Jagadguru MahaBrahmrishi Shree Kumar Swami ji

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श्री गणेश-लक्ष्मी पूजन के रहस्य

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, दीपावली पर भगवान श्री गणेश और मां लक्ष्मी जी के दीवाली पर पूजन का रहस्य क्या हैं? परम पूज्य गुरुदेव : यह अत्यन्त जिज्ञासापूर्ण प्रश्न है इसके उत्तर को अगर जगत समझ जाए तो सारे कष्ट समाप्त हो जाएंगे। इस जगत को ऋषि-मुनियों ने माया भी कहा है और माया की अधिष्ठात्री मां लक्ष्मी हैं। मां लक्ष्मी नाना-नाना रूपों में प्रकट होती हैं। इस जगत में हमें जो भी प्राप्त हो रहा है, दिख रहा है वह सब मां लक्ष्मी की कृपा से ही है। हम जो भी वस्त्र पहनते हैं, भोजन करते हैं, यज्ञ करते हैं, हवन करते हैं, मकान, शिक्षा आदि जो कुछ भी व्यक्ति के पास है, वह मां लक्ष्मी की कृपा से ही है। इस जगत में जो भी लोग ऊंचे-ऊंचे पदों पर हैं अगर उन पर मां लक्ष्मी की कृपा हटा ली जाए तो वे उसी तरह से हो जाएंगे जैसे किसी पेड़ से जड़ हटा दी जाए। उक्ति है कि ‘तपो राज, राजो नरक’। जब भी कोई व्यक्ति तप करता है तो उसके फल में उसे राज प्राप्त होता है, धन प्राप्त होता है, सुख प्राप्त होता है। मां लक्ष्मी के साथ भगवान गणपति का ध्यान, पूजन करने से भगवान गणपति विघ्न को हरते हैं। जिस व्यक्ति पर भगवान गणपति की मां लक्ष्मी की कृपा होती हैं उस व्यक्ति के पास, उस देश व समाज में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आती। भगवान राम ने जब पुल का निर्माण किया, तो भगवान श्री राम ने सबसे पहले भगवान गणपति का पूजन किया। फिर भगवान शिव का पूजन किया। जो पहला शिवलिंग बना वह भगवान राम के हाथों रामेश्वर में बनाया गया। भगवान राम ने जो विजय प्राप्त की, वह भगवान गणपति, भगवान शिव और मां लक्ष्मी की कृपा से प्राप्त की। उन्हें साधन मिले, उनके कई कष्टों का अन्त हुआ और पल-पल पर उनके साथ मां लक्ष्मी, भगवान गणपति और शिव विराजमान थे। आप यह जानकर हैरान होंगे कि आज जो दीवाली मनाई जाती है वह भगवान राम के आगमन से मनाई जाती है पर इस पृथ्वी पर जब राम नहीं आए थे तब भी दीपावली मनाई जाती थी। मां लक्ष्मी का विशेष मंत्र है। जो भी व्यक्ति दीवाली के दिन सूर्य छिपने के बाद इस मंत्र का एक लाख बार उपयोग करेगा उसके घर में कभी धन की कमी नहीं आएगी। मंत्र : ॐ ह्रीं श्रीं महालक्ष्मायै नमः जो इस मंत्र का तत्ववेत्ता संत के पास से बीज मंत्र लेकर एक लाख उच्चारण करता है उसे किसी प्रकार की कमी नहीं रहती।

