तो पुरुष बड़े सुंदर मिलेंगे? उनकी हाइट लंबी होगी, स्वस्थ आपको देखने में अच्छे लगेंगे। 00:04:19 लेकिन उनके शरीर में कैल्शियम की कमी होगी विटामिन ए कमी होगी। विटामिन ई की कमी होगी क्योंकि वहाँ का जो वातावरण है 00:04:28 वो मेडिकल के हिसाब से शुद्ध है। वहाँ प्रदूषण नहीं है। अगर आप कुछ श्वेत कपड़ा भी पहनेंगे तो 8-10 दिन मैला नहीं होता। भारत की धरती पर वो दूसरे दिन ही मैला हो जाएगा। 00:04:43 इतनी वहाँ सफाई होने के बाद भी जो रोग निरोधक शक्तियाँ हैं वहाँ वो कम है। और वहाँ इतनी चिकित्सा विज्ञान फैला हुआ है, वहाँ लोगों को इतने रोग है, इतनी पीड़ाएँ हैं, इतने कष्ट हैं कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि ऐसे रोग भी होते हैं क्योंकि वहाँ की धरती पे 00:05:03 कोई भी व्यक्ति, वहाँ 100 में से 90% से जो व्यक्ति है वो स्वस्थ नहीं हैं लेकिन देखने में सुन्दर हैं जैसे फूल देखने में सुन्दर है, सब्जियाँ वहाँ देखने में सुंदर है लेकिन जो स्वाद भारत की सब्जियों में है, भारत भूमि की सब्जियों में है वो आपको वहा विदेशों में नहीं मिलेगा। 00:05:21 ऐसे जो भारतीय लोग वहाँ गए हैं, उन्हें धन तो मिल जाएगा। मकान उनके सुंदर होंगे, स्वस्थ देखने में अच्छा लगेगा, कारें अच्छी होंगी, उनके पास साधन संपन्न होंगे। किसी चीज़ की भी आवश्यकता है उन्हें शीघ्रता से वो ले लेंगे। कोई ज्यादा परेशानी नहीं उठानी पड़ेगी। मानसिक तनाव नहीं होगा, लेकिन जो हृदय की शांति है वो वहाँ नहीं मिलेगी। वहाँ मानसिक शांति के लिए भी क्लब का सहारा लेना पड़ेगा, पब का वहाँ लेना पड़ेगा, शराब का सहारा लेना पड़ेगा, बीयर का सहारा लेना पड़ेगा, नशे की वस्तुओं का सहारा 00:05:54 लेना पड़ेगा। क्योंकि वहाँ का जो वायुमंडल है उसमें दिव्य शक्तियाँ, जो दिव्यता है वहाँ नहीं है, सफाई है, सुंदरता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जो वहाँ की धरती है, वहाँ के लोगों के लिए यह भारत की धरती, उनको शायद देखने में अच्छी नहीं लगेगी क्योंकि यहाँ सफाई नहीं है। जैसा होना चाहिए, वह नहीं है, लेकिन जो यहाँ एक शक्ति है, पुरुषों के अंदर जो एक सुगंध है, जो एक आभा है, जो एक दिव्यता है, वो वहाँ नहीं है, वो आँखों से नज़र नहीं आता। माइक्रोस्कोप से 00:06:26 नज़र नहीं आता। किसी मशीन के अंदर आता नहीं है क्योंकि वहाँ के जो लोग हैं उसी चीज़ को सत्य मानेंगे जो उनकी मशीनें बोलेगी, जो उनके इंस्ट्रूमेंट

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Episode 4: निष्काम भक्ति से कैसे होती है रोग मुक्ति

