Jagadguru MahaBrahmrishi Shree Kumar Swami ji

Author name: Team - Mahabrahmrishi Shree Kumar Swami Ji

Q&A with Gurudevji

निष्काम भावना का सच

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, आज के युग में धर्म नहीं है बल्कि आजकल धर्म का सिर्फ प्रदर्शन है। जिस तरह से लोग बात करते हैं, निष्काम भावना की, निष्काम होने के प्रदर्शन की लेकिन उनके मन में कोई-न-कोई कामना रहती है। ऐसा क्यों? परम् पूज्य गुरुदेव : यह वाक्य सभी संतों ने लिखा है कि जो निष्काम भावना से प्रभु की भक्ति करते हैं, उन्हें सब कुछ प्राप्त होता है। जैसे कि भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है, सद्गुरु नानक देव जी ने श्री गुरुग्रंथ साहिब में लिखा है, ऐसा ही बाइबिल एवं कुरान में भी लिखा है कि जो निष्काम भावना से कर्म (भक्ति) करते हैं, उन पर प्रभु प्रसन्न होते हैं। जो व्यक्ति निष्काम भावना से कुछ प्राप्त करने की इच्छा रखता है, उसे जीवन में कुछ नहीं मिलता है। निष्काम भावना का अर्थ है कि मेरी कोई भी कामना नहीं है। जो प्रभु दे, निरोग करे, मुझे धन दे, मुझे अपयश दे, सुंदरता दे, मुझे रोगी बना दे, तब भी ठीक है। प्रभु मेरी इच्छा माने या न माने, मेरी बेटी स्वस्थ हो या न हो, मेरा पति मुझ पर प्रसन्न रहे अथवा न रहे, मेरा संसार में यश-कीर्ति रहे या न रहे, जो आपकी इच्छा हो वह हो- इस तरह की भावना को निष्काम भावना कहा जाता है। यह जो निष्काम भावना है उसका अर्थ ही है कि वह कामना करके निष्काम भावना का नाम ले रहा है। निष्काम भावना का अर्थ है कि प्रभु हमारा जो जीवन है वह आपके प्रति समर्पित है। आपकी जो इच्छा हो, वही सर्वोपरि है। मैं अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक बस, आपके इच्छा का सम्मान करता रहूँ। आपको जो अच्छा लगे, वहीं मुझे भी अच्छा लगे, इसका अर्थ निष्काम भावना है। अगर कोई व्यक्ति यह सोचेगा कि मैं निष्काम भावना रखूंगा। तो मुझे हर चीज की प्राप्ति हो जायेगी। ऐसे व्यक्तियों की भगवान् भी परीक्षा लेते हैं कि सचमुच यह व्यक्ति निष्काम भावना से भक्ति कर रहा है अथवा नहीं। जैसे प्रहलाद ने निष्काम भावना से प्रभु का नाम लिया, सिमरण किया। भगवान् श्रीकृष्ण चाहते तो पांडवों को जुए में जिता सकते थे। अगर चाहते तो पांडवों को बारह साल के वन भ्रमण से उबार सकते थे। लेकिन भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा कि दुःखों के समय में ये हमारी भक्ति करते हैं या नहीं। जब भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा कि वह ऐसी स्थिति में भी निष्काम भावना से भक्ति कर रहे हैं तो उन्होंने पांडवों को सब कुछ दिया। कुरान-ए-पाक को कहा जाता है कि यह लिखी गई नहीं है बल्कि उतरी हुई है। यह हजरत मोहम्मद साहिब ने नहीं लिखी है बल्कि यह हजरत मोहम्मद साहिब के द्वारा लाई गई है। इसी तरह श्री गुरु ग्रंथ साहिब है, गीता है, बाइबिल है। इस तरह जो धर्मग्रंथ हैं, मगर उस पर किसी का नाम है। यह जानकर आप हैरान होंगे कि श्री गुरुग्रंथ साहिब गुरु नानक देव जी ने नहीं लिखा। वह अनंत अनंत संतों की वाणी है लेकिन इन सभी के पीछे सद्गुरु नानक की जो वाणी थी, उसमें उनका नाम नानक जी लिख दिया गया। वे सारे गुरू चाहते तो नीचे अपना नाम भी दे सकते थे। उनकी इस महानता के कारण श्री गुरुग्रंथ साहिब गुरु की तरह सारे संसार को प्रकाशित कर रहा है। इसी तरह जब भी किसी संत का पतन होता है तो वह उसके अपने होने पन से होता है, उसका विकास रुक जाता है। जैसे कोई बैलगाड़ी चल रही है, उसके नीचे कोई कुत्ता चल रहा है और कुत्ता यह समझे कि यह बैलगाड़ी जो है वह मेरे कारण चल रही है। अगर मैं यहाँ से हट जाऊँगा तो यह बैलगाड़ी नहीं चल पायेगी। संत का जो अस्तित्व है, वह कुत्ते की तरह है, इससे ज्यादा नहीं है। सद्गुरु नानक ने संतों ने यहाँ तक लिखा है कि मैं तो राम का कुत्ता हूँ। मेरे गले में जो रस्सी बांधी है, वह परमात्मा ने बाँधी है और मेरा इतना ही प्रभाव है। जो संत अपनी विराटता का प्रदर्शन करते हैं, शोभा यात्रा का प्रदर्शन करते हैं, अपने सूत्रों का प्रदर्शन करते हैं। नाम नारायण का लेंगे, नाम भगवान् शिव का लेंगे लेकिन चित्र अपना लगायेंगे। इससे किसी का कल्याण नहीं होता है। उससे किसी भी मानव को लाभ नहीं होता है। इससे अपयश ही होता है और किसी रोगों का निदान भी नहीं होता है। जब भी किसी का कल्याण होता है तो वह परमात्मा के द्वारा ही होता है, ऐसा ऋषि-मुनियों ने ग्रंथों में लिखा है। प्रभु के द्वारा ही इस जगत् में सब कुछ होता है। हम न तो चाँद, तारे, सूर्य एवं पृथ्वी बना सकते हैं। प्रभु के द्वारा ही इन सभी चीजों का निर्माण हुआ है। अगर हम एक लाख या दस लाख लोगों को प्रभावित भी कर लेते हैं तो इसके आगे अर्थ क्या है? सच्चाई तो यह है कि हम एक बाल का भी निर्माण नहीं कर सकते हैं।

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परमात्मा को कैसे पाएं ?