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स्वर्ण व वज्र भस्म का रहस्य

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, क्या आयुर्वेद और अध्यात्मिक जगत में स्वर्ण व वज्र भस्म का क्या महत्व है? ऐसा कहा जाता है कि इन दैवीय भस्मों के प्रयोग से मां लक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त की जा सकती है, कृपया इस विषय में मार्गदर्शन करें? परम पूज्य गुरुदेव : यह अति कल्याणकारी प्रश्न है। भारतीय चिकित्सा विज्ञान और आयुर्वेद में स्वर्ण व वज्र भस्म का विशेष महत्व है। भारतीय मनीषियों ने स्वर्ण व वज्र भस्म का प्रयोग केवल चिकित्सा में नहीं वरन अध्यात्म के क्षेत्र में भी किया। इन दैवीय भस्मों की शक्तियां अनूठी और अतुलनीय हैं। स्वर्ण व वज्र भस्म सचमुच वज्र की तरह कार्य करती हैं। इस वज्र का प्रयोग करने से व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक दुबर्लताएं नष्ट हो जाती हैं। स्वर्ण भस्म अपने नाम के अनुरुप व्यक्ति को बाहरी और भीतरी आभा प्रदान करती हैं। इसी प्रकार वज्र (हीरा भस्म) भस्म व्यक्ति के शारीरिक, भौतिक और मानसिक स्तर को हीरे की भांति निखार देती है। स्वर्ण व हीरे को शक्तियों का स्त्रोत माना गया है। इन दोनों तत्वों की समृद्धता केवल बाहरी प्रारूप तक सीमित नहीं है, मनुष्य के भीतर यदि इन दोनों तत्वों का समावेश हो तो जीवन पूर्णतः निरोगी, स्फूर्तिदायक और शक्तिशाली बन जाता है। इस तथ्य का साक्षात्कार हमारे ऋषि, मुनियों, आयुर्वेदाचार्यों और राजा महाराजाओं ने समय-समय पर किया है। विश्व के अनेक देशों में स्वर्ण व वज्र भस्म के गुणों को लेकर अनेक प्रकार के अनुसंधान किया गए हैं। दिव्य भस्में बल, बुद्धि और विद्या प्रदान करती हैं, शरीर को शक्ति देती हैं और मनुष्य के जीवन में आने वाली हर प्रकार की दुर्बलताओं को मिटाती हैं। इन दिव्य भस्मों के प्रयोग से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है। प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने से हमारा शरीर अनेक प्रकार के रोगों से लड़ने की शक्ति ग्रहण कर लेता है। स्वर्ण व वज्र भस्म का प्रयोग करने वाला व्यक्ति भीतर से इतना मजबूत हो जाता है कि शारीरिक दुर्बलताएं उससे दूर भाग जाती हैं। इन भस्मों से एलर्जी, वात रोग, पित्त रोग, पेट के रोग, शारीरिक कमजोरी के रोग, रक्त, मज्जा व हड्डी के रोग आदि व्याधियां दूर हो जाती हैं। स्वर्ण भस्म का प्रयोग दिल व दिमाग को ऊर्जा प्रदान करता है और रक्त के प्रवाह को संतुलित करता है। नेत्र और यौन दुर्बलता समाप्त हो जाती है। स्वर्ण व वज्र भस्म मानसिक रोगों के लिए रामबाण औषधि है। दिमागी कमजोरी, स्मरण शक्ति के रोग, मानसिक थकावट आदि व्याधियां इन भस्मों के प्रयोग से समाप्त हो जाती हैं। भौतिक जगत की आपाधापी के कारण होने वाले तनाव, मानसिक असंतुलन और थकान को स्वर्ण व वज्र समाप्त कर देते हैं। इन अनूठी भस्मों के प्रयोग से दिमाग व स्मरण शक्ति में अनायास वृद्धि होने लगती है। मानसिक, बौद्धिक और तकनीकी कार्य करने वाले व्यक्ति के लिए स्वर्ण व वज्र भस्म का प्रयोग अत्यंत लाभकारी है। इन भस्मों से शारीरिक और मानसिक संजीवनी तो मिलती ही है साथ ही भौतिक समृद्धि भी प्राप्त होती है। यदि कोई व्यक्ति चंदन, गूगल, लोबान और ऊद के साथ स्वर्ण व वज्र भस्म का मिश्रण कर एक मंत्र का जाप करे तो मां लक्ष्मी की अद्भुत कृपा उसे प्राप्त होती है। (इस मंत्र को आप केवल सद्गुरु जी की कृपा से ही प्राप्त कर सकते हैं।)