00:00:09 – परम पूज्य महाब्रह्मर्षि श्री कुमार स्वामी जी नामक कल्पवृक्ष ने भारत में ही नहीं पूरे विश्व को अपनी कृपाओं से कृतार्थ किया। वेदों के शास्त्रोक्त बीज मंत्रों के प्रभाव को देश विदेश के बुद्धिजीवियों ने भी स्वीकारा । 2 मई 2011 को यूएस के न्यूयॉर्क सीनेट ने निर्विरोध प्रस्ताव पारित करके परम पूज्य महाब्रह्मर्षि श्री कुमार स्वामी जी को सम्मानित किया। 00:00:43 – नासाउ काउंटी के असेंबली हॉल में आयोजित एक भव्य समारोह में सीनेट में निर्विरोध प्रस्ताव पारित करके 29 अप्रैल को ब्रह्मऋषि श्री कुमार स्वामी जी डे घोषित किया गया। इस प्रकार देश विदेशों की सांसदों ने कृतज्ञ भाव से अनेकों पुरस्कार ऐंजल ऑफ ह्यूमैनिटी, प्राइड ऑफ वर्ल्ड, हैपिनेस हेल्थ ऐंड पीस एंबेसडर अवार्ड इत्यादि से सम्मानित किया। विश्व के शक्तिशाली देशों ने अंततः बीज मंत्रों की सनातन शक्ति को स्वीकार कर ही लिया। 00:01:20 – परम पूज्य महाब्रह्मर्षि श्री कुमार स्वामी जी केवल अध्यात्म से ही नहीं, वरन दैवव्यापश्रय चिकित्सा और अभिमंत्रित औषधियों से भी असाध्य रोगों का निवारण करते हैं जिसका आधुनिक मेडिकल साइंस के पास कोई इलाज नहीं है। परम पूज्य महाब्रह्मर्षि श्री कुमार स्वामी जी को लोगों के चित्र देखकर रोग विश्लेषण एवं उनके समाधान हेतु ऑल इंडिया हकीम अजमल खान अवॉर्ड और बेस्ट आयुर्वेदिक फिजिशन अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया। 00:02:03 – यह आश्चर्यजनक अद्भुत सत्य है कि केवल चित्र देखकर रोगों और समस्याओं के विषय में न केवल बताना बल्कि सहज सरल साक्षात समाधान करना। वर्ष 2002 में आस्था चैनल पर  प्रसारित कार्यक्रम आयुर्विज्ञान के रहस्य में महाब्रह्मर्षि श्री कुमार स्वामी जी ने 21 वर्ष पहले ऐसा प्रत्यक्ष करके पूरे विश्व को आश्चर्यचकित किया था। यह कार्यक्रम उस समय सबसे अधिक लोकप्रिय कार्यक्रमों में  00:02:34 – एक कार्यक्रम माना गया था। आपकी बारम्बार की माँग पर इस कार्यक्रम के मुख्य अंश यूट्यूब में प्रसारित किए जा रहे हैं। 00:02:46 – ये पत्र हमारे पास आया है, दिल्ली से हैं नीना मल्होत्रा जी का तो इन्होंने अपनी तस्वीर भेजी है, आप बताए इनकी क्या-क्या शारीरिक समस्या है? 00:02:58 – एक तो इन्हें इनकी बॉडी में आयोडीन की कमी है । 00:03:03 – इनके जो आँखों का हिस्सा है उसमें कालापन अधिक रहता है और इनकी हड्डियों के हिस्से में भी कमज़ोरी है क्योंकि इनके जो हिप्स के हिस्से हैं इनकी फोटो में तो सिर्फ इनका चेहरा नज़र आ रहा है लेकिन उनका जो हिप्स का हिस्सा है वो ज्यादा हैवी है क्योंकि यह एक्सरसाइज भी करते हैं, डाइटिंग भी करते हैं तब भी वो हिस्सा कम नहीं होता और इन्हें हार्मोन का भी इम्बैलेंस है। हार्मोन्स की भी, क्योंकि इनकी माता को ये रोग है । माता से इनको मिला हुआ है। 00:03:32 – और पेट इनका काफी समय से साफ नहीं है और श्रम क्रिटिनाइन और प्रोटीन ये जरूर टेस्ट करा लें और T3, T4, Tsh भी ये टेस्ट करा लें और कम्पलीट हैमोग्राम भी ये टेस्ट करा लें । उसमें भी उनको प्रॉब्लम है । कुछ मैं इन्हें औषधि, एक तो इनको माइग्रेन है दर्द इनको काफ़ी रहता है और ये सोचते बहुत हैं जब ये किसी चीज़ के बारे में सोचते हैं फिर उसी के बारे में सोचते ही रहते हैं और कभी-कभी ये ज्यादा मात्रा में खा लेते हैं। कभी-कभी ये खाते भी नहीं है और पेट भी इनका पूरा साफ नहीं होता और लिवर भी इनका बढ़ा हुआ है और जो मैं इन्हें औषधि बताऊँगा तो प्रभु कृपा से ये ठीक हो जाएंगे। इनका दर्द भी ठीक हो जाएगा। इनकी टेंशन भी ठीक हो जाएगी। 00:04:12 – और ये जो सोचते हैं, बार-बार सोचते हैं इनका सिर बड़ा भारी रहता है, उससे भी ठीक हो जाएगा और इन्हें सायनोसिस भी प्रारंभ हो चुका है क्योंकि इनके फादर को ये सायनोसिस का रोग है। ये इनको इनके फादर से मिला है और ये इनके जो हिप्स का हिस्सा हेवी है और कभी-कभी इनके पैरों में दर्द होता है। ये रोग इनकी मदर ने इनको गिफ्ट में दिया है तो दोनों का इलाज में इनको बता रहा हूँ कि दोनों के रोगों से मुक्ति मिलेंगे। एक तो भिंडी के बीज, एक तरबूज के बीज, एक सीताफल के बीज, एक मैनमेस के बीज और एक 00:04:49 – तोरी के बीज, इन सभी को ये छाया में सुखा लें। धूप में न सुखाये, छाया में सुखाने के बाद इनको ये पीस लें और पीसने के बाद शहद में पोदीने का रस और अलसी का  00:05:03 – थोड़ा सा प्रयोग कर दें। एक ग्राम का प्रयोग कर दें तो इनको मिक्स करके ये बोतल में डाल के रख लेंगे तो उसका आधा चम्मच ये सुबह-शाम प्रयोग करें तो तीन चार मंथ में ये रोग से भी मुक्त हो जाएंगे। और इन्हें किसी प्रकार का अवसाद भी नहीं होगा और ये हमेशा प्रसन्न, देखने में अच्छे लगते हैं। लेकिन ये हमेशा उदास फील करते हैं। इनके अंदर इन्फीरिओरिटी कॉम्प्लेक्स बड़ी है। ये सोचते हैं कि मैं ये कर पाऊंगी या नहीं कर पाऊंगी? कई बार ये 00:05:29 – करने में समर्थ होते हुए भी ये जो इनकी मानसिक तनाव है ये उन्हें इस कार्य में असफलता दे देता, ये सफल नहीं हो पाती तो इससे उस रोग से भी उन्हें मुक्ति मिल जाएगी तो प्रभु की कृपा से ये ठीक हो जाएंगे। अगर देखा जाए 99% प्रतिशत लोग रोगी हैं कलयुग का प्रभाव, लेकिन हम कलयुग में एक बात देख रहे हैं कि धर्म जो है वो बढ़ रहा है। क्या ये बात सही है कि धर्म में लोगों की आस्था बढ़ रही है? 00:05:55 – ऐसा है ये किसी हद तक सही भी है और किसी हद तक ये सही होने का आभास भी देता है 00:06:07 – जैसे आप आपके घर में गाय है आप गाय की बड़ी सेवा कर रहे हैं। और जो भी उन्हें अच्छे पदार्थ खाने के लिए देते हैं। 00:06:19 – लेकिन उसके पीछे आपको पता है कि यह ये मैं इन्हें अच्छे पदार्थ खिला रहा हूँ इसका कारण है कि मैं अच्छा दूध प्राप्त करूँ। 00:06:27 – अच्छा दूध मुझे मिले। तो वो गाय की सेवा नहीं है। वो आपका एक कर्म है, वो आपका एक व्यापार है, वो आपके एक साधन है। 00:06:38 – जो लोग आध्यात्मिक रूप से आज भक्ति कर रहे हैं उनके पीछे एक तो भय है क्योंकि उन्हें पता है कि समाज में जो रोग फैल रहे हैं, उनका चिकित्सा विज्ञान के पास कोई इलाज नहीं है। 00:06:54 – और वो अपनी तरफ से बुरे कर्म भी

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Episode 3: जीवन ऊर्जा और रोगों का संबंध