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, यह जिज्ञासा है कि किस प्रकार से परमात्मा की प्राप्ति की जाये ? गुरुदेव कृपा करें। परम् पूज्य गुरुदेव : यह प्रश्न इस जगत् में सबसे श्रेष्ठ प्रश्न है। आजकल चाहे बच्चे हों, जवान हों या बूढ़े हों, सभी काम, धन, यश, वैभव के पीछे भाग रहे हैं। इस जगत् में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जिसकी कोई कामना नहीं होती है। जब भी कोई मानव परमात्मा की प्राप्ति का साधन पूछता है तो इसका अर्थ है कि उस व्यक्ति ने पूरी तरह से जगत् को देख लिया है, समझ लिया है क्योंकि अति श्रेष्ठ आदमी ही परमात्मा की प्राप्ति करने के साधन को तलाशता है, कामना करता है। हमारे भगवान् महावीर, बुद्ध, सद्गुरु नानक, कबीर, रविदास, मीरा आदि ने इस संसार को नश्वर समझा, नाशवान् समझा। तत्पश्चात् उन्होंने वैसी साधना की, जिसके फलस्वरूप उन सभी को परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त हुआ। अन्यथा इस जगत् में कोई भी मानव परमात्मा की प्राप्ति की कामना नहीं करता है। जब अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा कि प्रभु परमात्मा को कैसे पाया जा सकता है? तब भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि अगर मानव परमात्मा को प्राप्त करना चाहता है तो उसे सर्व प्रथम ऐसे सत्गुरू (संत) के पास जाना होगा जिन्होंने परमात्मा को जाना है। ऐसे तत्ववेत्ता संत से परमात्मा के संबंध में पूछे। जैसे अष्टावक्र ऋषि ने राजा जनक को कुछ ही क्षणों में परमात्मा की जानकारी दे दी थी। भगवान् श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के मैदान में किस तरह अर्जुन को विराट रूप दिखाकर परमात्मा के दर्शन करा दिये। अर्थात् जो तत्ववेत्ता संत परमात्मा के बारे में जानते हैं, सर्वप्रथम उन्हें गुरु मानकर उनसे इस विषय का सार पूछें। सद्गुरु के संपर्क में आने पर संबंधित मानव परमात्मा को एक दिन अवश्य जान जाता है। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, एक व्यक्ति ने जिज्ञासा की है कि क्या मुझमें गुण हैं या मैंने ऐसे पुण्य कर्म किए हैं कि मैं प्रभु को प्राप्त कर सकूं? परम पूज्य गुरुदेव : जब-जब हमें ऐसा ध्यान आएगा कि हमारे में कुछ ऐसे गुण हैं या सद्कर्म है कि प्रभु प्राप्ति हो जाए तो प्रभु प्राप्ति में अवरोध उत्पन्न होगा। अपने पुण्य कर्मों का अहंकार जागृत होगा तो इस प्रकार की विचारधारा नहीं रहनी चाहिए अच्छे कर्म सोने की बेड़ी (हथकड़ी) है एवं बुरे कर्म लोहे की बेड़ी है। लेकिन बन्धन दोनों में हैं। जब हममें पूर्ण समर्पण भाव पैदा होता है कि एक-एक श्वास प्रभु का है। हम तो कठपुतली की भांति असमर्थ है तो व्यक्ति को प्रज्ञाबोध होता है और जब-जब आप स्वयं को इस बात का विश्वास दिलाते रहेंगे कि आपमें प्रभु पाने की सामर्थ्य है तो आपको अहंकार का अंश छूने लगता है एवं आप प्रभु कृपा, उसकी दिव्यता से दूर होते चले जाते हैं। लेकिन समर्पण भाव से वैराग्य की भावना का समावेश होता है। ‘किस विधि तुमको ध्याऊं मैं कुमति में मूरख खल कामी, तुम पालनकर्ता।’ हम रोज आरती में पढ़ते हैं। लेकिन जब हम अपने आचार-व्यवहार में भी ऐसी भावना लाते हैं तो प्रभु स्वयमेव प्रकट हो जाते हैं। जैसी तीव्र भावना हम दुनियावी सुखों की प्राप्ति के लिए करते हैं, वही तड़प, व्याकुलता प्रभु के लिये भी हो तो चमत्कार हो जाता। है। जब वह प्रयत्न छोड़ देता है, साधना, ध्यान छोड़ देता है तो वास्तविक तलाश शुरू होती है। ऐसी तलाश में जब व्यक्ति स्वयं खो जाता है, डूब जाता है, घूंघट के पट खोल देता है तो प्रभु सामने आ जाते हैं। नारियल को तोड़े बिना आप उसकी गिरी का फल नहीं पा सकते। ऐसे ही अपने अहम् को भी बाहरी आडम्बरों को हम चूर-चूर कर दे तो परमात्मा तो बैठा ही है हमारे समीप ।