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गौ माँ के अद्भुत रहस्य

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, हम लोग गाय को माता मानते हैं, देवी तुल्य मानते हैं। हमारे हिन्दू संस्कृति में गाय का बहुत अधिक महत्व है। कृपया यह बताने की कृपा करें कि गाय हमारे लिए कितनी उपयोगी है ?  परम् पूज्य गुरुदेव : आधुनिक विज्ञान मनुष्य से पूर्व का जन्म बंदर को मानते हैं। जबकि वैदिक विज्ञान जो है वह मानव की उत्पत्ति गाय से मानता है। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि जो मानव प्रतिदिन गाय के मूत्र का सेवन करता है तो उसके शरीर में नुकसान पहुँचाने वाले बैक्टीरिया का अंत हो जाता है। गाय के गोबर में इतने गुण हैं कि गाँव में स्त्रियाँ गोबर का लेप घरों में करती हैं। इससे घर के अंदर कोई भी कीटाणु प्रभाव नहीं कर पाते हैं। गाय की हर चीज मनुष्य के काम आती है। जैसे गाय के नाखून से भी कई बीमारियां दूर होती हैं। अगर बच्चों को सोकड़ा हो जाता है। किसी को साइनोसाइटिस हो जाता है तो सिर्फ गाय के नाखून से धुआँ (धूनी) देने मात्र से रोगों का अंत हो जाता है। जिस प्रकार पीपल का वृक्ष सिर्फ आक्सीजन देता है। पीपल के वृक्ष की लोग पूजा करते हैं क्योंकि वह जीवनदायक वृक्ष है। ठीक उसी प्रकार गाय के मूत्र, गोबर, नाखून तथा दूध जीवनदायिनी है। अगर व्यक्ति शुद्ध मन से गाय की पूजा करे और यह प्रार्थना करे, ‘हे गाय माता मेरा यह कार्य पूरा हो जाये’ तो आदमी यह जानकर हैरान हो जाएगा कि कुछ समय के अन्दर ही उस आदमी के वह कार्य पूर्ण हो गया।

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सुख-दुःख के पार कैसे जाएं?

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, व्यक्ति सुख और दुःख के पार किस प्रकार जा सकता है? परम पूज्य गुरुदेव : यह प्रश्न अति महत्वपूर्ण और जगत के लिए कल्याणकारी है। इस जगत में हमें देखने में लगता है कि सारे तन दौड़ रहे हैं लेकिन वास्तव में यह सारा मन का जाल है। जो भी तन हमें अच्छे दिख रहे हैं, सुन्दर दिख रहे हैं, दुःखी दिख रहे हैं, अमीर दिख रहे हैं, गरीब दिख रहे हैं इसमें तन से अधिक मन का महत्व है। जैसे हम किसी व्यक्ति को कह दें कि तेरा हाथ ठीक नहीं है तो उसे इतना बुरा नहीं लगेगा या उसे कह दें कि धन नहीं है, तू गरीब है तो उसे इतना बुरा नहीं लगेगा। अगर हम किसी व्यक्ति को कह दें कि तेरा मन ठीक नहीं है तू मानसिक रूप से विक्षिप्त है या तू पागल है तो उसे ज्यादा गहरी चोट लगेगी। यह बात उसके हृदय को छूती है, उसे ज्यादा पीड़ा देती है। उसी तरह अगर हम किसी व्यक्ति की तारीफ कर दें कि तू बड़ा अच्छा है, तेरा मन बड़ा पवित्र है तो उसे बहुत अच्छा लगता है। एक बार चाणक्य के पास ज्योतिष का अंक विद्या का एक ज्ञाता आया उसने चाणक्य को देखकर कहा, ‘जैसी आपकी वस्तुस्थिति है, ग्रहस्थिति है, उससे आपको विक्षिप्त या कमजोर होना चाहिए।’ लेकिन चाणक्य का मन दृढ़ था, वह बहुत ही शक्तिशाली था। तब अंक विद्या के उस ज्योतिष आचार्य ने कहा, ‘मेरा ज्योतिष अंक आप पर काम नहीं करेगा क्योंकि जो मन से संकल्पवान है, मन से शक्तिशाली है, जो मन से नहीं हारता, उसकी कभी हार नहीं होती।’ जिसका मन संकल्पवान होता है वह सुख-दुःख से परे चला जाता है. और उस पर प्रभु की कृपा होती है। प्रभु मन, बुद्धि और चित्त से परे है। हमारे हर क्रिया-कलाप से परे है। जो मन से पार चला जाता है जिसके साथ प्रभु का तन्मय हो जाता है, वह जो चाहे इस जगत में कर सकता है, ऐसा शास्त्रों व ग्रंथों में वर्णित है।