00:00:36 – यह आश्चर्यजनक अद्भुत सत्य है कि केवल चित्र देखकर रोगों और समस्याओं के विषय में न केवल बताना बल्कि सहज सरल साक्षात समाधान करना। वर्ष 2002 में आस्था चैनल पर  प्रसारित कार्यक्रम आयुर्विज्ञान के रहस्य में महाब्रह्मर्षि श्री कुमार स्वामी जी ने 21 वर्ष पहले ऐसा प्रत्यक्ष करके पूरे विश्व को आश्चर्यचकित किया था। यह कार्यक्रम उस समय सबसे अधिक  00:01:08 – लोकप्रिय कार्यक्रमों में एक कार्यक्रम माना गया था। आपकी बारम्बार की माँग पर इस कार्यक्रम के मुख्य अंश यूट्यूब में प्रसारित किए जा रहे हैं। 00:01:22 – ये हमारे पास फोटोग्राफ आयी है मिस्टर पंकज की, तस्वीर देखकर आप बताए की कौन कौन से रोग हो सकते हैं ? 00:01:29 – मिस्टर पंकज की फैमिली में इसको अपस्मार है और इन्हें प्रारंभिक अवस्था में वह प्रारंभ हो चुका है 00:01:38 – और इन्हें मानसिक अवसाद भी काफी रहता है, काफी सोचते हैं, काफी विचारते हैं ये और इनके कभी राइट पैर के हिस्से में 00:01:47 – एक नाड़ी है, उसमें शोथ है, उसमें स्वेलिंग है, उसका ब्रेन से दिमाग से सीधा लिंक है इनके सिर में कभी-कभी काफी दर्द होता है और उस समय उनके पैर के हिस्से में भी वो उसका वो कारण बनता है और इनका पेट काफी समय से साफ नहीं है क्योंकि इनके पिता जी को भी कब्ज का रोग है। इन्हें कब्ज भी नहीं है लेकिन इनका पेट काफी समय से साफ नहीं होता और जब ये बाल्य अवस्था में थे उस समय इन्हें टायफॉईड जब हुआ था तो टाइफाइड के समय में इन्हें टाइफाइड का उपचार नहीं किया था। इन्हें वो बुखार कम से कम तीन-चार मंथ तक लगातार रहा था। उसके बाद से इनके मस्तिष्क में है वो शोथ वरण प्रारंभ हो चुका है। 00:02:28 – तो इनका जो उपचार मैं बताऊँगा उससे वो उनका जो वरण शोथ है वो भी समाप्त हो जाएगा और इनको हर छः महीने में या तीन-चार महीने में एक बार बुखार अवश्य आएगा । उसका कारण है कि इनकी प्लीहा बढ़ी हुई है। उसी समय से इनकी प्लीहा बढ़ी हुई है तो इससे वो रोग भी इनका ठीक हो जाएगा । इनको बार-बार बुखार भी नहीं होगा। एक तो ये जितना हो सके काली मिर्च, बड़ी इलायची, छोटी इलायची, नागरमोथा, 00:02:56 – और सुरंजना के पत्ते और बेरी के पत्ते । यह सभी को मिलाकर उसे सुखालें पहले फिर उसको कूट-पीस लें और गाय के कच्चे दूध के साथ और शहद के साथ दोनों मिला लें। गाय का दूध और उसमें एक चम्मच शहद मिलाकर उसके साथ ही आधा चम्मच सुबह-शाम खाएं तो ये इनका रोग भी ठीक हो जाएगा। इन्हें जो बार-बार बुखार होता है वो भी ठीक हो जाएगा और ये जो मूर्च्छा का इन्हें कभी-कभी हो जाता है वो भी समाप्त हो जाएगा। 00:03:23 – मैं यह अनुभव अपने पति के बारे में बताना चाहती हूँ। मेरे पति जब 2 साल के थे तब से उनके दौरे पड़ते थे तभी से वो दवाई खा रहे थे। थोड़े बहुत झटके उन्हें कभी-कभी लगते थे। पर पिछली तीन तारिक को रविवार को उन्हें तीन-चार दौरे इकट्ठे पड़े। सुबह के टाइम जब उन्हें 4:30 बजे दौरा पड़ा तो उन्होंने कहा कि मेरा हाथ सुन हो गया। मैं मन ही मन बीज मंत्रों का जाप करती रही तो थोड़ी देर में उन्हें होश आया और उन्होंने कहा की मेरा हाथ ठीक है। 00:04:00 – मैं एक चर्चा आपसे करना चाहुँगा। जैसे विद्वानों का मत है कि जीवन ऊर्जा का बहुत अहम स्थान मानते हैं तो जीवन ऊर्जा का महत्त्व है क्या ? जीवन है या शरीर है या संसार है 00:04:14 – वो अगर उसको गहराई से वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, अध्यात्मिक दृष्टिकोण से, वास्तविकता से देखा जाए 00:04:24 – तो ये जगत ऊर्जा के अलावा और कुछ भी नहीं है। हमें जो दृश्य नज़र आ रहे हैं रंग नज़र आ रहे हैं। ये भी अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से या माइक्रोस्कोप से अगर हम अपने हाथ को भी देखेंगे जैसे दूध है या दही है। अगर आप दही को माइक्रोस्कोप से देखेंगे तो वहाँ आपको दही नाम की वस्तु नजर नहीं आएगी, वहाँ आपको जीवाणु ही नज़र आएँगे, जीवाणु चलते हुए। 00:04:48 – और सूक्ष्म दृष्टि से माइक्रोस्कोप से देखा जाए तो फिर वो ऊर्जा नजर आएगी, ऊर्जा प्रतीत होगी। अभी हमें ये देखने में हमारे हाथ नज़र आ रहे हैं। अगर इन्हें सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए जिसके काफी पॉवरफुल लेन्स हों तो हमें हाथ नज़र नहीं आएगा कुछ जीवाणु चलते हुए नजर आएँगे। 00:05:08 – और भी सूक्ष्म माइक्रोस्कोप से देखा जाए तो ये हमें ऊर्जा नज़र आएगी। 00:05:14 – तो जो भी जगत में नजर आ रहा है ऊर्जा का ही रूप है। ऊर्जा के अलावा और कुछ भी नहीं। 00:05:21 – जो हमे, हमारी दृष्टि को, हमारी आँखों को जो नज़र आ रहा है वह वास्तव में उतना ही नज़र आ रहा है जैसे कि आकाश है। हमें नीला नज़र आता है। ये नीला का मतलब है कि हमारी आँखें इससे ज्यादा देख नहीं सकती। इसलिए अमीन नीला, नीला नज़र आता है। अगर हम इतना दूर और चले जाये तभी ये नीलापन ये ऐसे ही फैलता रहेगा। इतना ही रहेगा। 00:05:42 – तो ये जगत जितना भी है ये ऊर्जाओं का समूह है। ऊर्जाओं का विघटन है, ऊर्जाओं का समन्वय है, ऊर्जाओं का मिलन है, ऊर्जा का आना है, ऊर्जाओं का जाना है। 00:05:54 – तो हमारा जो शरीर है, जो भी ब्रह्मांड में जो-जो प्रतीत होता है वो सारा कुछ हमारे शरीर के अंदर है तो मूल रूप से वैज्ञानिकों ने जैसे एक माना है। अगर ऊर्जाओं को भी आप सूक्ष्म से देखते जाओ तो फिर अंतिम मैं आपको एक तत्व मिलेगा जिसे तोड़ा नहीं जा सकता, जिसे जोड़ा नहीं जा सकता, जिसे जलाया नहीं जा सकता, जिसे किसी तरह से नष्ट नहीं किया जा सकता। वो एक तत्व है जिससे वहाँ ऊर्जा भी आकर जिसका कुछ नहीं करेगी क्योंकि वो ऊर्जा का निर्माण करने वाला तत्व है, उसे ही ऋषि मुनियों ने परमात्म तत्व कहा है, ब्रह्म कहा है। 00:06:33 – अपना अस्तित्व कहा है जो उस तत्व को जान लेता है वो सारे तत्वों को जान लेता है तो उस एक तत्व से तीन की उत्पत्ति हुई है। उसी को ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहा गया है। उसके बाद अलग-अलग तत्वों की उत्पत्ति हुई है। उन तत्वों के बाद फिर ऊर्जा का विकास हुआ है तो हमारे

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Episode 2: Muscular dystrophy का आयुर्वेदिक उपचार