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सूर्य कवच के अद्भुत प्रभाव

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, शास्त्रों में सूर्य कवच के बारे में बड़ी चर्चा मिलती है। सूर्य कवच कैसे धारण किया जाये तथा इसके धारण करने से क्या लाभ है? परम् पूज्य गुरुदेव : सूर्य कवच धारण करने के पूर्व अर्थात् सबसे पहले आप “ॐ गुरुवे नमः’ का 11 बार उच्चारण करेंगे। उसके पश्चात् जो आपके गुरु हैं, ईष्ट हैं उनका सिमरण करेंगे। तत्पश्चात् आप ‘गणेशाय नमः’ का 11 बार उच्चारण करेंगे। उसके बाद कवच का पाठ करेंगे तो थोड़े ही दिनों में देखेंगे कि भगवान सूर्य का कैसा अनुपम चमत्कार आपके जीवन में हो रहा है। आप हैरान रह जायेंगे कि बड़ी से बड़ी विद्या ग्रहण करने के पश्चात् हम जो इस संसार में वे सफलता नहीं पा सके थे, वह मात्र सूर्य कवच पढ़ने से ही पूर्ण हो गये। तब आप सूर्य की महिमा को महसूस करेंगे। वैज्ञानिक सूर्य को एक आग का गोला मात्र मानते हैं जबकि आध्यात्मिक तल के अनुसार जो सूर्य तत्व को जानने वाले हैं, वह किसी भी तरह से कुछ भी कर सकते हैं। सिर्फ 40 दिन सूर्य कवच धारण करने से आप पायेंगे कि शरीर में एक अलग तरह की आभा आ गई है। आपके शरीर को चारों तरफ से किरणों ने घेर लिया है। अगर कोई व्यक्ति 140 दिन सूर्य कवच धारण करके किसी शेर के पास बैठ जाएगा तो ऐसे व्यक्ति का शेर भी भक्षण नहीं कर पाएगा, ऐसी सूर्य कवच की महिमा है। भगवान् रामचंद्र के पुत्र लव-कुश शेरों के साथ खेलते थे, शेर के मुँह में उंगली डाल देते थे, फिर भी शेर कुछ नहीं करता था क्योंकि भगवान बाल्मीक ने दोनों बच्चों को बचपन से ही सूर्य कवच की महिमा बताई थी और लव – कुश नित्य सूर्य कवच पढ़ते थे। इस सूर्य कवच को पढ़ने से ही लव-कुश में अथाह शक्ति का संचार हो गया था। यही कारण है कि लक्ष्मण, शत्रुघ्न, हनुमान आदि अविजित होते हुए भी लव-कुश के हाथों हार गये थे, ऐसी है भगवान सूर्य की कृपा।