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निष्काम भावना का सच

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, आज के युग में धर्म नहीं है बल्कि आजकल धर्म का सिर्फ प्रदर्शन है। जिस तरह से लोग बात करते हैं, निष्काम भावना की, निष्काम होने के प्रदर्शन की लेकिन उनके मन में कोई-न-कोई कामना रहती है। ऐसा क्यों? परम् पूज्य गुरुदेव : यह वाक्य सभी संतों ने लिखा है कि जो निष्काम भावना से प्रभु की भक्ति करते हैं, उन्हें सब कुछ प्राप्त होता है। जैसे कि भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है, सद्गुरु नानक देव जी ने श्री गुरुग्रंथ साहिब में लिखा है, ऐसा ही बाइबिल एवं कुरान में भी लिखा है कि जो निष्काम भावना से कर्म (भक्ति) करते हैं, उन पर प्रभु प्रसन्न होते हैं। जो व्यक्ति निष्काम भावना से कुछ प्राप्त करने की इच्छा रखता है, उसे जीवन में कुछ नहीं मिलता है। निष्काम भावना का अर्थ है कि मेरी कोई भी कामना नहीं है। जो प्रभु दे, निरोग करे, मुझे धन दे, मुझे अपयश दे, सुंदरता दे, मुझे रोगी बना दे, तब भी ठीक है। प्रभु मेरी इच्छा माने या न माने, मेरी बेटी स्वस्थ हो या न हो, मेरा पति मुझ पर प्रसन्न रहे अथवा न रहे, मेरा संसार में यश-कीर्ति रहे या न रहे, जो आपकी इच्छा हो वह हो- इस तरह की भावना को निष्काम भावना कहा जाता है। यह जो निष्काम भावना है उसका अर्थ ही है कि वह कामना करके निष्काम भावना का नाम ले रहा है। निष्काम भावना का अर्थ है कि प्रभु हमारा जो जीवन है वह आपके प्रति समर्पित है। आपकी जो इच्छा हो, वही सर्वोपरि है। मैं अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक बस, आपके इच्छा का सम्मान करता रहूँ। आपको जो अच्छा लगे, वहीं मुझे भी अच्छा लगे, इसका अर्थ निष्काम भावना है। अगर कोई व्यक्ति यह सोचेगा कि मैं निष्काम भावना रखूंगा। तो मुझे हर चीज की प्राप्ति हो जायेगी। ऐसे व्यक्तियों की भगवान् भी परीक्षा लेते हैं कि सचमुच यह व्यक्ति निष्काम भावना से भक्ति कर रहा है अथवा नहीं। जैसे प्रहलाद ने निष्काम भावना से प्रभु का नाम लिया, सिमरण किया। भगवान् श्रीकृष्ण चाहते तो पांडवों को जुए में जिता सकते थे। अगर चाहते तो पांडवों को बारह साल के वन भ्रमण से उबार सकते थे। लेकिन भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा कि दुःखों के समय में ये हमारी भक्ति करते हैं या नहीं। जब भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा कि वह ऐसी स्थिति में भी निष्काम भावना से भक्ति कर रहे हैं तो उन्होंने पांडवों को सब कुछ दिया। कुरान-ए-पाक को कहा जाता है कि यह लिखी गई नहीं है बल्कि उतरी हुई है। यह हजरत मोहम्मद साहिब ने नहीं लिखी है बल्कि यह हजरत मोहम्मद साहिब के द्वारा लाई गई है। इसी तरह श्री गुरु ग्रंथ साहिब है, गीता है, बाइबिल है। इस तरह जो धर्मग्रंथ हैं, मगर उस पर किसी का नाम है। यह जानकर आप हैरान होंगे कि श्री गुरुग्रंथ साहिब गुरु नानक देव जी ने नहीं लिखा। वह अनंत अनंत संतों की वाणी है लेकिन इन सभी के पीछे सद्गुरु नानक की जो वाणी थी, उसमें उनका नाम नानक जी लिख दिया गया। वे सारे गुरू चाहते तो नीचे अपना नाम भी दे सकते थे। उनकी इस महानता के कारण श्री गुरुग्रंथ साहिब गुरु की तरह सारे संसार को प्रकाशित कर रहा है। इसी तरह जब भी किसी संत का पतन होता है तो वह उसके अपने होने पन से होता है, उसका विकास रुक जाता है। जैसे कोई बैलगाड़ी चल रही है, उसके नीचे कोई कुत्ता चल रहा है और कुत्ता यह समझे कि यह बैलगाड़ी जो है वह मेरे कारण चल रही है। अगर मैं यहाँ से हट जाऊँगा तो यह बैलगाड़ी नहीं चल पायेगी। संत का जो अस्तित्व है, वह कुत्ते की तरह है, इससे ज्यादा नहीं है। सद्गुरु नानक ने संतों ने यहाँ तक लिखा है कि मैं तो राम का कुत्ता हूँ। मेरे गले में जो रस्सी बांधी है, वह परमात्मा ने बाँधी है और मेरा इतना ही प्रभाव है। जो संत अपनी विराटता का प्रदर्शन करते हैं, शोभा यात्रा का प्रदर्शन करते हैं, अपने सूत्रों का प्रदर्शन करते हैं। नाम नारायण का लेंगे, नाम भगवान् शिव का लेंगे लेकिन चित्र अपना लगायेंगे। इससे किसी का कल्याण नहीं होता है। उससे किसी भी मानव को लाभ नहीं होता है। इससे अपयश ही होता है और किसी रोगों का निदान भी नहीं होता है। जब भी किसी का कल्याण होता है तो वह परमात्मा के द्वारा ही होता है, ऐसा ऋषि-मुनियों ने ग्रंथों में लिखा है। प्रभु के द्वारा ही इस जगत् में सब कुछ होता है। हम न तो चाँद, तारे, सूर्य एवं पृथ्वी बना सकते हैं। प्रभु के द्वारा ही इन सभी चीजों का निर्माण हुआ है। अगर हम एक लाख या दस लाख लोगों को प्रभावित भी कर लेते हैं तो इसके आगे अर्थ क्या है? सच्चाई तो यह है कि हम एक बाल का भी निर्माण नहीं कर सकते हैं।

