Jagadguru MahaBrahmrishi Shree Kumar Swami ji

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मां की योनि से उत्पन्न हुआ है ब्रह्माण्ड

मां की योनि से ही सारा ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ है। भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश सभी देवी-देवता सूरज, चंद्रमा, तारे, पृथ्वी, आकाश, वायु, जितने भी जीव-जंतु हमें दिखाई देते हैं, ये सभी पवित्र योनि से ही उत्पन्न हुए हैं। मां की योनि बहुत पवित्र है। जितने भी साधु, संत, सिद्ध साधक, तांत्रिक-मांत्रिक हैं वे सभी मां कामाख्या की योनि की पूजा करते हैं। इसके बाद ही वह मां के अन्य स्थानों पर पूजा के लिए जाते हैं। महाब्रह्म मां काली का बीज है और उस बीज की उत्पत्ति मां की योनि से ही होती है-  हे काली! ला खप्पर खाली पी भैरव का पैमाना।  भूत-प्रेत बैताल पिशाचों  को तुम कर दो दीवाना ।  नर कंकालों को जीवित कर  मरघट को कर दो खाली मंदिर के बंदी गृह छोड़कर पा स्वतंत्र मयखाना। परम पूज्य सद्गुरुदेव जी ने कहा कि काली मां से साधक आग्रह करता है कि हे मां, अपना खप्पर खाली लेकर आ। इसका आशय काली मां से है जिसके बीज से समस्त परा और अपरा प्रकृति का प्रकटन हुआ है और यह खप्पर समस्त ब्रह्माण्ड है, आकाश है। काली और खप्पर का विस्तृत आयाम है, सृष्टि से पहले अंधकार स्वरूपा महाकाल रात्रि थी उसने अपने खप्पर से समस्त जीव-जंतुओं को उत्पन्न किया जो कंकाल रूप में, उनमें फिर अपरा प्रकृति का प्रयोग करके मां ने शरीर का रूप दिया और उसके बाद उनको परा के द्वारा जीवन का रूप दिया। मां काली के बीज से ही समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई। मनुष्य उत्पन्न हुए, स्त्री-पुरुष उत्पन्न हुए। इन शरीरों में “विकार उत्पन्न हो गए। यहां पर यह कहा गया है कि हे मां! हमारे इन खप्पर रूपी शरीरों में विकार उत्पन्न हो गया है, तुम इन्हें खाली कर दो। हे ब्रह्माण्ड को बनाने वाली काली, हमारे इस खप्पर रूपी कपाल को खाली कर दो। यह विकारों से भरा हुआ है। करोंड़ों- रोड़ो जन्मों के विकार इसमें भरे हुए हैं। करोड़ों योनियों की गंदगी इसमें भरी हुई आप इसे तोड़ दो और फिर सफाई करके छोड़ दो ताकि हे मां, हम आपके स्वरूप का दर्शन कर सकें, आपका पाठ कर सकें, काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, वासना आदि से मुक्त हो सकें। हे मां आपसे विनय है क्योंकि हमारा सारा शरीर एक कपाल की तरह है हम मात्र कंकाल हैं। इसकी सारी गंदगी को निकाल दो। आपसे अनुनय, विनय है कि यह हमारा खप्पर खाली कर दो। -प्रभु कृपा पत्रिका,जून,2024

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ब्रह्मर्षि कुमार स्वामी हो गए ‘महाब्रह्मर्षि’ !!