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रोगों का मूल आधार भावना

गुरुदास: परम पूज्य गुरुदेव, जैसा कि माना जाता है कि भावनाए प्रभु के पास जाती हैं या भक्ति का मार्ग बनाती हैं तो भावनाएं रोगों का आधार कैसे होती हैं? कृपया इस रहस्य को स्पष्ट करें। परम पूज्य गुरुदेव : यह प्रश्न जगत के लिए अत्यन्त कल्याणकारी है। इसे समझने के लिए काफी समय और बहुत से आयामों की आवश्यकता है। इसका अर्थ इतना गहन है जितना समुद्र की गहराई। इसको समझने के लिए शांत चित्त और मन से पार की अवस्था चाहिए, भावनाओं की अवस्था चाहिए। इस जगत में जितने भी कार्यकलाप हो रहे हैं, झगड़े हो रहे हैं, युद्ध हो रहे हैं वे सब भावनाओं पर आधारित हैं। सभी धर्म यह मानते हैं कि परमात्मा एक है। हिन्दू कहता है एक परमात्मा है, मुसलमान कहता है एक अल्लाह है, सिख कहता है एक ओंकार है और ईसाई कहता है एक गॉड है। जो परमात्मा को नहीं मानते वो भी कहते हैं कि एक तत्व है जिससे यह सारा जगत चल रहा है। उसको चाहे प्रकृति का नाम या परमात्मा का या तत्व का। वैज्ञानिक भी एक तत्व को स्वीकारते हैं जो इलेक्ट्रान, प्रोटान व न्यूट्रान का निर्माता है, उसका संचालन करने वाला है। आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति में आज जितनी औषधियां हैं उनमें से नब्बे प्रतिशत औषधियां मन पर अटैक करती हैं जिससे मन के भाव लोप हो जाएं और व्यक्ति रोग से मुक्त हो जाए। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो अच्छे कर्म हैं वे सोने की बेड़ी हैं, जो बुरे कर्म हैं वे लोहे की बेड़ी हैं। किसी कैदी को अगर आप जेल में डाल दें और हाथ-पैरों में हीरे जवाहरात की बेड़ियां डाल दें तब भी वह बंधा हुआ है। तब भी वह कैदी ही है। इसी तरह अगर किसी कैदी को लोहे की बेड़ियां डाल दी जाएं तब भी वह कैदी है। ऐसे ही यह जगत भावनाओं से बंधा हुआ है। लेकिन यथार्थ भावनाओं से परे है। अगर व्यक्ति को भावनाओं से पार जाना आ जाए तो सारे धर्म समाप्त हो जाएंगे, सारे युद्ध समाप्त हो जाएंगे। बस एक तत्व रह जायेगा। आज मनुष्य मानसिक रूप से इतना विक्षिप्त व परेशान है कि अपनी भावना को प्रसन्नता देना चाहता है, वह अपने मन को कुछ समय के लिए संतुष्टि देना चाहता है। अपनी संतुष्टि का उपाय सिगरेट, पान-सुपारी और नाना प्रकार के नशे आदि में ढूंढ़ता है। लेकिन आप यह जानकर हैरान होंगे कि इस जगत में ऐसा कोई उपाय कारगर नहीं हुआ। हमारे वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड की खोज कर ली। चांद पर पहुंच गए और न जाने किस-किस ग्रह पर पहुंच गए। हो सकता है वे कल सूर्य पर भी पहुंच जाएं, जहां पहुंचना संभव नहीं है। लेकिन वैज्ञानिकों ने ऐसी कोई खोज नहीं की जिससे पहने मन पर नियंत्रण कर सकें। व्यक्ति जितना सुख पा रहा उतना ही दुःख पायेगा। परिवार में जो सदस्य आपको जितना सुख दे रहे हैं उतना आपको दुःख देंगे, यह निश्चित है। जितना दिन होगा उतनी रात होगी। भगवान श्रीकृष्ण, सद्गुरु नानकदेव जी, हजरत मुहम्मद, ईसा मसीह आदि संतों ने इस जगत को खेल कहा है। इस जगत को माया कहा है। जब कोई तत्त्ववेत्ता संत किसी व्यक्ति को मिल जाता है तो वह उसे भावनाओं से परे ले जाता है। और जब व्यक्ति मन से परे जाने की अवस्था को जान लेता है तो समस्त रोगों से मुक्ति पा लेता है। इस जगत में भक्ति भावनाओं से ही है। इसलिए भावना कितनी अच्छी चीज होगी क्योंकि वो भक्ति का निर्माण कर रही है उससे हमारे में भक्ति आ गई है। हमारा जगत में प्रेम हो रहा है। यह सत्य है कि भक्ति भावना से बनती है। भावना से भक्ति का निर्माण होता है। जैसे हम किसी रास्ते में जा रहे हैं तो हम कोई वाहन लेकर जाते हैं और वाहन के द्वारा हम उस मंजिल पर पहुंचते हैं। जब भी हम किसी मंजिल पर पहुंच जाते हैं तो वाहन की आवश्यकता नहीं रहती । जैसे कोई डॉक्टर ऑपरेशन कर रहा है। वह औजारों के द्वारा ऑपरेशन करता है। अगर वो डॉक्टर उस रोगी पर औजार चलाता ही रहे तो रोगी की मृत्यु हो जाएगी। ऐसे जो भक्ति है यह भी एक मार्ग है, एक वाहन है, एक साधन है। भावना हमारे लिए वाहन है। यह हानिकारक भी है और कल्याणकारी भी है। इसके अर्थ को समझने के लिए बड़ी गहनता और शांति की आवश्यकता है। यह बड़ा क्रांतिकारी, बड़ा विस्फोटक और आनंददायक प्रश्न है। इसको समझने के लिए प्रभु की परम कृपा की आवश्यकता है। तभी इसके उत्तर को गहन रहस्यों को मानव समझ सकता है। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, अगर पति निर्मल भावना का नहीं है और स्त्री पति कल्याण के लिए उस घन को चोरी से छुपा रही है, उसकी भावना में कोई अशुभता नहीं है तो क्या वह रोगों का शिकार होगी? परम पूज्य गुरुदेव : यह प्रश्न बहुत से लोगों का हो सकता है। अगर किसी व्यक्ति की भावना शुद्ध है, उसके हृदय में किसी के प्रति प्रेम है तो यह उसी तरह है जैसे किसी को अगर प्रेम से आग लगाएंगे तो आग का काम है जलाना, वह जलायेगी। अगर कोई व्यक्ति नदी से प्रेम करेगा और उसका किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं है फिर भी यदि किसी को नदी में डुबोएगा तो वह आदमी डूबेगा । जितने भी चोर हैं वे जब चोरी करते हैं तो यही सोचते हैं कि अगर मैं इससे एक हजार रुपया ले भी लूंगा तो क्या फर्क पड़ेगा? मेरे बच्चे पल जाएंगे या मैं ऐसे हजारों आदमियों से हजार-हजार रुपया चोरी करके गरीबों का कल्याण करूंगा। जितने भी गलत कार्य करने वाले हैं उन्होंने कोई न कोई ऐसा तर्क रखा होता है जिससे वे चोरी या गलत काम करके मन को समझाते हैं। जो स्त्री यह सोचेगी कि मेरा पति जैसा भी है प्रभु कृपा से है क्योंकि पति या पत्नी से प्रभु अधिक शक्तिशाली है। प्रभु की कृपा का न पति को पता है न पत्नी को। यदि पति भी पत्नी से चोरी करेगा तो पति को भी ऐसा रोग भुगतना पड़ेगा जैसा पत्नी को है। यह नियम पति या पत्नी का नहीं

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नवरात्र के दिनों के अद्भुत रहस्य

