Jagadguru MahaBrahmrishi Shree Kumar Swami ji

गुरु पूर्णिमा

आषाढ़ मास की पूर्णिमा गुरु के चरणों में समर्पित होकर कृतज्ञता प्रकट करने का ऐसा दिवस है जो कालचक्र की सभी तिथियों से सर्वोच्च महत्व रखता है। गुरु पूर्णिमा सद्गुरु के पूजन का पावन पर्व है जिसे व्यास पूजा भी कहा जाता है। इस पूजन के माध्यम से शिष्य सद्गुरु के शरीर में उपस्थित विदेही आत्मा जो परब्रह्म परमात्मा का स्वरूप है, का पूजन करते हैं। ब्रह्मज्ञान का पूजन करते हैं, गुरु पूजा का शास्त्रोक्त विधान है। शास्त्र का अर्थ है-वैदिक साहित्य । शास्त्रों में वर्णित है कि आध्यात्मिक गुरु ईश्वर के समान श्रेष्ठ है। गुरु पूजा अथवा व्यास पूजा का अर्थ है- गुरु को सम्मान, योगदान व भावनाएं प्रदान कर कृतज्ञता प्रकट करना। ‘सकसाद धृतिवान समस्ता शास्त्र’ अर्थात् सभी शास्त्रों में और वैदिक साहित्य में गुरु को भगवान के रूप वर्णित किया गया है। गुरु कभी नहीं कहता कि मैं ईश्वर हूं, शिष्य का कर्तव्य है कि वह गुरु का सम्मान करे क्योंकि यह सम्मान भगवान का सम्मान करना कहलाता है। स्कन्द पुराण के उत्तर खण्ड में उमा-महेश्वर संवाद में भगवान शिव ने कहा है कि वेदान्तों के प्रवक्ता, सर्वश्रेष्ठ रत्नों से सुशोभित चरणकमल वाले सद्गुरुदेव जी की उच्च सिंहासन पर विराजमान करके पूजा करनी चाहिए।

गुरु पूजा का शास्त्रोक्त विधान सृष्टि के आरंभ से चला आ रहा है। वैदिक काल में पौराणिक आख्यान यह स्पष्ट करते हैं कि भगवान नारायण ने भगवान ब्रह्मा जी के माध्यम से सृष्टि की रचना व पालन का कार्य किया। इस प्रकार भगवान नारायण अर्थात् भगवान विष्णु से भगवान ब्रह्मा को ज्ञान मिला अतः वे इनके गुरु हुए। गुरु परम्परा के द्वारा भगवान ब्रह्मा से यह ज्ञान उनके मानसपुत्र देवर्षि नारद को मिला और फिर कालान्तर में इसी परंपरा के द्वारा महर्षि व्यास को मिला। यह परंपरा आज भी उसी प्रकार चली आ रही है। इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। वैसे तो व्यास नाम के कई विद्वान हैं लेकिन यह दिन महर्षि कृष्ण द्वैपायन व्यास को समर्पित है जिन्होंने पंचम वेद कहे जाने वाले महाभारत ग्रंथ की रचना की थी। महर्षि वेद व्यास चारों वेदों के प्रथम व्याख्यान करने वाले संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। इन्होंने वेदों का संकलन ही नहीं किया बल्कि 18 पुराणों और 18 उपपुराणों की रचना भी की थी जिनमें अतुलनीय ‘भागवत पुराण’ भी शामिल है। भगवान वेद व्यास ने वेद ऋचाओं को संकलित करके चार भागों में, चार वेदों के रूप में बांटा था अतः इन्हें आदिगुरु भी कहा जाता है। गुरु पूर्णिमा पर्व भगवान वेद व्यास का जन्मदिवस भी है इसलिए इस दिन की जाने वाली गुरु पूजा को व्यास पूजा कहा जाता है। संभवतः प्रथम गुरु पूर्णिमा पर्व की शुरुआत भगवान वेद व्यास की पूजा से ही हुई है। ऐसे साक्ष्य हैं कि इस दिन भगवान वेद व्यास जी ने महाभारत ग्रंथ की रचना पूर्ण की थी और सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘ब्रह्मसूत्र’ का लेखन आरंभ किया था। इस शुभ अवसर पर कृतज्ञ देवताओं ने भगवान वेद व्यास की प्रथम पूजा की थी। भगवान वेद व्यास को भगवान विष्णु का अंशावतार माना जाता है।