00:00:36 – यह आश्चर्यजनक अद्भुत सत्य है कि केवल चित्र देखकर रोगों और समस्याओं के विषय में न केवल बताना बल्कि सहज सरल साक्षात समाधान करना। वर्ष 2002 में आस्था चैनल पर  प्रसारित कार्यक्रम आयुर्विज्ञान के रहस्य में महाब्रह्मर्षि श्री कुमार स्वामी जी ने 21 वर्ष पहले ऐसा प्रत्यक्ष करके पूरे विश्व को आश्चर्यचकित किया था। यह कार्यक्रम उस समय सबसे अधिक 00:01:08 – लोकप्रिय कार्यक्रमों में एक कार्यक्रम माना गया था। आपकी बारम्बार की मांग पर इस कार्यक्रम के मुख्य अंश यूट्यूब में प्रसारित किए जा रहे हैं। 00:01:22 – परम पूज्य गुरुदेव ये पत्र हमारे पास आया है शिमला से महेंद्र चौहान जी का और उन्होंने अपने पत्र में उल्लेख किया है। मैं एक ऐसे रोग का शिकार हूँ कि हालत इतनी खराब हो चुकी है कि अब मैं ठीक से चल भी नहीं सकता। 00:01:35 – देशी विदेशी बहुत इलाज करवाए हैं, लेकिन अभी तक कोई भी फायदा नहीं हुआ है। पीजीआइ चंडीगढ़ के डॉक्टर ने तो साफ कह दिया है इस बिमारी का इलाज अभी तक कहीं भी बना ही नहीं है । परम पूज्य गुरुदेव मैं 00:01:49– इनकी तस्वीर आपके चरणों में अर्पित कर रहा हूँ और जो गंभीर स्थिति है उस पर आप कृपा करें। 00:02:02 – जो आपने अपना चित्र व पत्र भेजा है आप नि:संदेह ऐसे रोग से ग्रस्त हैं 00:02:11 – जिसका इस पृथ्वी पर कोई भी इलाज संभव नहीं है 00:02:18 – आपको जो आपके चिकित्सकों ने या पीजीआई के चंडीगढ़ के जो डॉक्टरों ने या जिन-जिन भी 00:02:30 – विशेषज्ञों ने आपको बताया है कि इसका कोई इलाज नहीं है। 00:02:35 – वास्तव में उन्होंने आपको सत्य बताया है, ठीक ही बताया है। 00:02:39 – क्योंकि ऐलोपैथिक विज्ञान में 00:02:42 – आधुनिक विज्ञान में इस बिमारी का कोई भी इलाज नहीं है जो रोग है ये धीरे-धीरे शरीर को 00:02:52 – सूखता जाता है समाप्त करता रहता है, शरीर को मृत करता जाता है। 00:02:59 – इसे मस्कुलर डिस्ट्रॉफी कहते हैं। 00:03:03 – जिसका अभी पृथ्वी पर कोई भी इलाज संभव नहीं है। 00:03:07 – विश्व के किसी भी कोने में किसी भी चिकित्सक के द्वारा इसका इलाज नहीं खोजा गया। 00:03:14 – और इसके जो कारण हैं उसके गहनतम रहस्यों के बारे में भी नहीं जान पाए। 00:03:20 – इसीलिए उन चिकित्सकों ने आपको जो बताया है। 00:03:24 – वो अपनी दृष्टिकोण से ठीक बताया है कि उनके पास 00:03:29 – इसका कोई इलाज नहीं है क्योंकि जब भी कोई चिकित्सक बताता है 00:03:36 – कोई ये कहता है कि इस बिमारी का पृथ्वी पर कोई इलाज नहीं है। तो उस चिकित्सक को ऐसा कहने के बजाए यह कहना चाहिए 00:03:47 – कि हमारे पास हमारे विज्ञान में हमारी एलोपैथिक चिकित्सा साइंस में इसका कोई इलाज नहीं है। 00:03:57 – किसी भी चिकित्सक को कभी ये नहीं कहना चाहिए कि इसका इस पृथ्वी पर कहीं भी कोई भी इलाज नहीं है। यह दावा 00:04:05 – ये जो बात है यह रोगी को और अधिक रोग से ग्रस्त कर देती है और पीड़ा से संताप से ग्रस्त कर देती है। प्रभु के जो हाथ है, प्रभु की कृपा है। 00:04:19 – वो असाध्य से असाध्य कार्य को भी साध्य कर सकता है। प्रभु की कृपा प्रभु जो चाहे कर सकता है प्रभु सृष्टि का स्वामी है। 00:04:30 – प्रभु कृपावान है, करुणावान है, दयावान है। जहाँ सभी विचार, सभी सोच 00:04:38 – जैसे श्री गुरु ग्रंथ साहिब में लिखा है कि “सोचै सोचि न होवई जे सोची लख वार”। ये जो वैज्ञानिक हैं डॉक्टर हैं, चाहे कितना भी सोचते रहें। 00:04:48 – इसके बारे में गहनता के बारे में अध्यात्म के बारे में सत्य के बारे में यथार्थ के बारे में सोच से 00:04:58 – समझ में नहीं आता बुद्धि के द्वारा समझ में नहीं आता। तो जो वैज्ञानिको ने, डॉक्टरों ने आपको बताया है उनके कहने का अभिप्राय इतना है कि हमारे पास 00:05:12 – हमारी चिकित्सा, हमारी चिकित्सा पैथी में इसका कोई भी इलाज नहीं है। 00:05:18 – और प्रभु की कृपा से जो मैं आपको दवाई लिखूंगा आप उसे नोट करे। वो इस मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से भारतवर्ष में विदेशों में, अमेरिका में, कनाडा में, जापान में 00:05:32 – अनंत-अनंत व्यक्ति इस रोग से ग्रस्त है और इस रोग के करके अनंत व्यक्ति मृत्यु शैया पर लेट चुके हैं एसा ये भयंकर रोग जीवन को 00:05:45 – घुन की तरह, दीमक की तरह खाता रहता है जिसका कोई भी इलाज अभी पृथ्वी पर संभव नहीं है। आधुनिक विज्ञान के पास 00:05:53 – जो मैं आपको बताऊँगा उससे प्रभु की कृपा से नि:संदेह आप इस रोग से मुक्ति प्राप्त करेंगे और पुनः अपने जीवन को उसी तरह जिस प्रकार पहले अपने जीवन को चलाते थे। स्वस्थ होकर उसी तरह आपका जीवन पूरी तरह स्वस्थ हो जाएगा और ठीक होने के बाद आप अपने डॉक्टरों को दिखाएं। 00:06:14 – चिकित्सकों को दिखाएं। पीजीआइ के जो डॉक्टरों ने आपको बोला था की ये ठीक नहीं हो सकता। ठीक होने के बाद आप उनके पास जाएं, उन्हें बताए कि चिकित्सक से जो ऊपर है, प्रभु की कृपा है और जो प्रमु की कृपा है। प्रभु का जो नियम है वो जो चाहे कर सकता है। 00:06:33 – ऐसा आयुर्वेद का, ग्रंथों का, ऋषि-मुनियों का, संतों का मत है। उनका कहना है उनके आशीर्वाद का फल है। 00:06:44 – तो औषधि आप नोट करें। अश्वगंध की जड़ 10 ग्राम, 00:06:51 – बेरी के पत्ते 10 ग्राम, सुहंजना की फली 10 ग्राम, बेरीगेटा केना का पत्ता 1 ग्राम 00:07:03 – चने का जो छिलका होता है जिसे हम फेंक देते हैं वो 10 ग्राम। 00:07:09 – सोंफ, पहाड़ी सोंफ 10 ग्राम। बिहर बूटी 5 ग्राम। कुलंजना 1 ग्राम। 00:07:18 – गूगल 100 ग्राम, छोटी इलायची 5 ग्राम 00:07:25 – बच 5 ग्राम, सुरंजना , 10 ग्राम। मग पीपल 10 ग्राम। 00:07:35 – अश्वगंध की जड़ 20 ग्राम।, केसर की जड़ 5 ग्राम। 00:07:43 – और केसर के जो हल्की-हल्की छोटे पत्ते हैं वो 5 ग्राम, सुहंजना के फूल, सुहंजना के पत्ते। 00:07:50 – सुहंजना की जड़ पांच-पांच ग्राम। 00:07:55 – सभी को आप लेकर कूट पीसकर कपड़छान कर ले। 00:08:00 – और उसमें 1 ग्राम वज्र भस्म, एक ग्राम स्वर्ण भस्म। 00:08:04 – एक ग्राम लोह भस्म। एक ग्राम मंडूर भस्म। 00:08:09 – एक ग्राम टंकन भस्म एक

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Episode 1: ज्योतिष और आयुर्वेद में रोग विश्लेषण