महाब्रह्मर्षि‘ यह पद कैसे निष्पन्न होता है, इसका शास्त्रों में उद्धृत प्रमाण के आलोक में चिंतन करते हैं-‘महाब्रह्मर्षि’ में तीन शब्द (पद) हैं-महा (महत्) + ब्रह्म+ ऋषि। इस पर प्रतिशब्द की शास्त्रीय व्याख्या करते हैं- महा-‘मह्यते पूज्यते असौ इति-महान् ‘महपूजायां’ धातु से उणादि सूत्र ‘वर्त्तमाने पृष-महज्जच्शतृवच्च’ (उणा. 2/84) से अति निपातित होता है-शत् प्रत्यय के पश्चात्, नुम्, दीर्घ आदि होकर महान् (पु.) महत् (नपुं क्तिङ में सिद्ध होता है यह शब्द बृहत् का द्योतक है अर्थात् बृहत्वात् ब्रह्म उच्यते जो व्यापक है, वही महान अर्थात ब्रह्म है। और भी निघण्टुकार कहते हैं- ‘श्रुतेन श्रोत्रियो भवति तपसा विन्दते महत्’ अर्थात् वेदादि का श्रवण करने से श्रोत्रिय होता है तथा तप-साधना के द्वारा महत को प्राप्त करता है। ‘महा’ महती साधना-तपस्या का बोधक है। ब्रह्म-‘बृहंति वर्धते-निरतिश। महत्व-लक्षण बुद्धिमान भवति’ ‘बृहि बृद्धौ’ धातु से – ‘ बृहे नोंऽच्च’ (उणा. 4/145) से ‘मनिन्’ प्रत्यय तथा नकार को अकार तथा रत्व होकर ब्रह्म सिद्ध होता है। ब्रह्म का अर्थ वेद भी होता है। ‘तस्मात् एतद् ब्रह्म-नामरूपमन्त्रञ्च जायत-अर्थात् यही ब्रह्म नाम-रूप तथा अन्न के रूप में आविर्भूत होता है। श्रीमद्भागवत में ‘ब्रह्म पद से’ तेने ब्रह्म हृदा। आदि कवये हृदा = मनसा मन से आदिकवि=ब्रह्मा जी के लिये वेद का विस्तार किया। वेदान्त मत में-वस्तु सच्चिदानन्दाद्वय ब्रह्म अर्थात् सत्-चित् तथा आनन्द रूप ही अद्वैत रूप से ब्रह्म है। ‘ब्रह्मैव नित्यं वस्तु तदन्यदखिलमनित्यम्’ अर्थात् ब्रह्म ही नित्यवस्तु है, अन्य जितने भी जागतिक पदार्थ हैं वे सभी अनित्य हैं। और भी ब्रह्म के विषय में कहा गया-‘ आकाशवत् सर्वगतश्च नित्यः। अजो नित्यः शाश्वतः ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, रातेर्दातुः परायणं यत्र नान्यत् पश्यति, नान्यत् श्रृणोति, नान्यत् विजानाति सभूमा यो वै भूमा तदमृतम्। अर्थात् ब्रह्म आकाश की तरह सर्व व्यापक है तथा नित्य है। अज, शाश्वत है, सत्य रूप ज्ञान स्वरूप, अनंत सत्तात्मक ब्रह्म है। जो उस ब्रह्म के अतिरिक्त न देखता है, न सुनता है तथा न जानकारी करने का प्रयास करता है, वह भी भूमा है। जो भूमा है उसी से मुक्ति है। इत्यादि श्रुतियों के अनुसार नित्य, शुद्ध, मुक्त परमात्मा ही है। शास्त्रों में कहा गया है- ‘आनन्दो ब्रह्म व्यजानात् आनन्दरूपममृतं पदं विभाति- ब्रह्म का स्वरूप आनंद है आनंद ही अमृत अर्थात् मुक्ति है।’ ‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। यतो वा इमानि-भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तत् विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्मेति । अर्थात् जहां वाणी मन के साथ मौन हो जाती है। जिससे सभी भूतों की उत्पत्ति होती है जिससे स्थिति है तथा जिसमें प्रविष्ट होते हैं यही ब्रह्म है। भगवान शिव कहते हैं-देह आदि माया के सभी कार्यों को मरुमरीचिका समान असत् जानना चाहिए। जीवात्मा स्वरूपतः ब्रहा है। किंतु माया के प्रभाव से वह स्वयं को अलग मानता है। ज्ञानी माया के चपेट में नहीं आता है। उसे अपने स्वरूप का बोध होता है। ऐसा ब्रह्मविद् महापुरुष ब्रह्म स्वरूप होता है। ऋषि-‘ऋषति प्राप्नोति सर्वान् मंत्रान् ज्ञानेन पश्यति संसारपारं वा इति। ‘ऋष प्राप्तौ’ धातु से ‘इगुपधात् कित’ (उणा. 41/19) इस उणादि सूत्र से इन्. होकर ऋषि शब्द सिद्ध होता है। जिसका अर्थ-मंत्रों को प्राप्त करे, अथवा ज्ञान व मंत्रों के द्वारा संसार से पार का दर्शन करने वाला ऋषि होता है। ‘अग्निः पूर्वभिः ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत स देवा एह वक्ष्यति’। (ऋग्वेद-1/1/2) वह परमात्मा पूर्व ऋषियों के द्वारा स्तुत्य है। ‘विद्याविदग्धमतयो रिषयः प्रसिद्धाः’ विद्या में निपुण बुद्धि वाले ऋषि प्रसिद्ध हैं और भी ‘ऋषयो मंत्रदृष्टार:’ ऋषि वही है जिसने मंत्रों का साक्षात्कार कर लिया है। तात्पर्य है कि महा+ब्रह्म ऋषि वही है जो संपूर्ण विश्व में पूजित-सम्मानित है, जिसकी दृष्टि व्यापक है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ संपूर्ण पृथ्वी और चराचर जगत को जो अपना परिवार मानता है तथा ब्रह्म के अतिरिक्त संसार का जो वास्तविक दर्शन कर लेता है अर्थात् ‘सीयराम मय सब जग जानी’ ब्रह्ममय जगत का दर्शन करने वाले। मंत्रों को प्राप्त अर्थात् साक्षात्कार करने वाले ही ऋषि हैं। अर्थात् सम्मानित-ब्रह्मविद्-मंत्रदृष्टा ही महाब्रह्मर्षि है। काशी विद्वत परिषद के ऋषियों व महनीय विद्वानों ने आपकी जगत् प्रसिद्धि देश-विदेश में अनेक शीर्षस्थ राष्ट्रपति आदि से सम्मानित साधु समाज में अतिप्रतिष्ठित, जीवमात्र के सुख-दुख, मान-अपमान, लाभ-हानि, काम-क्रोध लोभ से ग्रस्त लोगों के कल्याण हेतु सदा तत्पर ऐसे पूज्य श्री सद्‌गुरुदेव जी को इस महान् पद से समलंकृत किया। ऐसे ‘महाब्रह्मर्षि’ को हम कोटि-कोटि वंदन करते हैं। ‘महाब्रह्मर्षि‘ महामंत्र है, महावाक्य है। ‘महाब्रह्मर्षि’ ही साक्षात ब्रह्म, परमात्मा, मां दुर्गा, भगवान शिव, भगवान श्रीराम व भगवान श्रीकृष्ण हैं। ब्रह्म का जाप करते-करते व्यक्ति ब्रह्म रूप हो जाता है। इसका प्रतिदिन पाठ, जाप, पूजन, मनन, मंथन, चिंतन करके शास्त्रों, वेदों, ग्रंथों से पार सभी ब्रह्ममय हो जाते हैं। जो कष्ट में हैं, दुखों में हैं, परेशान हैं, भगवान को पाना चाहते हैं, इसके जाप से वे मुक्त हो जाते हैं, ऐसा वेद में वर्णित है। ‘महाब्रह्मर्षि’ का जाप 7 हजार करोड़ मंत्रों में सबसे श्रेष्ठ है। इसके जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता। इसे गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखते हुए गुप्त रखना अति आवश्यक है। डा. दिनेश कुमार गर्गकोषाध्यक्ष एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता, काशी विद्वत परिषद, वाराणसी