गुरु पूजन का शास्त्रोक्त, पौराणिक व ऐतिहासिक विधान

गुरु पूर्णिमा को गुरु पूजन के लिए मान्यता मिलने से पहले से ही गुरु पूजा का विधान रहा है। यह बात और है कि इस दिन को द्वापर युग में भगवान वेद व्यास को समर्पित करके व्यास पूजा अथवा गुरु पूजा के लिए निश्चित कर दिया गया । त्रेता युग में भगवान श्री रामचन्द्र जी ने गुरु वशिष्ठ से शिक्षा ग्रहण की और उनका पूजन भी किया। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में सर्वप्रथम गुरु की वंदना की – ‘बंदऊ गुरु पद पदुम परागा’। भगवान श्री रामचन्द्र व भगवान श्री लक्ष्मण को गुरु विश्वामित्र जी ने परा और अपरा नाम की शक्तियां प्रदान कीं तथा अपने आश्रम में रखकर दिव्य शस्त्र व अस्त्रों के संचालन की विधि का ज्ञान भी करवाया। भगवान श्री रामचन्द्र जी व भगवान श्री लक्ष्मण जी ने भी कृतज्ञ भाव से उनके यज्ञ की रक्षा की तथा ताड़का-सुबाहु जैसे राक्षसों का संहार कर गुरु पूजन किया और गुरु दक्षिणा प्रदान की। महाराज जनक ने भी मुनि अष्टावक्र का गुरु पूजन किया और शिष्य भाव से ज्ञान प्राप्त किया। इसी प्रकार त्रेता युग में गुरु शिष्य परंपरा के कई महान दृष्टान्त हैं। यहां तक कि भगवान शिव से जब माता सती ने पूछा कि सभी आपको ध्याते हैं लेकिन आप किसकी पूजा करते हैं। तब भगवान शिव ने कहा कि मैं भगवान श्री रामचन्द्र जी की गुरुरूप में पूजा करता हूं। दूसरी तरफ भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्थापना करके पूजा की और कहा कि शिव के समान मुझे कोई भी प्रिय नहीं। भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश को गुरु रूप में साधकों ने पूजा है और शक्तियां तथा वरदान प्राप्त किए हैं यथा-

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः ।

गुरुर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ 

अर्थात ब्रह्मा, विष्णु, महेश गुरू के रूप में पूजित हैं और ये ही साक्षात परब्रह्म हैं, मैं इन्हें प्रणाम करता हूं। या यूं कहें कि गुरु में ब्रह्मा, विष्णु, महेश समाहित हैं। गुरु ब्रह्मा, विष्णु, महेश की तरह अपने शिष्य को कृपा प्रदान करते हैं। इस दिन गुरु की इस रूप में पूजा की जाती है। साथ ही देवतागण अपने गुरु बृहस्पति और असुरगण गुरु शुक्राचार्य का पूजन करते रहे हैं। यह परंपरा सृष्टि के प्रारंभिक काल से चली आ रही है। देवताओं और असुरों के उत्थान में इन दोनों गुरुओं की महती भूमिका के विषय में हमारे पुराणों और ग्रंथों में विस्तारपूर्वक किया गया है। काल में भी देवताओं, असुरों द्वारा गुरु की पूजा के प्रेरणादायी प्रसंग आते हैं। नचिकेता ने भगवान यमराज की गुरु के रूप में पूजा भक्ति की और ज्ञान प्राप्त किया था। देवर्षि नारद जी भी भगवान ब्रह्मा के मानसपुत्र और शिष्य थे। भगवान हनुमान जी से इस रूप में प्रार्थना की जाती है-‘जय जय जय हनुमान गुसाईं, कृपा करहु गुरुदेव की नाई।’ स्वयं भगवान हनुमान जी को भगवान सूर्यदेव ने गुरु के रूप में ज्ञान दिया था। रामायण काल में गुरु शिष्य परंपरा की साक्षी ऋषिवर अत्रि, अगस्त्य, सुतीक्षण, महर्षि वाल्मीकि, भारद्वाज आदि द्वारा स्थापित वे आश्रम थे जिनकी रक्षा स्वयं भगवान श्री रामचन्द्र जी ने अपने वनवास काल में की थी।