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, नवरात्र का पुण्य पर्व पूरा विश्व मनाता है। आपने कई बार उल्लेख किया है कि इस पुण्य तिथि का बहुत अधिक महत्व है। इस पुण्य तिथि में हमारा जो व्यवहार है, जो गतिविधियां होती है, उससे रोगों के कारण बनते हैं। नवरात्र के दिनों में कौन-कौन से नियमों का पालन करना चाहिए, जिससे व्यक्ति अंतः एवं बाह्य दोनों स्थिति में रोगों से मुक्त हो सके। परम पूज्य गुरुदेव : नवरात्र के दिनों का मानव जगत में महत्वपूर्ण स्थान है। माँ जगदम्बा (दुर्गा) अन्य-अन्य नामों से पुकारी जाती हैं। इस जगत में जो मानव सुखी सम्पन्न, साधन सम्पन्न है उसने किसी-न-किसी जन्म में माँ जगदम्बा की भक्ति अवश्य की है। क्योंकि यह जो पूरा जगत् है वह माँ जगदम्बा की कृपा का ही प्रारूप है। नवरात्र माँ जगदम्बा के पावन दिवस के रूप में ग्रंथों द्वारा, शास्त्रों द्वारा वर्णित है। इन दिनों का बहुत अधिक महत्व है जिसकी महिमा अनंत-अनंत ग्रंथों में मिलती है। भगवान राम ने, भगवान श्रीकृष्ण ने, भगवान शिव ने, भगवान ब्रह्मा ने तथा सभी देवी-देवताओं ने इसके बारे में महिमा गाई है। भगवान श्रीकृष्ण ने जो स्वयं अवतार थे, अर्जुन को यह उपदेश दिया था कि वह दुर्गा कवच का पाठ करें। महर्षि अर्जुन ने माँ जगदम्बा का तप किया, पूजन-अर्चना की। जिसका उन्हें फल मिला, जिसे समस्त जगत जानता है। राजाओं में अकबर सभी धर्मों का आदर करते थे। अकबर ने भी माँ जगदम्बा को सोने का छत्र चढ़ाया था। जो व्यक्ति तप करता है, पाठ करता है, मां की आराधना करता है, उसे ही माँ का प्रतिफलन ज्ञात होता है। क्योंकि माँ जगदम्बा में ऐसी शक्ति है कि व्यक्ति चाहे कुछ भी कर सकता है, माँ जगदम्बा के कारण ही लोगों में कुछ करने की प्रेरणा के भाव का जन्म होता है। जो व्यक्ति नवरात्र के दिनों में मांस, मछली, प्याज, लहसुन का सेवन नहीं करता है। जो व्यक्ति नवरात्र के दिनों में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता है। अर्थात् इन नौ दिनों में विधि-विधान से पूजन करता है उस पर पूरे साल भर माँ जगदम्बा की कृपा बनी रहती है। अगर कोई इन नौ दिनों के अंदर गलत व्यवहार करता है तो उसे जिंदगी भर के लिए अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ता है। अगर कोई पति-पत्नी इन दिनों में विपरीत आचरण करेंगे तो उनकी गृहस्थी सफल नहीं होगी, दोनों के मध्य तलाक भी हो सकता है। जो व्यक्ति इन दिनों में माँ जगदम्बा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं, उन्हें माँ जगदम्बा हर प्रकार के साधन से सम्पन्न करती है। उन्हें किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता है, ऐसा शास्त्रों में वर्णित है। ये नौ दिन मानव कल्याण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

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मदिरा से मुक्ति का दिव्य उपाय

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, मदिरा की लत एक गंभीर रोग की तरह है, बहुत से लोग इसका शिकार होते हैं। इससे मुक्ति चाहते हैं आप कृपा करें कि इससे कैसे मुक्ति मिले ? परम पूज्य गुरुदेव : मदिरा से आदमी को थोड़ी देर के लिए मानसिक तनाव से विश्राम मिलता है इसके अलावा इसे पीने से रोग ही पैदा होते हैं। मदिरा आंखों पर भी प्रभाव डालती है, शुगर बढ़ता है, वजन बढ़ता है, कोलेस्ट्राल को बढ़ाती है, हृदय रोग को बढ़ाती है, पैप्टिक अल्सर भी इससे होता है। जगत में ऐसा कोई रोग नहीं है जो मदिरा से न होता हो। मंदिरा छोड़ने के लिए आदमी में इच्छा शक्ति की परम आवश्यकता है। अगर कोई व्यक्ति कहेगा कि मुझे मदिरा छोड़नी ही नहीं चाहे मेरा गुर्दा खराब हो जाए, लीवर खराब हो जाए, हार्ट अटैक पड़ जाए या मैं समाप्त ही क्यों न हो जाऊं तो ऐसे व्यक्ति के लिए कोई औषधि नहीं है। जो व्यक्ति अपने बच्चों का, तन, मन, धन का ध्यान रखना चाहता है, स्वस्थ रूप से जीना चाहता है, अगर वह संकल्प करे तो 2-3 माह में वह मदिरा का सेवन पूरी तरह छोड़ सकता है। इसकी औषधि इस प्रकार है- सदाबहार के फूल का रस, करेले का रस, सौंफ का रस, मैनमिष के पत्तों का रस, बेरीगेटाकेना के पत्तों का रस, टमाटर के बीज का रस, संतरे के छिलके का रस, मौसमी के छिलके का रस, खेजड़ी के पत्ते और खेजड़ी की जड़ का रस। इन सभी को मिलाकर एक बोतल में रख लें। शराब पीने वाला व्यक्ति जब भी शराब पीना चाहे उसे आधा चम्मच रस पिला दें। इससे उसे शराब का स्वाद भी आयेगा और नशा भी आएगा। इस तरह 2-3 माह के सेवन से धीरे-धीरे वह शराब से नफरत करने लगेगा क्योंकि उसकी चेतना जाग जायेगी और उसे पता चल जायेगा कि शराब मेरे लिए कितनी हानिकारक हैं। अगर कोई चिकित्सक या कोई व्यक्ति इसका प्रयोग करना चाहें तो मुफ्त में करें क्योंकि जिस तरह कोई मां अपना दूध नहीं बेचती, पुजारी भगवान नहीं बेचता, मां अपना प्रेम नहीं बेचती, अपने बच्चे को नहीं बेचती उसी तरह ये जड़ी बूटियां हैं। इनको व्यापार के रूप में इस्तेमाल न करें अन्यथा उस व्यापारी व्यक्ति को हानि हो सकती है। अतः इसका प्रयोग जन कल्याण के लिए ही करें।

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ऋतुकाल में स्त्रियों के लिए अद्भुत नियम