00:00:24 – यह आश्चर्यजनक अद्भुत सत्य है कि केवल चित्र देखकर रोगों और समस्याओं के विषय में न केवल बताना बल्कि सहज सरल साक्षात समाधान करना। 00:00:35 – वर्ष 2002 में आस्था चैनल पर प्रसारित कार्यक्रम आयुर्विज्ञान के रहस्य में महाब्रह्मर्षि श्री कुमार स्वामी जी ने 21 वर्ष पहले ऐसा प्रत्यक्ष करके 00:00:49 – पूरे विश्व को आश्चर्यचकित किया था। यह कार्यक्रम उस समय सबसे अधिक 00:00:55 – लोकप्रिय कार्यक्रमों में एक कार्यक्रम माना गया था। 00:00:59 – आपकी बारम्बार की मांग पर इस कार्यक्रम के मुख्य अंश यूट्यूब में प्रसारित किए जा रहे हैं। 00:01:09 – ये है कोलकाता की उमा, इनकी डेट ऑफ बर्थ है 21-9-87। 00:01:14 – समय है इनका संध्या का 7:30 बजे, 00:01:16 – क्या आप बताना चाहेंगे कि इस बालिका को क्या-क्या रोग है ? 00:01:20 – इस बालिका को एक तो मिर्गी रोग है और बचपन में इसे पांडु रोग, पीलिया रोग हो गया था और इसे मूत्रावरोध भी है। इसका लीवर भी ठीक नहीं है और इसके पेट में भी ई हिस्टोलिटिका है। अगर ये मेहंदी के पत्ते 3 दिन सूंघे और मैनमेस  00:01:37 – और अश्वगंध की जड़ को ये रात को भिगो दें और सुबह उसे पीसकर चौथाई चम्मच शहद के साथ सुबह शाम लें तो एक हफ्ते में इस रोग से इनको मुक्ति मिलेगी । इसके कारण क्या है? इसके कारणों में एक तो ग्रह की स्थिति है, इनके ग्रह की स्थिति ठीक नहीं है। 00:01:54 – दूसरा इनकी माता को भी ये रोग थे। हेरिडिटरी भी कुछ चीज़ें होती है और तीसरा इनके खाने में सफाई की कमी है। अगर ये खाने में सफाई भी रखें और तीसरा इनके मस्तिष्क में भी विकार है। पढ़ने में भी इनका मन नहीं लगता पढ़ते हैं तो उनको याद नहीं होता तो ये अश्वगंध की जड़ को जैसे मैंने उपचार में बताया है ये इसको करेंगे तो ये ठीक हो जाएंगे। जो ग्रहों की स्थिति चल रही है किसी व्यक्ति की जो उसकी कुंडली का उल्लेख आता है, जो नक्षत्रों की स्थिति है, क्या उसका असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है? अगर हमारे नक्षत्रों 00:02:27 – की कैसी स्थिति है? ग्रहों की कैसी स्थिति है तो इसीका ही हमारे पूरे शरीर पर प्रभाव पड़ रहा है। हम जो खा रहे हैं पी रहे हैं, चल रहे हैं, जा रहे हैं। हमारा जो जीवन है मृत्यु है, हमारा जो विद्या है, अध्ययन है, विकास है, विनाश है, दुख है, सुख है, ये ग्रहों पे ही निर्धारित है। आयुर्वेद और ग्रह एक ही मिलकर दो बने हैं। 00:02:49 – आयुर्वेद और नक्षत्रों की स्थिति में यह भिन्न-भिन्न नहीं है, जो आचार्य ये मानते हैं जो आचार्य आयुर्वेद और ग्रहों को अलग-अलग मानती है या ग्रहों की स्थिति को नहीं जानते, केवल आयुर्वेद को जानते हैं। वो आयुर्वेद के पुर्णङ्गों को नहीं जानते । आयुर्वेद के पूर्ण स्थिति को नहीं जानते और जो ज्योतिषाचार्य आयुर्वेद को नहीं जानते हैं वो भी अर्धांग को जानते हैं पूर्णांग को  00:03:10 – नहीं जानते अगर कोई आचार्य आयुर्वेद को जानेगा और आयुर्वेदाचार्य ज्योतिष को जानेगा तो ये पूर्ण विज्ञान होगा। जैसे ये कहा जाता है कि आयुर्विज्ञान में जो पहलू हैं, उसमें ज्योतिष भी शामिल होता है और आध्यात्मिक ज्ञान भी शामिल होता है तो आखिर इसके पीछे कारण क्या है? मूल रूप से देखा जाए तो जो सृष्टि का कर्ता है वो एक है। 00:03:32 – एक के बाद तीन की उत्पति हुई, जिसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश का नाम दिया जाता है। इसे ही विज्ञान में इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन का नाम दिया जाता है और इसे ही वात-पित्त-कफ का नाम भी दिया जाता है। तो अगर किसी आदमी का वात-पित्त-कफ बैलेंस है, उसकी स्थिति बराबर है, सही दिशा में वो जा रहा है तो उसे कोई रोग नहीं होगा। इनकी स्थिति में जब परिवर्तन आता है तभी हमारे शरीर में विकार होते हैं, रोग होते हैं और ये ग्रहों के कारण भी होता है और हमारे खाने पीने के व्यवहार में कमी होने के कारण भी होता है। 00:04:05 – और सही स्थिति में उपचार न होने से भी ये होता है। ये हैं बिहार की निहारिका नूपुर ये किस-किस रोगों से ग्रस्थ हैं ? 00:04:14 – एक तो इनको कण्डु रोग इसे बोलते है, जिसे सिर्फ शारीरिक विकास होगी। एलर्जी हो गई और इसके। 00:04:22 – शरीर में एक तो भूख की कमी रहती है। अरुचि भी इसे होती है और यह जो भी खाती है उसे डाइजेस्ट नहीं होता और इसे फ्यूचर में किडनी की प्रॉब्लम होने की संभावना है और इसे साइनोसाइटिस भी है। ये नासिका में जब स्वांस लेती है, इसे सांस लेने में भी प्रॉब्लम आती है और इनकी माताजी को आर्थराइटिस है, जोड़ों में दर्द है। तो ये भी जब सीढ़ियों पर  उतरती चढ़ती है तो इसे भी जोड़ों में कभी कभी दर्द होता है और इसके कमर में भी दर्द होता है और इसे माइग्रेन की भी तकलीफ है। उस दर्द के लिए जो वो औषधि खाती है उससे इनको एसिडिटी होने लगती है । 00:04:59 – तो अगर ये काला नमक और काली मिर्च दोनों को बराबर मिला के शीशी में ढक के रख लें और उसका चौथाई चम्मच सुबह शाम लें तो एक मंथ में इसका रोग समूल नष्ट हो जाएगा। क्या ये बात सही है कि जो पेरेंट्स के रोग की स्थिति होती है, बच्चों पर इसका प्रभाव पड़ता है? हाँ, जब पैरेंटस के उनका हद है, उनकी कद है, उनकी हाइट है और उनका जो 00:05:22 – शुगर है, उनके दामा हैं, उनका रंग है, उनके शरीर का रूप है, आकार है जब वो हमारे माता पिता से मिलते हैं, उनकी आँखें हैं, उनकी नाक है, उनके कान है तो कुछ ऐसे रोग हैं जो पैतृक है। 00:05:38 – तो जब माता पिता से हमारा रंग रुप मिलता है तो रोग भी हमें माता पिता से मिलते हैं। वातावरण से भी मिलते है, ग्रहों से भी मिलते है और कर्मों से भी मिलते हैं। 00:05:49 – ये इसमें नि:संदेह इनका हाथ है। तो क्या आप निहारिका का चित्र देखकर उसकी माता जी और पिता जी का भी विवरण दे सकते हैं । 00:05:57 – हाँ दे सकते हैं। वो कैसे ? 00:05:59 – क्योंकि बच्चा और माता पिता एक होते हैं। कहीं गहरे में देखा जाए तो ये चंद्रमा है और तारे हैं। हमें अलग-अलग लगते हैं लेकिन अगर आप आंतरिक गहराई में जाएंगे तो चन्द्रमा और तारे और सूर्य ये अलग-अलग नहीं है। चंद्रमा सूर्य से लेता