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परमात्मा को कैसे पाएं ?

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, यह जिज्ञासा है कि किस प्रकार से परमात्मा की प्राप्ति की जाये ? गुरुदेव कृपा करें। परम् पूज्य गुरुदेव : यह प्रश्न इस जगत् में सबसे श्रेष्ठ प्रश्न है। आजकल चाहे बच्चे हों, जवान हों या बूढ़े हों, सभी काम, धन, यश, वैभव के पीछे भाग रहे हैं। इस जगत् में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जिसकी कोई कामना नहीं होती है। जब भी कोई मानव परमात्मा की प्राप्ति का साधन पूछता है तो इसका अर्थ है कि उस व्यक्ति ने पूरी तरह से जगत् को देख लिया है, समझ लिया है क्योंकि अति श्रेष्ठ आदमी ही परमात्मा की प्राप्ति करने के साधन को तलाशता है, कामना करता है। हमारे भगवान् महावीर, बुद्ध, सद्गुरु नानक, कबीर, रविदास, मीरा आदि ने इस संसार को नश्वर समझा, नाशवान् समझा। तत्पश्चात् उन्होंने वैसी साधना की, जिसके फलस्वरूप उन सभी को परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त हुआ। अन्यथा इस जगत् में कोई भी मानव परमात्मा की प्राप्ति की कामना नहीं करता है। जब अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा कि प्रभु परमात्मा को कैसे पाया जा सकता है? तब भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि अगर मानव परमात्मा को प्राप्त करना चाहता है तो उसे सर्व प्रथम ऐसे सत्गुरू (संत) के पास जाना होगा जिन्होंने परमात्मा को जाना है। ऐसे तत्ववेत्ता संत से परमात्मा के संबंध में पूछे। जैसे अष्टावक्र ऋषि ने राजा जनक को कुछ ही क्षणों में परमात्मा की जानकारी दे दी थी। भगवान् श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के मैदान में किस तरह अर्जुन को विराट रूप दिखाकर परमात्मा के दर्शन करा दिये। अर्थात् जो तत्ववेत्ता संत परमात्मा के बारे में जानते हैं, सर्वप्रथम उन्हें गुरु मानकर उनसे इस विषय का सार पूछें। सद्गुरु के संपर्क में आने पर संबंधित मानव परमात्मा को एक दिन अवश्य जान जाता है। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, एक व्यक्ति ने जिज्ञासा की है कि क्या मुझमें गुण हैं या मैंने ऐसे पुण्य कर्म किए हैं कि मैं प्रभु को प्राप्त कर सकूं? परम पूज्य गुरुदेव : जब-जब हमें ऐसा ध्यान आएगा कि हमारे में कुछ ऐसे गुण हैं या सद्कर्म है कि प्रभु प्राप्ति हो जाए तो प्रभु प्राप्ति में अवरोध उत्पन्न होगा। अपने पुण्य कर्मों का अहंकार जागृत होगा तो इस प्रकार की विचारधारा नहीं रहनी चाहिए अच्छे कर्म सोने की बेड़ी (हथकड़ी) है एवं बुरे कर्म लोहे की बेड़ी है। लेकिन बन्धन दोनों में हैं। जब हममें पूर्ण समर्पण भाव पैदा होता है कि एक-एक श्वास प्रभु का है। हम तो कठपुतली की भांति असमर्थ है तो व्यक्ति को प्रज्ञाबोध होता है और जब-जब आप स्वयं को इस बात का विश्वास दिलाते रहेंगे कि आपमें प्रभु पाने की सामर्थ्य है तो आपको अहंकार का अंश छूने लगता है एवं आप प्रभु कृपा, उसकी दिव्यता से दूर होते चले जाते हैं। लेकिन समर्पण भाव से वैराग्य की भावना का समावेश होता है। ‘किस विधि तुमको ध्याऊं मैं कुमति में मूरख खल कामी, तुम पालनकर्ता।’ हम रोज आरती में पढ़ते हैं। लेकिन जब हम अपने आचार-व्यवहार में भी ऐसी भावना लाते हैं तो प्रभु स्वयमेव प्रकट हो जाते हैं। जैसी तीव्र भावना हम दुनियावी सुखों की प्राप्ति के लिए करते हैं, वही तड़प, व्याकुलता प्रभु के लिये भी हो तो चमत्कार हो जाता। है। जब वह प्रयत्न छोड़ देता है, साधना, ध्यान छोड़ देता है तो वास्तविक तलाश शुरू होती है। ऐसी तलाश में जब व्यक्ति स्वयं खो जाता है, डूब जाता है, घूंघट के पट खोल देता है तो प्रभु सामने आ जाते हैं। नारियल को तोड़े बिना आप उसकी गिरी का फल नहीं पा सकते। ऐसे ही अपने अहम् को भी बाहरी आडम्बरों को हम चूर-चूर कर दे तो परमात्मा तो बैठा ही है हमारे समीप ।