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, नारी जीवन में ऋतुकाल की महत्ता बहुत मानी जाती है और शास्त्रों में इस काल में नारी के लिए बहुत से कार्य निषिद्ध किए गए हैं जबकि आधुनिक नारी व्यवहार व दैनिकचर्या में लापरवाही बरतती है। जो कि हमारे ऋषियों-मुनियों ने उनके लिये निर्दिष्ट किए हैं। तो क्या इस उल्लंघन या अवहेलना का कोई दुष्प्रभाव नारी के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है ? परम पूज्य गुरुदेव : आपने अति महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा है। नारी को अवश्यमेव शास्त्रोक्त नियमों का पूर्ण श्रद्धा से पालन करना चाहिए। महाभारत की कथा सबको मालूम है कि कैसे ऋतु स्नान के काल में द्रौपदी को जनसभा में बुलाकर अपमानित किया गया और इसका अन्त कितना महा विनाशकारी विध्वंसकारी हुआ। ऋतु स्नान काल में अगर स्त्री तुलसी के पौधे को पानी दे दे तो पूरी जिंदगी वह तुलसी का पौधा फल-फूल नहीं सकता और अगर वह स्त्री गुलाब के पौधे को पानी दे दे तो पूरी जिंदगी उस गुलाब के पौधे पर फूल नहीं लगेगा। अगर कोई सांप किसी ऋतु स्नान वाली स्त्री को देख ले तो वह सांप अन्धा हो जाएगा। उस समय स्त्री के अन्दर जो आवेग ऊर्जा होती है वह खाद्यान्नों पर भी दुष्प्रभाव डालती है। जैसे जब पापड़ बन रहे हैं, अगर ऐसी स्थिति वाली स्त्री उसे देख लें तो वह पापड़ भूना जाने के बाद लाल रंग का हो जाएगा। अगर ऐसी स्त्री अपने हाथों से आटा गूंथ कर सोन चिड़िया को खिला दे तो खाते ही वह चिड़िया मर जाएगी। उन दिनों में (ऋतुकाल में) स्त्री के अन्दर से कोई दिव्य ऊर्जा निकल रही होती है। प्रभु कृपा से नकारात्मक शक्तियों का निष्कासन हो रहा होता है।

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रोगनाशक है बांसुरी की तान

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, बांसुरी की तान से कौन-कौन से रोगों का इलाज हो सकता है? परम पूज्य गुरुदेव : यह मानव कल्याण का प्रश्न है। पृथ्वी की उत्पत्ति अनहद नाद से हुई थी। अनहद नाद को ॐकार भी कहा गया है। ऋषि-मुनियों के अंतर में जिस परमात्मा की ध्वनि का अनुभव हुआ है वह नाद ही है। बांसुरी की ध्वनि में जो सातों स्वर हैं वे उसी तरह हैं। भगवान विष्णु जिनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, जब उन्होंने स्वयं श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया तो उन्होंने केवल बांसुरी के द्वारा ही मानव की सोई चेतना को जगाया। आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि भगवान श्रीकृष्ण ने सबसे पहले गाय को, स्त्रियों को यह संगीत सुनाया। क्योंकि जिस धरती पर गाय और स्त्रियां प्रसन्न रहती हैं वहां पर किसी प्रकार के दुःख का प्रारंभ ही नहीं होता। हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव की उत्पत्ति गाय से मानी है। जब मानव का पतन होता है तब वह बंदर की योनि में जाता है और नीचे गिरता जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने केवल गाय को प्रसन्न किया, स्त्रियों को प्रसन्न किया। स्त्रियों को कभी धन या किसी अन्य तरह से प्रसन्न नहीं किया जा सकता, वे प्रेम के वशीभूत होती हैं और गाय भी प्रेम के वशीभूत होती है। भगवान श्रीकृष्ण तो कोई भी वाद्य या ऐसा संगीत चुन सकते थे जिससे मानव चेतना को जगाया जा सके, लेकिन उन्होंने सिर्फ बांसुरी को चुना। जिसका परिणाम हम देख रहे हैं कि भारत में भक्ति है, प्रेम है, जबकि विदेशी संस्कृति में कोई भाई को भाई नहीं समझता, माता-पिता को कुछ नहीं समझते। बच्चे माता-पिता से भी साल में एक दिन मिलने जाएंगे, ऐसा कोई दिन बना देंगे जो ‘मदर डे’ या ‘फादर डे’ होगा। भारत की धरती पर जो प्रेम है, मर्यादा है वह अद्भुत है। भगवान श्रीकृष्ण ने बांसुरी की तान से अनेक रोगों का नाश किया। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया था, उस समय किसी को अर्थराइटिस, रूमोटिज्म, हाईपरटेंशन, थाइराईड, कैंसर, ट्यूमर जैसे कोई रोग नहीं थे। अगर कोई व्यक्ति भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके उसी की लय में उनकी भक्ति के संगीत में खोकर बांसुरी बजाएगा या सुनेगा तो उसके नाना प्रकार के रोगों का अंत होगा और उसके आने वाले रोग भी समाप्त हो जाएंगे, ऐसा ऋषि-मुनियों द्वारा जाना गया है।