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नाड़ी दोष महादोष है

नाड़ी दोष के कारण दिन-प्रतिदिन वैवाहिक जीवन में विघटन आ रहा है। भारत ही नहीं पूरे विश्व में इस प्रकार की परिस्थितियां बनी हुई हैं कि दाम्पत्य जीवन शुरू होने के कुछ समय के बाद ही बिखर जाता है। स्त्री व पुरुष में जो समन्वय व तालमेल होना चाहिए वह नहीं बनता। इस कारण जीवन दूभर हो जाता है, लड़ाई-झगड़े, वाद-विवाद भयंकर रूप धारण कर लेते हैं और इसका परिणाम बहुत घातक होता है। इसके कारण तलाक, आत्महत्या तथा हत्या की घटनाएं समाचार पत्रों की सुर्खियां बन जाती हैं। भारतीय सनातन संस्कृति के अनुसार विवाह रूपी संस्था का परम नियम है कि विवाह के लिए वर तथा वधू की जोड़ियां बनाने से पहले उनकी कुंडलियों का मिलान करके प्रमुख रूप से नाड़ी दोष की जांच कर लेना चाहिए अन्यथा इसके दुष्परिणाम भुगतने ही पड़ते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में हर वर्ष आठ लाख लोग आत्महत्या करते हैं तदानुसार हर 40 सेकेंड में एक व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। जानकर हैरानी होती है कि इसमें ज्यादातर वे लोग होते हैं जो या तो अपने जीवनसाथी के धोखा देने के कारण आत्महत्या करते हैं अथवा पारिवारिक जीवन से त्रस्त होकर यह कदम उठाते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार भारत में वर्ष 2005 से 2015 के बीच में आत्महत्या करने वालों में 17.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। विश्व में आत्महत्या करने वालों की संख्या लगभग एक मिलियन है। वर्ष 2020 तक यह विश्व की सबसे बड़ी बीमारी के रूप में सामने आई है। भारत में भी यह रोग बहुत बुरी तरह से पैर पसार रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण पश्चिमी देशों की सभ्यता तथा संस्कृति का अनुपालन है। हमारे युवा भारतीय सनातन संस्कृति को त्याग रहे हैं तथा जो हमारी धरोहर है उसे ठुकराकर गर्त की ओर अग्रसर हो रहे हैं। उस मार्ग पर चल रहे हैं जो बर्बादी की ओर ले जाता है। भारत में विशेष रूप से आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण केवल और केवल बेमेल विवाह ही होता है। चाहे कितना भी पश्चिमी प्रभाव हो लेकिन फिर भी यहां कुछ सनातन संतों तथा महापुरुषों के प्रभाव तथा कृपा से भारत में संस्कार बचे हुए हैं। किसी स्वार्थवश जब माता-पिता बिना किसी सोच विचार के विवाह कर देते हैं तब ही इस तरह की स्थिति पैदा होती है। अन्यथा सुखी दाम्पत्य जीवन देखने को मिलता है। नाड़ी दोष में विवाह करने पर जो विकार उत्पन्न होते हैं उनसे आने वाली संतान भी प्रभावित होती हैं। प्रायः किशोर तथा किशोरियां भी आत्महत्या कर लेते हैं। सुखी परिवार के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है कि नाड़ी दोष के दुष्परिणामों तथा दुष्प्रभावों से बचने के लिए विवाह से पूर्व अष्टकूट के द्वारा कुंडली मिलान करवाई जाए तथा नाड़ी दोष होने पर विवाह बिल्कुल भी न करें। कैसे बनता है नाड़ी दोष वर-कन्या के जन्म नक्षत्र एक ही नाड़ी के नहीं होने चाहिए। दोनों की नाड़ियां भिन्न होनी चाहिए इसी को शुभ माना जाता है। तदानुसार आदि-आदि, मध्य-मध्य, अन्त्य अन्त्य नाड़ी होने पर विवाह अशुभ माना जाता है। यह आवश्यक होता है कि दोनों की नाड़ियां एक न हों। आदि-मध्य, मध्य-अन्त्य तथा आदि अन्त्य को शुभ माना जाता है। ऐसा न होने पर नाड़ी दोष माना जाता है। यदि दोनों नाड़ियां मध्य है तो इसे अति अशुभ माना जाता है। ऐसी स्थिति में विवाह नहीं करना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो दाम्पत्य जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। लड़ाई-झगड़ा, क्लेश, वाद-विवाद तथा अलगाव और मृत्यु का दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है। अन्त्य नाड़ी एक होने पर भी वैवाहिक जीवन कष्टमय हो जाता है। वर और कन्या की कुंडलियों में नाड़ी दोष होने पर विवाह को टाल देना चाहिए। इतना ही नहीं नाड़ी दोष होने पर ‘लिव इन में रहने वालों के लिए भी संकट के बादल घेर लेते हैं। ऐसी स्थिति में प्रेम तथा शारीरिक संबंध बनाने वालों के लिए भी अति दुष्कर स्थिति पैदा हो जाती है तथा परिणामस्वरूप शारीरिक-मानसिक तथा आर्थिक रूप से हानि होती है। नाड़ी दोष के कुप्रभाव यदि नाड़ी दोष बन रहा हो तो उन दोनों लड़का – लड़की को आपस में भूलकर भी प्रेम या विवाह नहीं करना चाहिए अन्यथा दोनों की ही मृत्यु होती है एवं उनके परिवार का भी सर्वनाश हो जाता है। नाड़ी दोष एक भयंकर महादोष है जिसके कारण न सिर्फ सम्बन्ध बनाने वाले लड़का-लड़की, अपितु उन दोनों के समस्त परिवार का भी समूल विनाश हो जाता है। परिवार रोगों कष्टों से घिर जाता है और अनेकों प्रकार की बाधाएं उनके जीवन में आने लगती हैं जिनका कोई समाधान नहीं हो पाता। इतना ही नहीं यह कुल के विनाश का कारण भी बन सकता है । प्रायः यह देखा गया है कि नाड़ी दोष होने पर दंपत्ति रोगों से घिर जाते हैं, नौकरी में/बिज़नेस में हानि होने लगती है, धन की हानि होने लगती है, परिवार में कलह रहता है, पति – पत्नी में प्रेम व सामंजस्य नहीं रहता। नाड़ी दोष से युक्त दंपत्ति को संतान प्राप्ति नहीं होती यदि संतान हो जाए तो वह स्वस्थ नहीं होती । लड़का – लड़की दोनों के ही परिवार जनों को कष्टों का सामना करना पड़ता है, परिवार के सदस्यों की मृत्यु होने लगती है जिसका निम्मित प्रायः रोग व एक्सीडेंट होते हैं। दंपत्ति व परिवार जनों को मृत्यु तुल्य कष्टों का सामना करना पड़ता है । यही कारण है कि इस महादोष से बचने के लिए ज्योतिष के ग्रंथों में इसके प्रति विशेष रूप से चेतावनी भी दी गयी है। शास्त्रों में नाड़ी दोष का उल्लेख भगवान श्री राम के गुरु ऋषि वशिष्ठ जी ने स्पष्ट कहा है कि –नाड़ी दोषे भवेन्मृत्यु गुणैः सर्वैः समन्वितः( वशिष्ठ संहिता, अध्याय 32 श्लोक 188 ) अर्थ– कुंडली में सभी गुण मौजूद होने पर भी नाड़ी दोष में प्रेम या विवाह करने से निश्चित रूप से मृत्यु हो जाती है। यह महाअपराध एवं महापाप है, ऐसे प्रेम व विवाह को त्याग देना चाहिए। मध्यनाडी पतिहन्ति पार्श्वेनाड़ी तु कन्याकामतस्मान्नाड़ो सदा त्याज्या दम्पत्यो शुभमिछुता( वशिष्ठ संहिता अध्याय 32 श्लोक 189 ) अर्थ – मध्य नाड़ी दोष होने पर प्रेम या विवाह करने से निश्चित ही वर की मृत्यु होती है और अन्त्य नाड़ी दोष में कन्या की मृत्यु होती है, इसमें किंचित

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क्या आज भी जीवित हैं हनुमानजी?