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नाड़ी दोष महादोष है

नाड़ी दोष के कारण दिन-प्रतिदिन वैवाहिक जीवन में विघटन आ रहा है। भारत ही नहीं पूरे विश्व में इस प्रकार की परिस्थितियां बनी हुई हैं कि दाम्पत्य जीवन शुरू होने के कुछ समय के बाद ही बिखर जाता है। स्त्री व पुरुष में जो समन्वय व तालमेल होना चाहिए वह नहीं बनता। इस कारण जीवन दूभर हो जाता है, लड़ाई-झगड़े, वाद-विवाद भयंकर रूप धारण कर लेते हैं और इसका परिणाम बहुत घातक होता है। इसके कारण तलाक, आत्महत्या तथा हत्या की घटनाएं समाचार पत्रों की सुर्खियां बन जाती हैं। भारतीय सनातन संस्कृति के अनुसार विवाह रूपी संस्था का परम नियम है कि विवाह के लिए वर तथा वधू की जोड़ियां बनाने से पहले उनकी कुंडलियों का मिलान करके प्रमुख रूप से नाड़ी दोष की जांच कर लेना चाहिए अन्यथा इसके दुष्परिणाम भुगतने ही पड़ते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में हर वर्ष आठ लाख लोग आत्महत्या करते हैं तदानुसार हर 40 सेकेंड में एक व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। जानकर हैरानी होती है कि इसमें ज्यादातर वे लोग होते हैं जो या तो अपने जीवनसाथी के धोखा देने के कारण आत्महत्या करते हैं अथवा पारिवारिक जीवन से त्रस्त होकर यह कदम उठाते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार भारत में वर्ष 2005 से 2015 के बीच में आत्महत्या करने वालों में 17.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। विश्व में आत्महत्या करने वालों की संख्या लगभग एक मिलियन है। वर्ष 2020 तक यह विश्व की सबसे बड़ी बीमारी के रूप में सामने आई है। भारत में भी यह रोग बहुत बुरी तरह से पैर पसार रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण पश्चिमी देशों की सभ्यता तथा संस्कृति का अनुपालन है। हमारे युवा भारतीय सनातन संस्कृति को त्याग रहे हैं तथा जो हमारी धरोहर है उसे ठुकराकर गर्त की ओर अग्रसर हो रहे हैं। उस मार्ग पर चल रहे हैं जो बर्बादी की ओर ले जाता है। भारत में विशेष रूप से आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण केवल और केवल बेमेल विवाह ही होता है। चाहे कितना भी पश्चिमी प्रभाव हो लेकिन फिर भी यहां कुछ सनातन संतों तथा महापुरुषों के प्रभाव तथा कृपा से भारत में संस्कार बचे हुए हैं। किसी स्वार्थवश जब माता-पिता बिना किसी सोच विचार के विवाह कर देते हैं तब ही इस तरह की स्थिति पैदा होती है। अन्यथा सुखी दाम्पत्य जीवन देखने को मिलता है। नाड़ी दोष में विवाह करने पर जो विकार उत्पन्न होते हैं उनसे आने वाली संतान भी प्रभावित होती हैं। प्रायः किशोर तथा किशोरियां भी आत्महत्या कर लेते हैं। सुखी परिवार के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है कि नाड़ी दोष के दुष्परिणामों तथा दुष्प्रभावों से बचने के लिए विवाह से पूर्व अष्टकूट के द्वारा कुंडली मिलान करवाई जाए तथा नाड़ी दोष होने पर विवाह बिल्कुल भी न करें। कैसे बनता है नाड़ी दोष वर-कन्या के जन्म नक्षत्र एक ही नाड़ी के नहीं होने चाहिए। दोनों की नाड़ियां भिन्न होनी चाहिए इसी को शुभ माना जाता है। तदानुसार आदि-आदि, मध्य-मध्य, अन्त्य अन्त्य नाड़ी होने पर विवाह अशुभ माना जाता है। यह आवश्यक होता है कि दोनों की नाड़ियां एक न हों। आदि-मध्य, मध्य-अन्त्य तथा आदि अन्त्य को शुभ माना जाता है। ऐसा न होने पर नाड़ी दोष माना जाता है। यदि दोनों नाड़ियां मध्य है तो इसे अति अशुभ माना जाता है। ऐसी स्थिति में विवाह नहीं करना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो दाम्पत्य जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। लड़ाई-झगड़ा, क्लेश, वाद-विवाद तथा अलगाव और मृत्यु का दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है। अन्त्य नाड़ी एक होने पर भी वैवाहिक जीवन कष्टमय हो जाता है। वर और कन्या की कुंडलियों में नाड़ी दोष होने पर विवाह को टाल देना चाहिए। इतना ही नहीं नाड़ी दोष होने पर ‘लिव इन में रहने वालों के लिए भी संकट के बादल घेर लेते हैं। ऐसी स्थिति में प्रेम तथा शारीरिक संबंध बनाने वालों के लिए भी अति दुष्कर स्थिति पैदा हो जाती है तथा परिणामस्वरूप शारीरिक-मानसिक तथा आर्थिक रूप से हानि होती है। नाड़ी दोष के कुप्रभाव यदि नाड़ी दोष बन रहा हो तो उन दोनों लड़का – लड़की को आपस में भूलकर भी प्रेम या विवाह नहीं करना चाहिए अन्यथा दोनों की ही मृत्यु होती है एवं उनके परिवार का भी सर्वनाश हो जाता है। नाड़ी दोष एक भयंकर महादोष है जिसके कारण न सिर्फ सम्बन्ध बनाने वाले लड़का-लड़की, अपितु उन दोनों के समस्त परिवार का भी समूल विनाश हो जाता है। परिवार रोगों कष्टों से घिर जाता है और अनेकों प्रकार की बाधाएं उनके जीवन में आने लगती हैं जिनका कोई समाधान नहीं हो पाता। इतना ही नहीं यह कुल के विनाश का कारण भी बन सकता है । प्रायः यह देखा गया है कि नाड़ी दोष होने पर दंपत्ति रोगों से घिर जाते हैं, नौकरी में/बिज़नेस में हानि होने लगती है, धन की हानि होने लगती है, परिवार में कलह रहता है, पति – पत्नी में प्रेम व सामंजस्य नहीं रहता। नाड़ी दोष से युक्त दंपत्ति को संतान प्राप्ति नहीं होती यदि संतान हो जाए तो वह स्वस्थ नहीं होती । लड़का – लड़की दोनों के ही परिवार जनों को कष्टों का सामना करना पड़ता है, परिवार के सदस्यों की मृत्यु होने लगती है जिसका निम्मित प्रायः रोग व एक्सीडेंट होते हैं। दंपत्ति व परिवार जनों को मृत्यु तुल्य कष्टों का सामना करना पड़ता है । यही कारण है कि इस महादोष से बचने के लिए ज्योतिष के ग्रंथों में इसके प्रति विशेष रूप से चेतावनी भी दी गयी है। शास्त्रों में नाड़ी दोष का उल्लेख भगवान श्री राम के गुरु ऋषि वशिष्ठ जी ने स्पष्ट कहा है कि –नाड़ी दोषे भवेन्मृत्यु गुणैः सर्वैः समन्वितः( वशिष्ठ संहिता, अध्याय 32 श्लोक 188 ) अर्थ– कुंडली में सभी गुण मौजूद होने पर भी नाड़ी दोष में प्रेम या विवाह करने से निश्चित रूप से मृत्यु हो जाती है। यह महाअपराध एवं महापाप है, ऐसे प्रेम व विवाह को त्याग देना चाहिए। मध्यनाडी पतिहन्ति पार्श्वेनाड़ी तु कन्याकामतस्मान्नाड़ो सदा त्याज्या दम्पत्यो शुभमिछुता( वशिष्ठ संहिता अध्याय 32 श्लोक 189 ) अर्थ – मध्य नाड़ी दोष होने पर प्रेम या विवाह करने से निश्चित ही वर की मृत्यु होती है और अन्त्य नाड़ी दोष में कन्या की मृत्यु होती है, इसमें किंचित