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नीम के अद्भुत रहस्य

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, नीम किन-किन रोगों में प्रयोग होता है तथा उससे किन-किन रोगों का उपचार होता है ? परम पूज्य गुरुदेव : अगर कोई व्यक्ति जिन्हें टी.बी. है, अगर तीन माह नीम की छाया में सो जाये तो उसका टी.बी. रोग भी ठीक हो जायेगा। ऐसा नीम की हवा में प्रभाव है। जो भी व्यक्ति नीम की पत्तियों का प्रयोग करता है, नीम के फलों का सेवन करता है, उसे यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि नीम के पत्तों को संध्या के समय नहीं तोड़े। इस जगत में नीम, पीपल तथा वट वृक्ष ऐसे पेड़ हैं जिसके नीचे रात-दिन सोया जा सकता है, रहा जा सकता है। अन्यथा ऐसा दूसरा कोई भी वृक्ष नहीं है। यह नीम एलर्जी के लिए, खांसी, कफ, बालों, त्वचा, लीवर, किडनी, कैंसर, ट्यूमर, टी.बी. के लिए रामबाण औषधि है। ऐसा कोई भी रोग नहीं है जिसमें नीम का प्रयोग नहीं होता है। जो भी व्यक्ति नीम का सेवन करता है तो उन्हें इन बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि अलग-अलग रोगों के लिए अलग-अलग तोड़ने की विधि है। इनके अलग-अलग तोड़ने का समय है तथा अलग-अलग तोड़ने का मंत्र है। जिन व्यक्तियों को ट्यूमर है, कफ है, एलजी है, अस्थमा है तो उन्हें नीम दोपहर 2 बजे के बाद तोड़ना चाहिए। जो व्यक्ति मंत्र के साथ नीम के पत्ते उचित समय पर तोड़ता है तथा सुबह उबालने के बाद सेवन करता है, ऐसे व्यक्ति उक्त रोगों से मुक्ति पा जाते हैं। जिन स्त्रियों के बाल गिरते हैं या जिनके आँखों के नीचे कालिमा आ जाती है। वह सुबह के समय मंत्र के साथ नीम के पत्ते को तोड़ते हैं तथा केले एवं टमाटर के रस के साथ नीम की पत्तियों के रस को मिलाकर आँखों के नीचे अर्थात् कालिमा वाली जगह पर रसों को लगाते हैं तो पंद्रह दिन के अंदर उनका कालापन दूर हो जायेगा। इसी प्रकार नीम का अलग-अलग रोगों में अलग-अलग उपयोग है। अर्थराइटिस, गैस तथा रूमाटिज्म जैसे रोगों में भी नीम का प्रयोग होता है। कैंसर का इस धरती पर कोई इलाज नहीं है परंतु सिर्फ नीम से ही कैंसर रोग से मुक्ति पाई जा सकती है। इस नीम में दिव्य गुण हैं, औषधीय गुण हैं। अगर किसी व्यक्ति को नींद नहीं आती है तो ऐसे व्यक्ति सुबह नीम के तीन पत्ते तोड़ लें और तीन तुलसी के पत्ते तोड़ लें। तत्पश्चात् उन पत्तों को तकिये के नीचे रख लें तथा मंत्र ‘तद्विद्धि प्रणिपातेन…’ का तीन बार उच्चारण करें तो ऐसे व्यक्ति को पन्द्रह मिनट में नींद आ जायेगी। ऐसे व्यक्ति को किसी चिकित्सक के पास जाने की या नींद की दवाई का प्रयोग करने की जरूरत नहीं है। एड्स को दूर करने के लिए नीम का प्रयोग किया जा सकता है। लेकिन उसके लिए दैवीय आह्वान करना जरूरी है। इसके लिए सूर्य का मंत्र है। जिस भी व्यक्ति को वायरल अटैक करेगा या एड्स होगा तो उसका सूर्य ग्रह सदा कमजोर होगा। सूर्य की जो आभा है तथा शनि का जो प्रकोप है एवं राहु-केतु की जो दशा है, उसकी वजह से वायरस होता है या एड्स होता है। अगर सूर्य के मंत्र के साथ नीम का प्रयोग करेंगे तो एड्स जैसे रोगों से भी मुक्ति प्राप्त करेंगे।