हनुमानजी इस कलयुग के अंत तक अपने शरीर में ही रहेंगे। वे आज भी धरती पर विचरण करते हैं। हनुमानजी को धर्म की रक्षा के लिए अमरता का वरदान मिला था। इस वरदान के कारण आज भी हनुमानजी जीवित हैं और वे भगवान के भक्तों तथा धर्म की रक्षा में लगे हुए हैं। जब कल्कि रूप में भगवान विष्णु अवतार लेंगे तब हनुमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, विश्वामित्र, विभीषण और राजा बलि सार्वजनिक रूप से प्रकट हो जाएंगे। कलयुग में श्रीराम का नाम लेने वाले और हनुमानजी की भक्ति करने वाले ही सुरक्षित रह सकते हैं। हनुमानजी अपार बलशाली और वीर हैं और उनका कोई सानी नहीं है।  लंका विजय कर अयोध्या लौटने पर जब भगवान श्रीराम जी युद्ध में सहायता देने वाले विभीषण, सुग्रीव, अंगद आदि को कृतज्ञतास्वरूप उपहार देते हैं तो हनुमानजी उनसे याचना करते हैं- ‘यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले। तावच्छरीरे वत्स्युन्तु प्राणामम न संशयः ।।’ अर्थात ‘हे वीर श्रीराम ! इस पृथ्वी पर जब तक रामकथा प्रचलित रहे, तब तक निस्संदेह मेरे प्राण इस शरीर में बसे रहें।‘ इस पर श्रीराम उन्हें आशीर्वाद देते हैं- ‘एवमेतत् कपिश्रेष्ठ भविता नात्र संशयः । चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका तावत् ते भविता कीर्तिः शरीरे प्यवस्तथा । लोकाहि यावत्स्थास्यन्ति तावत् स्थास्यन्ति में कथा।’ अर्थात ‘हे कपिश्रेष्ठ, ऐसा ही होगा, इसमें संदेह नहीं है। संसार में मेरी कथा जब तक प्रचलित रहेगी, तब तक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम्हारे शरीर में प्राण भी रहेंगे ही। जब तक ये लोक बने रहेंगे, तब तक मेरी कथाएं भी स्थिर रहेंगी। ‘

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महारक्षक भगवान नरसिंह देव

विष्णु पुराण की कथा के अनुसार सतयुग में हिरण्यकश्यप और हिरणाक्ष नामक दो असुर सम्राट हुए थे जो भगवान विष्णु के कट्टर विरोधी थे। प्रहलाद हिरण्यकश्यप और माता कयाधु की चार संतानों में से एक थे। जब प्रहलाद अपनी मां कयाधु के पेट में था तब उसके चाचा हिरण्याक्ष का भगवान विष्णु ने वराहावतार धारण करके वध कर दिया था। इससे कुंठित होकर उसके पिता हिरण्यकश्यप भगवान ब्रह्मा की तपस्या करने चले गए थे। इसके बाद दैत्य नगरी में हिरण्यकश्यप को न पाकर देवताओं ने वहां पर आक्रमण कर दिया था। उन्होंने दैत्य नगरी पर अधिकार कर लिया। जब वे कयाधु को बंदी बना अपने साथ ले जाने लगे तब नारद मुनि ने उन्हें रोक दिया। नारद मुनि ने इंद्र से कहा कि तुम एक गर्भवती स्त्री पर अत्याचार नहीं कर सकते और वह भी तब कि जब उसके गर्भ में भगवान विष्णु का भक्त पल रहा हो। इसके पश्चात नारद मुनि कयाधु को इंद्र के चंगुल से छुड़ाकर अपने आश्रम में ले आये तथा हिरण्यकश्यप की तपस्या पूर्ण होने तक अपने आश्रम में रखा। इस दौरान नारद मुनि कयाधु को हरी भजन व भगवान विष्णु की कथाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन कर ज्ञान प्रदान करते रहे।  नारद मुनि के इन वचनों का सकारात्मक प्रभाव कयाधु के गर्भ में पल रहे अजन्मे प्रहलाद पर भी पड़ रहा था। यही कारण था कि जब उसका जन्म हुआ तब वह विष्णु भक्त बना। इसी बीच हिरण्यकश्यप की तपस्या समाप्त हो गयी तथा भगवान ब्रह्मा से उसने तीनों लोकों में सर्वशक्तिशाली होने का वरदान प्राप्त कर लिया। इसके बाद वह पुनः अपनी दैत्य नगरी वापस आ गया और वहां देवताओं का अधिकार हुए देखा। इसके बाद उसने अपने मिले वरदान से न केवल दैत्य नगरी को वापस पाया अपितु तीनों लोकों पर अधिकार स्थापित कर लिया और इंद्र देव को स्वर्ग के आसन से अपदस्थ कर दिया। हिरण्यकश्यप की तपस्या समाप्त हो जाने और पुनः अपनी नगरी लौट आने की सूचना मिलने के पश्चात कयाधु और भक्त प्रहलाद भी नारद मुनि से आशीर्वाद लेकर पुनः अपनी नगरी लौट गए। हिरण्यकश्यप भगवान ब्रह्मा से मिले वरदान के फलस्वरूप अति शक्तिशाली हो चुका था। इसी अहंकार में उसने विष्णु को भगवान मानने से इंकार कर दिया और स्वयं को भगवान की उपाधि दे दी। तीनों लोकों में जो कोई भी विष्णु की पूजा करता, वह उसे मरवा डालता किंतु जब उसने अपने स्वयं के पुत्र को ही विष्णु भक्ति में लीन देखा तो क्रोध की अग्नि में जलने लगा। हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रहलाद को समझाने के लिए आश्रम में नियुक्त आचार्यों को आदेश दिया कि इसे विष्णु भक्ति से विमुख करें। आचार्यगण पूरी कोशिश करते थे लेकिन इसका असर भक्त प्रहलाद पर नहीं होता था। वह खुद भी भगवान विष्णु की आराधना करता था और अपने सहपाठियों को भी इसके लिए प्रेरित करता था। कई तरह से उसे धमकाया और डराया गया, प्यार से भी समझाया गया लेकिन बालक प्रहलाद पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उसने अपने पांच वर्ष के छोटे से पुत्र प्रहलाद को मारने की कई बार चेष्ठा की लेकिन हर प्रयास असफल सिद्ध हुआ। उसने प्रहलाद को पागल हाथियों के सामने फिंकवा दिया ताकि वह उनके पैरों के नीचे कुचलके मारा जाये। सांपों से भरे कुएं में फिंकवा दिया। पर्वत की चोटी से नीचे खाई में फेंक दिया। बेड़ियां बांधकर समुद्र में फिंकवाया। अस्त्र-शस्त्र से मरवाने की कोशिश की, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से उसका बाल भी बांका नहीं हुआ। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जल सकती। उसने अपनी बहन होलिका को बुलाकर आग्रह किया कि वह प्रहलाद को लेकर अग्नि में प्रवेश कर जाए, इससे वह जलकर भस्म हो जाएगा। योजना के अनुसार होलिका भक्त प्रहलाद को लेकर अग्नि में प्रवेश कर गई । भक्त प्रहलाद तनिक भी नहीं डरा और भगवान विष्णु के मंत्र का जाप करता रहा। इसके फलस्वरूप होलिका जलकर भस्म हो गई और वह सुरक्षित बाहर निकल आया। तभी से भारतवर्ष में होलिका दहन किया जाता है। यह असत्य की पराजय का प्रतीक है। होलिका दहन के माध्यम से नकारात्मक शक्तियों का विनाश किया जाता है। अग्नि में जलवाने की कोशिश नाकाम हो जाने पर हिरण्यकश्यप के क्रोध का पारावार नहीं रहा। वह इस बात से भी बहुत कुपित था कि हर बार भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद के प्राणों की रक्षा हो जाती थी। अंत में हिरण्यकश्यप ने एक और प्रयास किया। उसने एक धधकते हुए खंभे पर प्रहलाद को लिपटने की आज्ञा दी। उसने कहा कि तेरा भगवान विष्णु तुझे आकर बचा सकता है तो बचा ले। भक्त प्रहलाद इस आपदा के समय में भगवान विष्णु का स्तवन करने लगा और सहायता के लिए प्रार्थना करने लगा। उसने जब खंभे की तरफ देखा तो वह हैरान रह गया क्योंकि उस पर चींटियां चल रही थीं। भक्त प्रहलाद ने प्रसन्न होकर भगवान विष्णु को मन ही मन धन्यवाद किया और उस खंभे से लिपट गया जो बिल्कुल ठंडा था। हिरण्यकश्यप ने जब देखा कि इस धधकते हुए खंभे पर लिपटने से प्रहलाद का कुछ नहीं बिगड़ा तो वह और भी क्रोधित हो गया। उसने तलवार निकाली और प्रहलाद की तरफ लपका। जैसे ही उसने प्रहलाद का वध करना चाहा वैसे ही वहां पर खंभे को फाड़कर भगवान विष्णु नरसिंह अवतार धारण कर प्रकट हो गए। उनका शरीर तो मनुष्य का था लेकिन मुख शेर का था। उनकी उंगलियां शेर के पंजे की तरह थीं। उनकी लाल आंखें क्रोध से धधक रही थीं। उनकी दहाड़ सुनकर हिरण्यकश्यप के हाथ से तलवार छूट गई। भगवान ने हिरण्यकश्यप को ललकारा। भक्त प्रहलाद ने भगवान विष्णु को पहचान लिया और वह उनका वंदन करने लगा। हिरण्यकश्यप ने कहा कि मुझे कोई नहीं मार सकता। मुझे भगवान ब्रह्मा ने वरदान दिया है कि मेरी मृत्यु किसी भी अस्त्र-शस्त्र से नहीं हो सकती। मुझे कोई भी, न धरती पर और न आसमान में, न भीतर और न बाहर, न सुबह और न रात में, न देवता और असुर, न वानर और न मानव मार सकता है। भगवान नरसिंह ने कहा कि देख! मैं तुझे मिले हुए वरदान की मर्यादा को बिना भंग किए ही तेरा वध करता हूं। यह कहकर भगवान उसे