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सूर्य कवच के अद्भुत प्रभाव

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, शास्त्रों में सूर्य कवच के बारे में बड़ी चर्चा मिलती है। सूर्य कवच कैसे धारण किया जाये तथा इसके धारण करने से क्या लाभ है? परम् पूज्य गुरुदेव : सूर्य कवच धारण करने के पूर्व अर्थात् सबसे पहले आप “ॐ गुरुवे नमः’ का 11 बार उच्चारण करेंगे। उसके पश्चात् जो आपके गुरु हैं, ईष्ट हैं उनका सिमरण करेंगे। तत्पश्चात् आप ‘गणेशाय नमः’ का 11 बार उच्चारण करेंगे। उसके बाद कवच का पाठ करेंगे तो थोड़े ही दिनों में देखेंगे कि भगवान सूर्य का कैसा अनुपम चमत्कार आपके जीवन में हो रहा है। आप हैरान रह जायेंगे कि बड़ी से बड़ी विद्या ग्रहण करने के पश्चात् हम जो इस संसार में वे सफलता नहीं पा सके थे, वह मात्र सूर्य कवच पढ़ने से ही पूर्ण हो गये। तब आप सूर्य की महिमा को महसूस करेंगे। वैज्ञानिक सूर्य को एक आग का गोला मात्र मानते हैं जबकि आध्यात्मिक तल के अनुसार जो सूर्य तत्व को जानने वाले हैं, वह किसी भी तरह से कुछ भी कर सकते हैं। सिर्फ 40 दिन सूर्य कवच धारण करने से आप पायेंगे कि शरीर में एक अलग तरह की आभा आ गई है। आपके शरीर को चारों तरफ से किरणों ने घेर लिया है। अगर कोई व्यक्ति 140 दिन सूर्य कवच धारण करके किसी शेर के पास बैठ जाएगा तो ऐसे व्यक्ति का शेर भी भक्षण नहीं कर पाएगा, ऐसी सूर्य कवच की महिमा है। भगवान् रामचंद्र के पुत्र लव-कुश शेरों के साथ खेलते थे, शेर के मुँह में उंगली डाल देते थे, फिर भी शेर कुछ नहीं करता था क्योंकि भगवान बाल्मीक ने दोनों बच्चों को बचपन से ही सूर्य कवच की महिमा बताई थी और लव – कुश नित्य सूर्य कवच पढ़ते थे। इस सूर्य कवच को पढ़ने से ही लव-कुश में अथाह शक्ति का संचार हो गया था। यही कारण है कि लक्ष्मण, शत्रुघ्न, हनुमान आदि अविजित होते हुए भी लव-कुश के हाथों हार गये थे, ऐसी है भगवान सूर्य की कृपा।