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सात दिनों के गोपनीय रहस्य

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, विभिन्न दिवसों का वैज्ञानिक महत्व क्या है जैसे कि कहा जाता है कि मंगलवार और शनिवार को अगर कोई विशेष गतिविधि अपनाई जायेगी तो अधिक फल मिलेगा। भगवान हनुमान जी भगवान शनिदेव जी ईश्वर के रूप में माने जाते हैं तो हम इन्हें दिवस में कैसे बाँध सकते हैं ? परम पूज्य गुरुदेव : भगवान बजरंग बली, भगवान शनिदेव मंगलवार के अधिष्ठाता हैं। सूर्य प्रतिदिन समान रूप से प्रकाश देता है, पेड़-पौधे समान रूप से हवा देते हैं, ऐसा वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, यह पाश्चात्य संस्कृति पर आधारित है। जनवरी, फरवरी, मार्च यह विदेशी संस्कृति पर आधारित है और विदेशी संस्कृति में कहीं भी देवी-देवताओं का स्थान नहीं है। वह किसी आध्यात्मिक शक्ति एवं देवी-देवता को आधार मानकर नहीं चलते हैं। वह नहीं मानते हैं कि किसी जनवरी का कोई देवता है। जैसे हम देखते हैं कि हमारे देश या विश्व में कहीं भी अस्पताल बन रहा है या सड़कों का निर्माण हो रहा है, हवाई जहाज बन रहे हैं, रेलें चल रही हैं, बसें चल रही हैं। आम लोग यह सोचते हैं कि यह किसी व्यक्ति ने बनाया होगा परंतु हमारे देश अथवा समूचे विश्व में अलग-अलग विभाग के अलग-अलग मंत्री होते हैं। उसी तरह यह जो वार हैं, इनके भी अलग-अलग देवता हैं। जैसे सोमवार के भगवान शिव है, मंगलवार के भगवान बजरंगबली हैं। जो व्यक्ति मंगलवार को मांस-मदिरा का उपयोग करता है, मंगलवार को नाई के पास जाकर बाल कटवाता है तो अगर वह अपने शरीर की जाँच करवायेगा तो देखेगा कि उसका इ एस आर उसी दिन से हाई हो गया है और उसके शरीर में कैल्शियम पैंथोनेट की कमी हो गई है इसके साथ-ही-साथ उसे एलर्जी जैसा रोग हो जायेगा। अगर कोई व्यक्ति शनिवार या मंगलवार को तेल को अपने शरीर पर लगाता है तो उसे एलर्जी होगी, त्वचा के रोग होंगे। जो व्यक्ति रविवार के दिन नौशादर का उपयोग करेगा या कैल्शियम का प्रयोग करेगा उसके शरीर में वह पदार्थ जायेगा। जिस प्रकार भगवान् बुद्ध, महावीर या बड़े-बड़े नेताओं के जन्म दिवस हैं। ठीक उसी तरह इन देवी देवताओं के भी दिवस होते हैं। ये इन दिनों के मालिक होते हैं, अधिष्ठाता होते हैं। ये वहाँ उस दिन उपस्थित होते हैं। अगर कोई व्यक्ति शनिवार के दिन काला वस्त्र पहनेगा तो उसे कभी एलर्जी नहीं होगी, रूमाटिज्म नहीं होगा, उन्हें कष्ट कारक तत्व नहीं होंगे। अगर कोई व्यक्ति मंगलवार के दिन पीले वस्त्रों को पहनता है तो उसे नाना-नाना प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है। इसी तरह अलग-अलग देवी-देवताओं के अलग-अलग रंग हैं, खाद्य पदार्थ हैं। जैसे शुक्रवार को अगर कोई खट्टी चीज खायेगा तो उसका पेट खराब हो जायेगा। अगर व्यक्ति देवी-देवता के विधान को समझकर, उस ढंग से अपने जीवन में प्रयोग करेगा तो उसे किसी भी प्रकार के रोग नहीं होंगे। अगर कोई व्यक्ति सोमवार के दिन दाल-चावल-सब्जी एक साथ खायेगा तो उसे रूमाटिज्म प्रारंभ होना शुरू हो जायेगा। अगर वही व्यक्ति बुधवार को ऐसा भोजन करता है तो उसका रूमाटिज्म खत्म हो जायेगा। अगर कोई व्यक्ति सोमवार के दिन काले वस्तु का उपयोग करता है तो उसके शरीर में थाईमिन हाईड्रो क्लोराइड की कमी हो जायेगी। अगर कोई व्यक्ति बुधवार के दिन पालक-पनीर का सेवन करता है तो उसे किडनी स्टोन हो जायेगा। इस विज्ञान को समझने के लिए काफी मशक्कत की आवश्यकता है, काफी समय की आवश्यकता है क्योंकि किस-किस व्यक्ति का जन्म दिवस क्या है, उसे कौन-कौन से रंग के वस्त्र पहनने चाहिए अथवा कौन-कौन से दिन में क्या-क्या खाना चाहिए, किस दिशा में कौन-कौन से दिन जाना चाहिए, इन सभी का ध्यान रखकर ही विभिन्न प्रकार के कष्टों से बचा सकता है। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, अगर हम भगवान शनिदेव का पूजन सोमवार, मंगलवार, बुधवार को करते हैं तो क्या इस पूजन का वह महत्व नहीं होगा जो शनिवार के दिन पूजन करने से होता है ? परम् पूज्य गुरुदेव : यह प्रश्न मानव कल्याण के लिए बहुत ही सारगर्भित प्रश्न है। जैसे सभी नदियां सागर में मिलती हैं। ठीक उसी तरह समस्त देवी-देवता का प्रादुर्भाव प्रभु से है। जिन ऋषि-मुनियों ने गहरी साधना करके, तपस्या करके ज्योतिष शास्त्र का निर्माण किया, अनेक ग्रंथों का निर्माण किया है। उन ग्रंथों के अनुसार पूजन करने के कुछ विधि-विधान हैं। ऋषि-मुनियों ने देवी-देवताओं की तपस्या करने, साधना करने, पूजन करने के बाद ये नियम बनाए। क्योंकि ऋषि-मुनि इन देवी-देवताओं के महत्व को जानते हैं। जैसे कुंभ के मेले हैं। बाहरी रूप से वैज्ञानिक यह समझेंगे कि इस समय स्नान करने से कोई फायदा नहीं है जबकि संत-महात्मा जानते हैं कि इन दिनों में कितने देवी-देवता यहाँ विराजमान होते हैं। इसी प्रकार दिन एवं स्थान का भी महत्व है। इन दिनों अगर कोई कुंभ स्नान करता है तो उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। इसी तरह मंगलवार का जो दिन है वह बजरंगबली का है। जिन ऋषि मुनियों ने भगवान बजरंगबली को जाना है, उनके शरीर कांप जाते हैं। उन्हें ऐसे-ऐसे प्रकाश दिखाई देते हैं कि उनका सूक्ष्म शरीर प्रकाशमय हो जाता है। कुछ चीजों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं जाना जा सकता है। उदाहरण स्वरूप भगवान राम ने रावण को मारने के लिए एक नियत समय की प्रतीक्षा की, भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के उपयुक्त समय की प्रतीक्षा की। उसी तरह उपयुक्त समय में ही पूजन करना चाहिए। वैसे सच यह भी है कि भगवान शनिदेव की किसी भी दिन पूजन करेंगे तो भगवान शनिदेव उतना ही फल देंगे, परन्तु शनिवार के दिन भगवान शनिदेव की पूजा करने से विशेष लाभ प्राप्त होगा।

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