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A Timeless Moment: Mahabrahmrishi’s Blessing in the Halls of Australian Parliament

On September 12, 2023, history etched a poignant chapter in the Parliament of New South Wales, Australia. Beyond being a tribute to India, it became a symphony of cultures as we celebrated the magnificence of Indian heritage. Speaker Honorable Greg Piper and 135 Members of Parliament joined hands, applauding the harmonious moment where a single-letter mantra provided to them by His Holiness Mahabrahmrishi Shree Kumar Swami Ji, in the span of two brief minutes, melted away their stress and anxiety. A Moment of Unity:Within the venerable halls of Parliament, a thunderous applause resonated, and 135 Members of Parliament, standing as one, bestowed extraordinary honors with a unanimous vote. His Holiness Mahabrahmrishi Shree Kumar Swami Ji graced the gathering with a unique mantra. In just two minutes, a sense of serenity washed over them, leaving them in awe. Distinguished Senator Honorable Warren Kirby shared the profound peace he had never experienced before. Unveiling Ancient Wisdom:Mahabrahmrishi Shree Kumar Swami Ji unveiled the ancient wisdom rooted in the teachings of Maa Durga. This sacred knowledge possessed the power to extinguish conflicts and replace them with the sweet harmony that resides within homes, echoing throughout the nation’s prosperity. His Holiness Mahabrahmrishi’s Profound Contributions:Pujya Mahabrahmrishi Shree Kumar Swami Ji’s tireless efforts span beyond borders, dedicated to global well-being and the upliftment of humanity. His contributions transcend healthcare, delving into the heart of compassion through his profound understanding of Ayurvedic secrets. Global Acknowledgment:On September 12, 2023, in the Parliament of New South Wales, Australia, Speaker Honorable Greg Piper and 135 Members of the Australian Parliament humbly paid tribute to Pujya Mahabrahmrishi Shree Kumar Swami Ji. This recognition illuminated his exceptional contributions, especially in the realm of Ancient Traditional Science, providing hope for incurable diseases. It was a moment that swelled the hearts of all Indians with immense pride. A Legacy of Reverence:This acknowledgment beautifully extends a legacy of honor bestowed upon Swami Ji in countries like the United States, Canada, and England. New York designated April 29th as ‘Brahmrishi Shree Kumar Swami Day‘ in his honor. This recognition transcends Swami Ji himself, resonating as a profound tribute to the entire Sanatan society, the revered community of saints, our rich cultural heritage, and every individual in our cherished nation. A Tribute from Warren Kirby:Warren Kirby, Member of the New South Wales Legislative Assembly in Riverstone, Australia, stands in awe of His Holiness Mahabrahmrishi Shree Kumar Swami Ji, an esteemed spiritual and yogic guru of our time. Swamiji’s unparalleled contributions have been witnessed, celebrated, and applauded by parliaments and dignitaries across the globe. He is especially esteemed for his unwavering commitment to fostering interfaith harmony, uniting people from diverse backgrounds under the unifying thread of unity. Swamiji’s message of interfaith harmony is profoundly spiritual, a testament to his lifelong quest for enlightenment. Years of profound meditation have unveiled ancient mysteries that offer transformational power, extending far beyond the boundaries of any single faith, enriching the greater tapestry of humanity. Across conferences held in various countries spanning Asia, North America, Europe, Africa, and the Middle East, Swamiji has tirelessly disseminated the message of equality, brotherhood, and the welfare of all humankind. His teachings have touched countless souls, providing profound guidance on their spiritual journeys. Today, as we honor Guru Dev, our hearts overflow with respect and gratitude for his invaluable contributions, and our souls resonate with the timeless wisdom he imparts.

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क्या आज भी जीवित हैं हनुमानजी?

हनुमानजी इस कलयुग के अंत तक अपने शरीर में ही रहेंगे। वे आज भी धरती पर विचरण करते हैं। हनुमानजी को धर्म की रक्षा के लिए अमरता का वरदान मिला था। इस वरदान के कारण आज भी हनुमानजी जीवित हैं और वे भगवान के भक्तों तथा धर्म की रक्षा में लगे हुए हैं। जब कल्कि रूप में भगवान विष्णु अवतार लेंगे तब हनुमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, विश्वामित्र, विभीषण और राजा बलि सार्वजनिक रूप से प्रकट हो जाएंगे। कलयुग में श्रीराम का नाम लेने वाले और हनुमानजी की भक्ति करने वाले ही सुरक्षित रह सकते हैं। हनुमानजी अपार बलशाली और वीर हैं और उनका कोई सानी नहीं है।  लंका विजय कर अयोध्या लौटने पर जब भगवान श्रीराम जी युद्ध में सहायता देने वाले विभीषण, सुग्रीव, अंगद आदि को कृतज्ञतास्वरूप उपहार देते हैं तो हनुमानजी उनसे याचना करते हैं- ‘यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले। तावच्छरीरे वत्स्युन्तु प्राणामम न संशयः ।।’ अर्थात ‘हे वीर श्रीराम ! इस पृथ्वी पर जब तक रामकथा प्रचलित रहे, तब तक निस्संदेह मेरे प्राण इस शरीर में बसे रहें।‘ इस पर श्रीराम उन्हें आशीर्वाद देते हैं- ‘एवमेतत् कपिश्रेष्ठ भविता नात्र संशयः । चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका तावत् ते भविता कीर्तिः शरीरे प्यवस्तथा । लोकाहि यावत्स्थास्यन्ति तावत् स्थास्यन्ति में कथा।’ अर्थात ‘हे कपिश्रेष्ठ, ऐसा ही होगा, इसमें संदेह नहीं है। संसार में मेरी कथा जब तक प्रचलित रहेगी, तब तक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम्हारे शरीर में प्राण भी रहेंगे ही। जब तक ये लोक बने रहेंगे, तब तक मेरी कथाएं भी स्थिर रहेंगी। ‘