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इंडियन एजुकेशन एक्ट का सच

1858 में इंडियन एजुकेशन एक्ट बनाया गया, इसकी ड्राफ्टिंग लार्ड मैकोले ने की थी लेकिन उससे उसने यहां भारत की शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था। उससे पहले भी कई अंग्रेजों ने भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट दी थी। अंग्रेजों का एक अधिकारी था जी डब्लू लिटनर (GW Leitner) और दूसरा था थॉमस मुनरो (Thomas Munro) दोनों ने अलग अलग समय सर्वे किया था। लिटनर जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था उसने लिखा कि यहां 97 प्रतिशत साक्षरता है और मुनरो जिसने दक्षिण भारत का सर्वेक्षण किया था उसने लिखा यहां 100 प्रतिशत साक्षरता है। मैकोले का स्पष्ट कहना था कि अगर भारत को हमेशा हमेशा के लिए गुलाम बनाना है तो इसकी देसी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी, तभी इस देश में शरीर से हिंदुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश कि यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे में काम करेंगे। मैकोले यहां एक मुहावरे का इस्तेमाल कर रहा है कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने से पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी, इसलिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया। जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज की तरफ से मिलती थी वो भी गैरकानूनी हो गई। फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया गया तथा इस देश के गुरुकुलों को घूम-घूम कर खत्म कर दिया गया। उनमें आग लगा दी गई, उनमे पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा पीटा, जेल में डाला। 1850 तक हमारे देश में लगभग 7 लाख 32 हजार गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गांव थे 7 लाख 50 हजार के करीब, मतलब हर गांव में औसतन एक गुरुकुल हुआ करता था। उस समय जो गुरुकुल होते थे वह सब आज की भाषा में हायर लर्निंग इंस्टिटयूट (Higher learning institute) हुआ करते थे। उन सबमें 18 विषय पढ़ाए जाते थे। इन गुरुकुलों को समाज के लोग मिलकर चलाते थे ना कि राजा महाराजा । इन गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी। इस तरह से सारे गुरुकुलों को खत्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया। कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया। उस समय इसे फ्री स्कूल कहा जाता था। इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी, बॉम्बे यूनिवर्सिटी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गईं और यह तीनों गुलामी के जमाने की यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में मौजूद हैं। मैकोले ने उस समय अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी, वह बहुत मशहूर चिट्ठी है। उसमें वह लिखता है कि इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपनी संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपनी परम्पराओं के बारे में कुछ नहीं पता होगा। इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे इस देश में होंगे तो भले ही इस देश से अंग्रेज चले जाएं लेकिन अंग्रेजीयत इस देश से नहीं जाएगी। उस समय लिखी गई इस चिट्ठी कि सच्चाई इस देश में अब साफ साफ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिए कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में इसलिए बोलते हैं कि दूसरों पर रौब पड़ेगा। हम तो खुद में हीन हो गए हैं। हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, दूसरों पर रौब क्या पड़ेगा ? लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी दरिद्र भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईसा मसीह भी अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईसा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा आरमेइक थी। आरमेइक भाषा की जो लिपि थी वो हमारी बंगला भाषा से मिलती-जुलती थी। समय के कालचक्र में तो भाषा विलुप्त हो गई। जो समाज अपनी मातृभाषा से कट जाता है उसका कभी भला नहीं होता और यही मैकोले की रणनीति थी जिसमें लगभग वो विजय पा चुका है। क्योंकि आजकल का युवा भारत को कम यूरोप को ज्यादा जानता है, वो भारतीय संस्कृति को ढकोसला समझता है और पाश्चात्य देशों की नकल करता है। सनातन धर्म की प्रमुखताओं और विशेषताओं को न जानते हुए भी वामपंथियों का समर्थन करता है। हम सभी को धर्म की जानकारी होनी चाहिए क्योंकि धर्म ही हमें राष्ट्र धर्म सिखाता है। धर्म ही हमें सामाजिकता सिखाता है। धर्म ही हमें माता पिता और गुरु व राष्ट्र के प्रति न्योछावर करने की प्रेरणा देता है। सनातन परम्परा एक आध्यात्मिक विज्ञान है, जिस विज्ञान को हम सभी आज जानते हैं। उससे बहुत प्रसिद्ध विज्ञान अध्यात्म है। -मई, 2023