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रोगों का मूल आधार भावना

गुरुदास: परम पूज्य गुरुदेव, जैसा कि माना जाता है कि भावनाए प्रभु के पास जाती हैं या भक्ति का मार्ग बनाती हैं तो भावनाएं रोगों का आधार कैसे होती हैं? कृपया इस रहस्य को स्पष्ट करें। परम पूज्य गुरुदेव : यह प्रश्न जगत के लिए अत्यन्त कल्याणकारी है। इसे समझने के लिए काफी समय और बहुत से आयामों की आवश्यकता है। इसका अर्थ इतना गहन है जितना समुद्र की गहराई। इसको समझने के लिए शांत चित्त और मन से पार की अवस्था चाहिए, भावनाओं की अवस्था चाहिए। इस जगत में जितने भी कार्यकलाप हो रहे हैं, झगड़े हो रहे हैं, युद्ध हो रहे हैं वे सब भावनाओं पर आधारित हैं। सभी धर्म यह मानते हैं कि परमात्मा एक है। हिन्दू कहता है एक परमात्मा है, मुसलमान कहता है एक अल्लाह है, सिख कहता है एक ओंकार है और ईसाई कहता है एक गॉड है। जो परमात्मा को नहीं मानते वो भी कहते हैं कि एक तत्व है जिससे यह सारा जगत चल रहा है। उसको चाहे प्रकृति का नाम या परमात्मा का या तत्व का। वैज्ञानिक भी एक तत्व को स्वीकारते हैं जो इलेक्ट्रान, प्रोटान व न्यूट्रान का निर्माता है, उसका संचालन करने वाला है। आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति में आज जितनी औषधियां हैं उनमें से नब्बे प्रतिशत औषधियां मन पर अटैक करती हैं जिससे मन के भाव लोप हो जाएं और व्यक्ति रोग से मुक्त हो जाए। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो अच्छे कर्म हैं वे सोने की बेड़ी हैं, जो बुरे कर्म हैं वे लोहे की बेड़ी हैं। किसी कैदी को अगर आप जेल में डाल दें और हाथ-पैरों में हीरे जवाहरात की बेड़ियां डाल दें तब भी वह बंधा हुआ है। तब भी वह कैदी ही है। इसी तरह अगर किसी कैदी को लोहे की बेड़ियां डाल दी जाएं तब भी वह कैदी है। ऐसे ही यह जगत भावनाओं से बंधा हुआ है। लेकिन यथार्थ भावनाओं से परे है। अगर व्यक्ति को भावनाओं से पार जाना आ जाए तो सारे धर्म समाप्त हो जाएंगे, सारे युद्ध समाप्त हो जाएंगे। बस एक तत्व रह जायेगा। आज मनुष्य मानसिक रूप से इतना विक्षिप्त व परेशान है कि अपनी भावना को प्रसन्नता देना चाहता है, वह अपने मन को कुछ समय के लिए संतुष्टि देना चाहता है। अपनी संतुष्टि का उपाय सिगरेट, पान-सुपारी और नाना प्रकार के नशे आदि में ढूंढ़ता है। लेकिन आप यह जानकर हैरान होंगे कि इस जगत में ऐसा कोई उपाय कारगर नहीं हुआ। हमारे वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड की खोज कर ली। चांद पर पहुंच गए और न जाने किस-किस ग्रह पर पहुंच गए। हो सकता है वे कल सूर्य पर भी पहुंच जाएं, जहां पहुंचना संभव नहीं है। लेकिन वैज्ञानिकों ने ऐसी कोई खोज नहीं की जिससे पहने मन पर नियंत्रण कर सकें। व्यक्ति जितना सुख पा रहा उतना ही दुःख पायेगा। परिवार में जो सदस्य आपको जितना सुख दे रहे हैं उतना आपको दुःख देंगे, यह निश्चित है। जितना दिन होगा उतनी रात होगी। भगवान श्रीकृष्ण, सद्गुरु नानकदेव जी, हजरत मुहम्मद, ईसा मसीह आदि संतों ने इस जगत को खेल कहा है। इस जगत को माया कहा है। जब कोई तत्त्ववेत्ता संत किसी व्यक्ति को मिल जाता है तो वह उसे भावनाओं से परे ले जाता है। और जब व्यक्ति मन से परे जाने की अवस्था को जान लेता है तो समस्त रोगों से मुक्ति पा लेता है। इस जगत में भक्ति भावनाओं से ही है। इसलिए भावना कितनी अच्छी चीज होगी क्योंकि वो भक्ति का निर्माण कर रही है उससे हमारे में भक्ति आ गई है। हमारा जगत में प्रेम हो रहा है। यह सत्य है कि भक्ति भावना से बनती है। भावना से भक्ति का निर्माण होता है। जैसे हम किसी रास्ते में जा रहे हैं तो हम कोई वाहन लेकर जाते हैं और वाहन के द्वारा हम उस मंजिल पर पहुंचते हैं। जब भी हम किसी मंजिल पर पहुंच जाते हैं तो वाहन की आवश्यकता नहीं रहती । जैसे कोई डॉक्टर ऑपरेशन कर रहा है। वह औजारों के द्वारा ऑपरेशन करता है। अगर वो डॉक्टर उस रोगी पर औजार चलाता ही रहे तो रोगी की मृत्यु हो जाएगी। ऐसे जो भक्ति है यह भी एक मार्ग है, एक वाहन है, एक साधन है। भावना हमारे लिए वाहन है। यह हानिकारक भी है और कल्याणकारी भी है। इसके अर्थ को समझने के लिए बड़ी गहनता और शांति की आवश्यकता है। यह बड़ा क्रांतिकारी, बड़ा विस्फोटक और आनंददायक प्रश्न है। इसको समझने के लिए प्रभु की परम कृपा की आवश्यकता है। तभी इसके उत्तर को गहन रहस्यों को मानव समझ सकता है। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, अगर पति निर्मल भावना का नहीं है और स्त्री पति कल्याण के लिए उस घन को चोरी से छुपा रही है, उसकी भावना में कोई अशुभता नहीं है तो क्या वह रोगों का शिकार होगी? परम पूज्य गुरुदेव : यह प्रश्न बहुत से लोगों का हो सकता है। अगर किसी व्यक्ति की भावना शुद्ध है, उसके हृदय में किसी के प्रति प्रेम है तो यह उसी तरह है जैसे किसी को अगर प्रेम से आग लगाएंगे तो आग का काम है जलाना, वह जलायेगी। अगर कोई व्यक्ति नदी से प्रेम करेगा और उसका किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं है फिर भी यदि किसी को नदी में डुबोएगा तो वह आदमी डूबेगा । जितने भी चोर हैं वे जब चोरी करते हैं तो यही सोचते हैं कि अगर मैं इससे एक हजार रुपया ले भी लूंगा तो क्या फर्क पड़ेगा? मेरे बच्चे पल जाएंगे या मैं ऐसे हजारों आदमियों से हजार-हजार रुपया चोरी करके गरीबों का कल्याण करूंगा। जितने भी गलत कार्य करने वाले हैं उन्होंने कोई न कोई ऐसा तर्क रखा होता है जिससे वे चोरी या गलत काम करके मन को समझाते हैं। जो स्त्री यह सोचेगी कि मेरा पति जैसा भी है प्रभु कृपा से है क्योंकि पति या पत्नी से प्रभु अधिक शक्तिशाली है। प्रभु की कृपा का न पति को पता है न पत्नी को। यदि पति भी पत्नी से चोरी करेगा तो पति को भी ऐसा रोग भुगतना पड़ेगा जैसा पत्नी को है। यह नियम पति या पत्नी का नहीं