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महारक्षक भगवान नरसिंह देव

विष्णु पुराण की कथा के अनुसार सतयुग में हिरण्यकश्यप और हिरणाक्ष नामक दो असुर सम्राट हुए थे जो भगवान विष्णु के कट्टर विरोधी थे। प्रहलाद हिरण्यकश्यप और माता कयाधु की चार संतानों में से एक थे। जब प्रहलाद अपनी मां कयाधु के पेट में था तब उसके चाचा हिरण्याक्ष का भगवान विष्णु ने वराहावतार धारण करके वध कर दिया था। इससे कुंठित होकर उसके पिता हिरण्यकश्यप भगवान ब्रह्मा की तपस्या करने चले गए थे। इसके बाद दैत्य नगरी में हिरण्यकश्यप को न पाकर देवताओं ने वहां पर आक्रमण कर दिया था। उन्होंने दैत्य नगरी पर अधिकार कर लिया। जब वे कयाधु को बंदी बना अपने साथ ले जाने लगे तब नारद मुनि ने उन्हें रोक दिया। नारद मुनि ने इंद्र से कहा कि तुम एक गर्भवती स्त्री पर अत्याचार नहीं कर सकते और वह भी तब कि जब उसके गर्भ में भगवान विष्णु का भक्त पल रहा हो। इसके पश्चात नारद मुनि कयाधु को इंद्र के चंगुल से छुड़ाकर अपने आश्रम में ले आये तथा हिरण्यकश्यप की तपस्या पूर्ण होने तक अपने आश्रम में रखा। इस दौरान नारद मुनि कयाधु को हरी भजन व भगवान विष्णु की कथाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन कर ज्ञान प्रदान करते रहे।  नारद मुनि के इन वचनों का सकारात्मक प्रभाव कयाधु के गर्भ में पल रहे अजन्मे प्रहलाद पर भी पड़ रहा था। यही कारण था कि जब उसका जन्म हुआ तब वह विष्णु भक्त बना। इसी बीच हिरण्यकश्यप की तपस्या समाप्त हो गयी तथा भगवान ब्रह्मा से उसने तीनों लोकों में सर्वशक्तिशाली होने का वरदान प्राप्त कर लिया। इसके बाद वह पुनः अपनी दैत्य नगरी वापस आ गया और वहां देवताओं का अधिकार हुए देखा। इसके बाद उसने अपने मिले वरदान से न केवल दैत्य नगरी को वापस पाया अपितु तीनों लोकों पर अधिकार स्थापित कर लिया और इंद्र देव को स्वर्ग के आसन से अपदस्थ कर दिया। हिरण्यकश्यप की तपस्या समाप्त हो जाने और पुनः अपनी नगरी लौट आने की सूचना मिलने के पश्चात कयाधु और भक्त प्रहलाद भी नारद मुनि से आशीर्वाद लेकर पुनः अपनी नगरी लौट गए। हिरण्यकश्यप भगवान ब्रह्मा से मिले वरदान के फलस्वरूप अति शक्तिशाली हो चुका था। इसी अहंकार में उसने विष्णु को भगवान मानने से इंकार कर दिया और स्वयं को भगवान की उपाधि दे दी। तीनों लोकों में जो कोई भी विष्णु की पूजा करता, वह उसे मरवा डालता किंतु जब उसने अपने स्वयं के पुत्र को ही विष्णु भक्ति में लीन देखा तो क्रोध की अग्नि में जलने लगा। हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रहलाद को समझाने के लिए आश्रम में नियुक्त आचार्यों को आदेश दिया कि इसे विष्णु भक्ति से विमुख करें। आचार्यगण पूरी कोशिश करते थे लेकिन इसका असर भक्त प्रहलाद पर नहीं होता था। वह खुद भी भगवान विष्णु की आराधना करता था और अपने सहपाठियों को भी इसके लिए प्रेरित करता था। कई तरह से उसे धमकाया और डराया गया, प्यार से भी समझाया गया लेकिन बालक प्रहलाद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उसने अपने पांच वर्ष के छोटे से पुत्र प्रहलाद को मारने की कई बार चेष्ठा की लेकिन हर प्रयास असफल सिद्ध हुआ। उसने प्रहलाद को पागल हाथियों के सामने फिंकवा दिया ताकि वह उनके पैरों के नीचे कुचलके मारा जाये। सांपों से भरे कुएं में फिंकवा दिया। पर्वत की चोटी से नीचे खाई में फेंक दिया। बेड़ियां बांधकर समुद्र में फिंकवाया। अस्त्र-शस्त्र से मरवाने की कोशिश की, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से उसका बाल भी बांका नहीं हुआ। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जल सकती। उसने अपनी बहन होलिका को बुलाकर आग्रह किया कि वह प्रहलाद को लेकर अग्नि में प्रवेश कर जाए, इससे वह जलकर भस्म हो जाएगा। योजना के अनुसार होलिका भक्त प्रहलाद को लेकर अग्नि में प्रवेश कर गई । भक्त प्रहलाद तनिक भी नहीं डरा और भगवान विष्णु के मंत्र का जाप करता रहा। इसके फलस्वरूप होलिका जलकर भस्म हो गई और वह सुरक्षित बाहर निकल आया। तभी से भारतवर्ष में होलिका दहन किया जाता है। यह असत्य की पराजय का प्रतीक है। होलिका दहन के माध्यम से नकारात्मक शक्तियों का विनाश किया जाता है। अग्नि में जलवाने की कोशिश नाकाम हो जाने पर हिरण्यकश्यप के क्रोध का पारावार नहीं रहा। वह इस बात से भी बहुत कुपित था कि हर बार भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद के प्राणों की रक्षा हो जाती थी। अंत में हिरण्यकश्यप ने एक और प्रयास किया। उसने एक धधकते हुए खंभे पर प्रहलाद को लिपटने की आज्ञा दी। उसने कहा कि तेरा भगवान विष्णु तुझे आकर बचा सकता है तो बचा ले। भक्त प्रहलाद इस आपदा के समय में भगवान विष्णु का स्तवन करने लगा और सहायता के लिए प्रार्थना करने लगा। उसने जब खंभे की तरफ देखा तो वह हैरान रह गया क्योंकि उस पर चींटियां चल रही थीं। भक्त प्रहलाद ने प्रसन्न होकर भगवान विष्णु को मन ही मन धन्यवाद किया और उस खंभे से लिपट गया जो बिल्कुल ठंडा था। हिरण्यकश्यप ने जब देखा कि इस धधकते हुए खंभे पर लिपटने से प्रहलाद का कुछ नहीं बिगड़ा तो वह और भी क्रोधित हो गया। उसने तलवार निकाली और प्रहलाद की तरफ लपका। जैसे ही उसने प्रहलाद का वध करना चाहा वैसे ही वहां पर खंभे को फाड़कर भगवान विष्णु नरसिंह अवतार धारण कर प्रकट हो गए। उनका शरीर तो मनुष्य का था लेकिन मुख शेर का था। उनकी उंगलियां शेर के पंजे की तरह थीं। उनकी लाल आंखें क्रोध से धधक रही थीं। उनकी दहाड़ सुनकर हिरण्यकश्यप के हाथ से तलवार छूट गई। भगवान ने हिरण्यकश्यप को ललकारा। भक्त प्रहलाद ने भगवान विष्णु को पहचान लिया और वह उनका वंदन करने लगा। हिरण्यकश्यप ने कहा कि मुझे कोई नहीं मार सकता। मुझे भगवान ब्रह्मा ने वरदान दिया है कि मेरी मृत्यु किसी भी अस्त्र-शस्त्र से नहीं हो सकती। मुझे कोई भी, न धरती पर और न आसमान में, न भीतर और न बाहर, न सुबह और न रात में, न देवता और असुर, न वानर और न मानव मार सकता है। भगवान नरसिंह ने कहा कि देख! मैं तुझे मिले हुए वरदान की मर्यादा को बिना भंग किए ही तेरा वध करता हूं। यह कहकर भगवान उसे

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