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औषधिरूप हैं नवदुर्गा

नवदुर्गा, यानि मां दुर्गा के नौ रूप 9 औषधियों में भी विराजते हैं और समस्त रोगों से बचाकर जगत का कल्याण करते हैं। नवदुर्गा के नौ औषधि स्वरूपों को सर्वप्रथम ‘मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति’ के रूप में दर्शाया गया। चिकित्सा प्रणाली के इस रहस्य को ब्रह्माजी द्वारा दिए गए उपदेश में ‘दुर्गाकवच’ कहा गया है। ऐसा माना जाता है कि ये औषधियां समस्त प्राणियों के रोगों को हरने वाली और उनसे बचाकर रखने के लिए एक कवच का कार्य करती हैं, इसलिए इसे ‘दुर्गाकवच‘ कहा गया। प्रथम शैलपुत्री यानि हरड़ – नवदुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री माना गया है। कई प्रकार की समस्याओं में काम आने वाली औषधि हरड़, हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप हैं।  द्वितीय ब्रह्मचारिणी यानि ब्राह्मी – ब्राह्मी, नवदुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी है। यह आयु और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली, रूधिर विकारों का नाश करने वाली और स्वर को मधुर करने वाली है। इसलिए ब्राह्मी को सरस्वती भी कहा जाता है। यह मन एवं मस्तिष्क में शक्ति प्रदान करती है और गैस व मूत्र संबंधी रोगों की प्रमुख दवा है। यह मूत्र द्वारा रक्त विकारों को बाहर निकालने में समर्थ औषधि है। तृतीय चंद्रघंटा यानि चन्दुसूर – नवदुर्गा का तीसरा रूप है चंद्रघंटा, इसे चन्दुसूर या चमसूर कहा गया है। यह एक ऐसा पौधा है जो धनिये के समान है। इस पौधे की पत्तियों की सब्जी बनाई जाती है, जो लाभदायक होती है। यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है, इसलिए इसे चर्महन्ती भी कहते हैं। शक्ति को बढ़ाने वाली, हृदय रोग को ठीक करने वाली चंद्रिका औषधि है। चतुर्थ कूष्माण्डा यानि पेठा – नवदुर्गा का चौथा रूप कूष्माण्डा है। इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है, इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं। इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो पुष्टिकारक, वीर्यवर्धक व रक्त के विकार को ठीक कर पेट को साफ करने में सहायक है। मानसिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए यह अमृत समान है। यह शरीर के समस्त दोषों को कर हृदय रोग को ठीक करता है। कुम्हड़ा रक्त पित्त एवं गैस को दूर करता है । पंचम स्कंदमाता यानि अलसी – नवदुर्गा का पांचवा रूप स्कंदमाता है जिन्हें पार्वती एवं उमा भी कहते हैं। यह औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त, कफ, रोगों की नाशक औषधि है। षष्ठम कात्यायनी यानि मोइया – नवदुर्गा का छठा रूप कात्यायनी है। इसे आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका। इसके अलावा इसे मोइया अर्थात माचिका भी कहते हैं। यह कफ, पित्त, अधिक विकार एवं कंठ के रोग का नाश करती है। सप्तम कालरात्रि यानि नागदौन – दुर्गा का सप्तम रूप कालरात्रि है जिसे महायोगिनी, महायोगीश्वरी कहा गया है। यह नागदौन औषधि के रूप में जानी जाती है। सभी प्रकार के रोगों की नाशक सर्वत्र विजय दिलाने वाली मन एवं मस्तिष्क के समस्त विकारों को दूर करने वाली औषधि है। अष्टम महागौरी यानि तुलसी – नवदुर्गा का अष्टम रूप महागौरी है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति औषधि के रूप में जानता है क्योंकि इसका औषधि नाम तुलसी है जो प्रत्येक घर में लगाई जाती है। तुलसी सात प्रकार की होती है- सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरुता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र। ये सभी प्रकार की तुलसी रक्त को साफ करती है एवं हृदय रोग का नाश करती है। नवम सिद्धिदात्री यानि शतावरी – नवदुर्गा का नवम रूप सिद्धिदात्री है, जिसे नारायणी या शतावरी कहते हैं। शतावरी बुद्धि, बल एवं वीर्य के लिए उत्तम औषधि है। यह रक्त विकार एवं वात, पित्त, रोग और हृदय को बल देने वाली महाऔषधि है। -मई, 2023