द्वापर युग में महाभारत काल में ही व्यास पूजा का आरंभ हुआ था। जब पाण्डवों ने पूजा कर कृतज्ञ भाव से उनके चरणों में शीश नवाकर प्रार्थना की कि हे गुरुदेव आपने हमें जो विद्या और ज्ञान प्रदान किया है इसके लिए हम आपके जीवनभर आभारी रहेंगे, कृपा कर आप हमें गुरु दक्षिणा के लिए आदेश करें। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गुरु सांदीपनी की पूजा की और ज्ञान प्राप्त किया था। सिख धर्म का आधार ही गुरु है। सिख धर्म के दशम सतगुरु श्री गोविन्द सिंह जी महाराज ने गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वाह करते हुए मानवमात्र के कल्याण के लिए उपदेश दिए और सत्य तथा धर्म के लिए कुर्बानियां भी दीं। यहां तक कि अपने परिवार की भी शहादतें दीं जो इतिहास में अंकित हैं। सिख धर्म गुरु शिष्य की महान परंपरा को श्रीगुरुग्रंथ साहिब जी को गुरु के रूप में विराजमान करने का शुभ कार्य दशम सतगुरु श्री गोविन्द सिंह जी महाराज ने किया था। इसे सिख साक्षात् परमात्मा मानते हैं और गुरु तथा परमात्मा के रूप में इसकी पूजा करते हैं।

महात्मा बुद्ध ने भी गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत ही अपने शिष्यों को ज्ञान व उपदेश दिए थे। बौद्ध ग्रंथों में ऐसा वर्णन है कि महात्मा बुद्ध ज्ञान प्राप्ति के पांच सप्ताह बाद सारनाथ पहुंचे थे। यहां इन्होंने पांच शिष्यों को दीक्षा दी थी और आषाढ़ मास की पूर्णिमा वाले दिन इन्हें उपदेश दिया था। यह घटना बौद्ध ग्रंथों में ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ के रूप में वर्णित है। अतः बौद्ध धर्म के अनुयायी इस दिन को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं क्योंकि उनके गुरु महात्मा बुद्ध ने इस दिन प्रथम उपदेश दिया था। बौद्ध धर्मावलंबी इन्हें गुरु व भगवान के रूप में पूजते हैं।

मराठा शिरोमणि छत्रपति शिवाजी अपने समर्थ गुरु रामदास की पूजा करते थे। इतिहास साक्षी है कि समर्थ गुरु रामदास के निर्देशन व आशीर्वाद से ही छत्रपति शिवाजी ने बृहत् मराठा साम्राज्य की स्थापना की थी। इनकी गुरु भक्ति की यह पराकाष्ठा है कि इन्होंने समस्त राज्य अपने गुरु के चरणों में समर्पित करके उनकी पूजा की थी। मौर्य वंश के प्रसिद्ध सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य की सारी उपलब्यिों का श्रेय उनके गुरु कौटिल्य चाणक्य को जाता है। गुरु चाणक्य के वाक्यों का अक्षरशः पालन करने वाले चन्द्रगुप्त मौर्य का नाम इतिहास के स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है। भारत को यूनान के आक्रांता सिकंदर व उसके सेनापति सेल्यूकस के आक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करने और समस्त भारतवर्ष को एक छत्र के नीचे लाने में गुरु चाणक्य की नीतियों का लोहा आज भी पूरा विश्व मानता है। एक साधारण से युवक को इतनी बड़ी उपलब्धि तक पहुंचाने और देश की सीमाओं को सुरक्षित बनाने में गुरु चाणक्य को कौन भुला सकता है। इसमें कोई संशय नहीं है कि सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य गुरु चाणक्य की जीवन पर्यन्त पूजा करते रहे।

गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर व्यास रूप सद्गुरु अपने शिष्य को परमात्मा से साक्षात्कार करवाता है क्योंकि गुरु कृपा से ही ईश्वर का साक्षात्कार संभव है। गुरु के बिना ज्ञान का प्रकाश प्राप्त नहीं होता। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है-

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ (4:34)

तुम गुरु के पास जाकर सत्य को जानने का प्रयास करो। उनसे विनीत होकर जिज्ञासा करो। स्वरूपसिद्ध व्यक्ति तुम्हें ज्ञान प्रदान कर सकते हैं क्योंकि उन्होंने सत्य का दर्शन किया है।

श्री योगवशिष्ठ महारामायण में सद्गुरु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने कहा है कि जिस शिष्य को गुरु के वचनों में श्रद्धा, विश्वास और सद्भावना होती है, वह अति शीघ्र ही कल्याण को प्राप्त होता है। ऐसा शास्त्रोक्त कथन है कि भगवान, गुरु और संत का चित्त ब्रह्मनिष्ठ होता है। ये तीनों एक ही प्रारूप के हैं अतः इनमें दृढ़, श्रद्धा और आस्था बनाए रखने से ज्ञान की प्राप्ति होती है।

गुरु का शाब्दिक अर्थ है-अंधकार से प्रकाश में लाने वाला। लेकिन इसके लिए गुरु की शरणागत होना होगा, अहं भाव को खत्म करना होगा। गुरु से प्रेम रस की प्राप्ति के लिए गुरु चरणों में सब कुछ समर्पित करके प्रेम रस से धोना होगा। अपने उर में समस्त भौतिक आसक्तियों को त्याग कर गुरु में ऐसी दृढ़ प्रीति करनी होगी जिससे मन का मैल धुल जाए। इस शुद्ध प्रेम के लिए पूर्ण समर्पण की आवश्यकता होती है क्योंकि आध्यात्मिक प्रेम इस तरह ही उत्पन्न होता है। कबीरदास जी ने कहा है-

प्रेम न खेतों उपजे, प्रेम न हाट बिकाय ।

राजा चहों प्रजा चहों, शीश दिये ले जाये ॥

गुरु पूर्णिमा, गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का ऐसा शुभ दिन है कि जो स्वयं में पूर्ण है और पूर्णिमा के चन्द्र की तरह पूर्णत्व प्रदान करता है। यह पर्व शिष्य को आत्मस्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने की प्रेरणा प्रदान देता है। तन, मन को दैवीय गुणों से ओतप्रोत करने वाली सद्गुरु की ज्ञान गंगा में स्नान करने को प्रोत्साहित करता है। सद्गुरु कृपा से ज्ञान, धन, पुत्र, पौत्र, संपत्ति, यश, कीर्ति, ऐश्वर्यादि की प्राप्ति होती है। इनसे भी अधिक महत्वपूर्ण सद्गुरु की कृपा का प्राप्त होना है। कितना भी संकट हो, सद्गुरु का नाम स्मरण करते ही मन में शांति आ जाती है, आत्म विश्वास का संचरण होने लगता है।

गुरु पूर्णिमा को शिष्य श्रद्धा, भक्ति से गुरु का पूजन करके गुरु को जो भी समर्पित करता है, उसे उससे कई गुणा प्राप्त हो जाता है। भारतवर्ष में गुरु पूर्णिमा का यह पर्व बहुत श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। गुरु को सामर्थ्यानुसार सम्मानित करके आशीर्वाद लेकर शिष्य कृतकृत्य होते हैं।

परम पूज्य सद्गुरुदेव जी गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर विशेष कल्याणकारी व अद्भुत प्रभु कृपा नाम पाठ प्रदान करके शिष्यों को कृतार्थ करते हैं।

-प्रभु कृपा पत्रिका, अगस्त 2019

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