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पूर्वजों का जीवन में महत्व

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, हमारे पूर्वजों का आधार क्या है?

परम पूज्य गुरुदेव : यह प्रश्न जगत कल्याण के लिए तथा बड़ा ही सारगर्भित व रहस्य की जिज्ञासा से परिपूर्ण है। आधुनिक जगत में युवा वर्ग, विज्ञान व अनेक प्रकार के धार्मिक व मनोवैज्ञानिक व्यक्तियों द्वारा बार-बार इसकी खोज की गई है। आत्मा सदैव एक रस, एक जगह रहती है तो फिर लोक-परलोक, शरीर बदलना या पितृदोष क्या है? इसका रहस्य क्या है? इस पर बड़े-बड़े वैज्ञानिकों, आधुनिक युग के व्यक्तियों तथा शिक्षार्थियों द्वारा विवेचना हुई है। इस पर सभी की अलग-अलग राय है। इस प्रश्न को केवल वे ऋषि जान सकते हैं जो शरीर के पार जाते हैं और शरीर के रहस्य को जानते हैं। आत्मा वास्तव में आती-जाती नहीं है। जैसे अगर हमारे शरीर को जला दे, नष्ट कर दें या पीड़ा पहुंचाए तो हमारी आत्मा को कष्ट नहीं होता। हमारे तन के द्वारा मन को कष्ट होता है। मन के साथ चित्त वृत्तियां होती हैं। नाना प्रकार के मन पिण्डों का रूप धारण करते हैं। जब भी शरीर का जन्म होता है तो आत्मा के साथ मन, बुद्धि और ऐसे नाना प्रकार के जो क्रिया कलाप हैं, भौतिक तत्व हैं जो अदृश्य तत्व हैं। उनका समावेश होता है। इस तरह यह चित्त द्वारा शरीर में आता जाता है। जैसे कई बार हम स्वप्न में अन्य-अन्य लोकों में चले जाते हैं या समुद्र में घूमते हैं या ऐसे-ऐसे स्थानों पर जाते हैं जहां पहले कभी नहीं गए होते। यह मन के द्वारा या मन की जो सूक्ष्म इन्द्रियां हैं उनके द्वारा होता है। जो ब्रह्मवेत्ता सत्य को जानकर ऋषि-मुनियों द्वारा सारगर्भित ब्रह्म को जान लेता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता, वह कभी इस लोक में नहीं आता। लेकिन जो मानव ब्रह्म तत्व को नहीं जानता, प्रभु के तत्व को नहीं जानता वह इसी जन्म में, इसी लोक में बार-बार लौटते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने भी इसके बारे में गीता में लिखा है, “जो भी अतृप्त आत्माएं होती हैं, अतृप्त मन होते हैं, अतृप्त इन्द्रियां होती हैं वे अपनी कामना की पूर्ति के लिए बार-बार आती हैं।” कुछ व्यक्ति तो ऐसे हैं जो शरीर छोड़ते हैं तो अपने घरों के आसपास ही रहते हैं। या अपनी दुकानों के पास रहते हैं। वे किसी भी योनि में जा सकते हैं, किसी भी शरीर में जा सकते हैं। ऐसे-ऐसे आधुनिक मनोवैज्ञानिकों द्वारा यह जाना गया है। अतृप्त आत्माएं (मन) फिर दूसरे के शरीर में आकर दुःख भी देते हैं और सुख भी देते हैं और नाना प्रकार के कष्टों से मुक्ति भी देते हैं। ऐसा ऋषि-मुनियों द्वारा प्रत्यक्ष जाना गया है।

श्राद्ध के दिनों में या पवित्र स्थानों में या अमावस या पूर्णमासी के दिनों में जो स्त्री-पुरुष रति क्रिया में ग्रस्त होते हैं, उन्हें नाना-नाना प्रकार के रोगों से ग्रस्त होना पड़ता है, ऐसा ऋषियों द्वारा जाना गया है। यह शास्त्रों का मत है कि जो शास्त्रों द्वारा बताए गए मार्ग पर चलते हैं, प्रभु कृपा से उन्हें सभी रोगों से मुक्ति प्राप्त होती है।

एक सत्य कथा है – एक बार एक आदमी ने काफी मेहनत करके एक अच्छी दुकान बनाई, लेकिन उसका बेटा लायक नहीं था। उस व्यक्ति की मृत्यु हो गई तो उसके बेटे ने दुकान संभाली। कुछ समय बाद देखते हैं कि एक कुत्ता आता है। वह दुकान के बाहर बैठा रहता है। लड़का बार-बार उस कुत्ते को मारता, कुत्ता नहीं जाता। लड़का फिर उस कुत्ते को डंडा मारता है पर कुत्ता नहीं भागता। ऐसा करते-करते एक दिन लड़के ने कुत्ते को ऐसा मारा कि उसकी मृत्यु हो गई। उसी समय एक तत्ववेत्ता संत वहां पहुंचे। उन्होंने कहा-“आपने यह क्या किया, यह तो पूर्व जन्म में आपके पिता थे। क्योंकि आपने कभी भी अपने पिता का कहना नहीं माना। उनका ध्यान सदैव दुकान और आप पर लगा रहता। वे आपकी रक्षा के लिए तथा आपको देखने के लिए दुकान के आगे बैठा करते थे कि आप दुकान ठीक से चलाते हैं या नहीं। ” 

जिसका अंत समय में धन में या वासना में ध्यान रहता है, वह नीच योनि में भी जा सकता है, ऐसा शास्त्रों में वर्णित है।

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