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राहु काल का वैज्ञानिक आधार

ज्योतिष एक अद्भुत विज्ञान है जिसे साक्षात ब्रह्मा जी ने मानवता के कल्याण के लिए प्रकट किया था। ज्योतिष को वेद का नेत्र भी कहा गया है। ज्योतिष शास्त्र के अधीन ही संपूर्ण संसार विद्यमान है। काल का ज्ञान भी ज्योतिष के अधीन ही है और इसी की गणना के अनुरूप सभी ग्रह मनुष्य को बल प्रदान करते हैं और उनके प्रत्येक कार्य को प्रभावित करते हैं। ज्योतिष विज्ञान त्रिकालदर्शी के रूप में मानवता के शुभ और अशुभ कार्यों का निर्धारण करने वाला अकाट्य विज्ञान है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, जन्म, मृत्यु सहित हमारे जीवन से जुड़े सभी विषयों का निर्धारण करने वाला ज्योतिष विज्ञान ही एकमात्र साधन है। ज्योतिष विज्ञान में ग्रहों की चाल और गणना के अनुरूप हमारे जीवन का काल निर्धारित होता है। वेदों-शास्त्रों में ज्योतिषीय गणनाओं के अनुरूप शुभ और अशुभ कार्यों का निर्धारण किया जाता है जिनमें राहु काल सबसे प्रमुख है। किसी भी शुभ कार्य को करने से पूर्व मुहूर्त देखने का जो शास्त्रोक्त विधान है उसमें राहु काल की प्रमुख भूमिका रही है। सनातन धर्म की तरह ही सभी धर्मों में शुभ और मांगलिक कार्य करने से पूर्व शुभ मुहूर्त पर विचार किया जाता है। अशुभ मुहूर्त में किया गया कोई भी मांगलिक कार्य कभी शुभ नहीं होता । यह सर्वविदित है कि नवग्रहों में शनि को कर्म फलदाता कहा जाता है। शनि महाराज हमारे कर्मों के अनुकूल ही फल प्रदान करते हैं। प्रायः लोग शनि से बहुत अधिक भयभीत रहते हैं परंतु शनि से भी प्रचंड प्रकोप राहु देव का माना जाता है। जितना भय लोगों को शनि से होता है उससे कहीं अधिक भय राहु का होता है। इसका कारण यह है कि राहु को स्वयं भगवान ब्रह्मा जी ने समस्त प्रकार की अशुभ घटनाओं, पूर्वाभासों एवं अपशगुनों का राजा होने की उपाधि दी है। इसका वर्णन हरिवंश पुराण में देखने को मिलता है। जब भी हमें जीवन में कुछ अशुभ होने का आभास होने लगता है तो यह समझ लेना चाहिए कि राहु का प्रकोप शुरू हो गया है। गरुड़ पुराण में उल्लेख मिलता है कि सभी ग्रहों का प्रतिदिन एक निश्चित अवधि के लिए पृथ्वी पर विशेष प्रभाव पड़ता है यह अवधि लगभग डेढ़ घंटे की होती है। प्रतिदिन सूर्य से लेकर चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और राहु सहित सभी ग्रह अपने-अपने समय के अनुरूप पृथ्वी पर रहने वाले समस्त जीवों पर विशेष प्रभाव डालते हैं। इस अवधि को शास्त्रों में यामार्ध कहा गया है। प्रत्येक ग्रह के यामार्ध को उसका भोगकाल कहते हैं अर्थात वह काल जिसमें वह ग्रह विशेष रूप से बलवान होकर कार्य करता है। ज्योतिष शास्त्र में शुभ और अशुभ एवं मांगलिक कार्यों को संपन्न करने से पूर्व राहु काल को देखा जाता है। शुभ कार्य करने से पूर्व राहु काल पर भली भांति विचार करने के बाद ही मांगलिक कार्यों का निर्धारण होता है। शुभ मुहूर्त के अतिरिक्त मनुष्य के जीवन में अनेक ऐसे अशुभ मुहुर्त भी होते हैं जिनसे वह अनजान रहता है। अशुभ मुहूर्त में किया गया कोई भी कार्य सफल नहीं होता। उस कार्य में अनेक प्रकार की बाधाएं आती हैं इसलिए राहु काल की गणना को समझना प्रत्येक व्यक्ति के लिए अत्यंत अनिवार्य हो जाता है। राहु काल के समय भूलकर भी नया बिजनेस शुरू नहीं करना चाहिए। इस काल में शुरू किए गए बिजनेस कभी सफल नहीं होते या बिजनेस में तरह-तरह की बाधाएं आती हैं। राहु काल में किसी भी प्रकार का अनुष्ठान और यज्ञ इत्यादि वर्जित हैं। यदि इस समय आप यज्ञ इत्यादि करते हैं तो उनका कोई फल नहीं मिलता अपितु हानिकारक परिणाम भी मिल सकते हैं। हर प्रकार के शुभ कार्यों के लिए भी राहु काल वर्जित बताया गया है । विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, विशेष व्यक्ति से मिलने वाली अपाइंटमेंट, निर्माण कार्यों का उद्घाटन इत्यादि अनेक प्रकार के ऐसे मांगलिक कार्य हैं जिनमें राहु काल का विशेष ध्यान रखा जाता है। राहु काल में किए जाने वाले मांगलिक कार्य अनेक प्रकार की बाधाओं और अनिष्टों को पैदा करते हैं इसलिए प्रतिदिन राहु काल का विशेष ध्यान रखना चाहिए। राहु काल को भली प्रकार समझने के लिए यह जानना अत्यंत जरूरी हो जाता है कि राहु है क्या और यह छाया ग्रह हमारे जीवन में क्यों महत्वपूर्ण है? राहु का विचार किए बिना कुंडली विश्लेषण सफल नहीं माना जा सकता। मांगलिक कार्यों के अतिरिक्त राहु का हमारे पूरे जीवन में भी व्यापक प्रभाव पड़ता है। असुर और राक्षसी ग्रह होने के कारण राहु को क्रूर ग्रह बताया गया है जो धर्म और सात्विकता से सदैव दूर रहता है। मांगलिक कार्य धर्म के अधीन आते हैं इसलिए राहु अपने विशेष समय में जिसे हम राहु काल कहते हैं, इन कार्यों को बाधित करता है। कुंडली में भले ही राहु ग्रह को छाया ग्रह बताया गया है लेकिन इसकी छाया अत्यधिक भीषण परिणाम प्रदान करने वाली होती है। राहु यदि अच्छा है तो अच्छे परिणाम देता है मगर यदि बुरा है तो व्यक्ति के जीवन में हर कदम पर बाधा उत्पन्न करता है। छल, कपट से अमृत पीकर अमर होने के कारण राहु के प्रभाव से कोई नहीं बच पाया। शास्त्रों में राहु को दुख का कारक बताया गया है। जिस व्यक्ति की कुंडली में राहु खराब अवस्था में होता है वह व्यक्ति अनेक प्रकार के दुखों से ग्रस्त रहता है। ऐसे व्यक्ति के लिए कहा जाता है कि वह सुख में भी सदैव दुख का अनुभव करता है। खराब राहु हमेशा अशुभ फल प्रदान करने वाला बताया गया है। जिस जातक की कुंडली में राहु खराब होता है उसे हर कार्य में अशुभ फल प्राप्त होते हैं। राहु की महादशा और अंर्तदशा के समय अशुभ फल और अधिक बढ़ने लगते हैं इसलिए ज्योतिष शास्त्र में राहु को शांत करने के उपायों का वर्णन किया गया है। बुरे प्रभाव से ग्रस्त राहु कानून और धर्म विरोधी हो जाता है। जिस व्यक्ति का राहु खराब होता है वह हमेशा धर्म और अपने गुरुओं की निंदा करता है। ऐसा व्यक्ति धर्म से दूर भागता है और उसका झुकाव हमेशा अधार्मिक कार्यों की ओर होता है। राहु के बारे में माना जाता है कि यह अनैतिक और अधार्मिक कार्यों में संलिप्त रहता है और इसी से उसकी

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Shree Mahabrahm Maykhana: A Mystifying Enigma

His Holiness Mahabrahmrishi Shree Kumar Swami Ji indited a collection of sacred writings/verses combined to form a Divine Entity in itself — Shree Mahabrahm Maykhana. At the mere age of 12, Gurudev Ji penned down the essence of the Supreme Being and the ecstasy of knowing and embracing our Creator in the holy stanzas of the Ruhani Maykhana, which was honored by many dignitaries – the President of India; the late poet, Harivansh Rai Bachchan; along with numerous such prominent writers and officials. This spiritual epic should not be mistaken for its association with a tavern, as it embodies the essence of the Almighty and serves as the source of mystical knowledge. Shree Mahabrahm Maykhana transcribes the Holy Spirit as the ultimate “Saaqi” and its elixir as the ultimate “Paymana,” a drink poured by God himself for humanity that leads not only to the point of salvation but far beyond. This poetic paragon is dedicated to that “Saaqi” (the Divine Being) whose wholesome elixir elicited a great passion within the writer’s “bejaan kalam” (lifeless pen) to render spontaneous flutterings on the heart of the paper – “Samarpan uss saaqi ko jiska jaam pee kar yeh bejaan kalam anaayaas hi kagaz ke seene par machal uthi hai.” The Ruhani Maykhana is an amalgamation of all spiritual teachings; a convergence of millions of Ram-Krishna and Brahma-Vishnu-Mahesh into the omnipotent “Shree,” the Great Brahm. Reciting “Shree Mahabrahm Maykhana” serves as a conduit to universal energy. It initiates a cascade of manifestations, be it abundant wealth, relief from physical and mental ailments, or any and every problem under the sun and beyond, for the sanctified verses of the Ruhani Maykhana encapsulate the entirety of Maa Bhagwati within them. Gurudev Ji’s masterly craftsmanship exceeds the realms of the possible as He has blessed and enriched our lives with the existence of this revered scripture. The sheer bliss of reading each couplet cannot be expressed in mere words of any language. Guided by Divine Inspiration, Gurudev Ji composed this epitome of poesy to rid mankind of all human sufferings. Every individual is set to undergo a distinct and vivid experience while reading the Ruhani Maykhana. It is an adventure in itself and its glory cannot be sung by a thousand hymns or poems.

General, Mahabharat

अहंकार का परिणाम

विनम्रता व समर्पण ही व्यक्ति को महान बनाती है और परमात्मा तक पहुंचा देती है। जब तक मनुष्य विनम्र होगा और अहंकार रहित होगा तब तक उसमें विकार नहीं आता। वह सतत् ऊपर की ओर बढ़ता जाता है। लेकिन प्रायः ऐसा होता है कि जैसे ही उसे कोई मुकाम मिल जाता है वह वही रुक जाता है। इतना ही नहीं कुछ समय पश्चात् वह अहंकार भाव से भर जाता है। उसकी सोच यह होती है कि जो कुछ भी मैंने प्राप्त किया है वह मैंने अपनी योग्यता से किया है। इसमें किसी का कोई योगदान नहीं है। ऐसे कई उदाहरण हैं कि विश्व की बड़ी हस्तियों ने अपनी विनम्रता व पाठ के प्रभाव से उच्च पद को प्राप्त किया लेकिन पद पर पहुंचने के उनमें अहंकार आ गया और पाठ से विमुख हो गए। इसका परिणाम यह निकला कि उनका पुनः पतन हो गया। तपोराज तप से राज्य की प्राप्ति होती है और तप के क्षय होने पर पुनः नर्क की प्राप्ति हो जाती है। अतः तप करते रहना चाहिए, सत्य को कभी नहीं भूलना चाहिए।  युधिष्ठिर को अपनी सच्चाई गर्व हो गया था लेकिन एक झूठ के कारण उन्हें भी नर्क भोगना पड़ा था। महाभारत युद्ध में उन्होंने कहा कि अश्वत्थामा मारा गया जबकि अश्वत्थामा नाम का हाथी मारा गया था। इसी अर्द्धसत्य ने उन्हें नर्क की पीड़ा भी अंतिम समय में दी थी कि उनकी तब उंगली गल गई। थी जब वे स्वर्गारोहरण कर रहे थे। बालि ने भगवान राम से पूछा कि मुझे आपने क्यों मारा? क्या मैं आपका बैरी हूं और सुग्रीव प्यारा है? भगवान ने कहा कि जो व्यक्ति विनम्रता को छोड़कर अहंकार के वश होकर गलत कार्य करने लगता है और मर्यादाओं को भंग करता है, उसे दंडित करने में कोई बुराई नहीं है। तुमने अहंकारवश अपने भाई का राज्य छीन लिया और उसकी पत्नी को भी अपने घर में पत्नी के रूप में रख लिया है। अतः तुम जैसे दोषी को मृत्युदंड देने में कोई पाप नहीं है। इसी प्रकार भीष्म पितामह जब कुरुक्षेत्र के मैदान में शरशैय्या पर लेटे हुए थे तब भगवान श्रीकृष्ण उनसे मिलने के लिए आए। भीष्म पितामह ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि हे प्रभु, मैंने सारा जीवन धर्माचरण में व्यतीत किया और अपनी प्रतिज्ञा का वहन किया। लेकिन क्या कारण है कि अंतिम समय में मुझे तीरों की नोक पर लेटना पड़ रहा है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि हे भीष्म, आप सभी के लिए और स्वयं मेरे लिए भी वंदनीय हो । आपका प्रश्न जायज है। आपने उम्र भर अपने कर्तव्यों का पालन किया और पूरे कुल का संरक्षण व संवर्धन प्रदान किया। आपको याद नहीं है कि जब आप युवावस्था में थे तब आप में इतना अहंकार था कि किसी को कुछ नहीं समझते थे। आपने युद्धों में कितने ही सैनिकों व जीवों का संहार किया है। शिकार में न जाने कितने पशुओं का वध किया है। (बोधगया समागम) –प्रभु कृपा पत्रिका,जनवरी, 2019

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