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नवरात्र के दिनों के अद्भुत रहस्य

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, नवरात्र का पुण्य पर्व पूरा विश्व मनाता है। आपने कई बार उल्लेख किया है कि इस पुण्य तिथि का बहुत अधिक महत्व है। इस पुण्य तिथि में हमारा जो व्यवहार है, जो गतिविधियां होती है, उससे रोगों के कारण बनते हैं। नवरात्र के दिनों में कौन-कौन से नियमों का पालन करना चाहिए, जिससे व्यक्ति अंतः एवं बाह्य दोनों स्थिति में रोगों से मुक्त हो सके। परम पूज्य गुरुदेव : नवरात्र के दिनों का मानव जगत में महत्वपूर्ण स्थान है। माँ जगदम्बा (दुर्गा) अन्य-अन्य नामों से पुकारी जाती हैं। इस जगत में जो मानव सुखी सम्पन्न, साधन सम्पन्न है उसने किसी-न-किसी जन्म में माँ जगदम्बा की भक्ति अवश्य की है। क्योंकि यह जो पूरा जगत् है वह माँ जगदम्बा की कृपा का ही प्रारूप है। नवरात्र माँ जगदम्बा के पावन दिवस के रूप में ग्रंथों द्वारा, शास्त्रों द्वारा वर्णित है। इन दिनों का बहुत अधिक महत्व है जिसकी महिमा अनंत-अनंत ग्रंथों में मिलती है। भगवान राम ने, भगवान श्रीकृष्ण ने, भगवान शिव ने, भगवान ब्रह्मा ने तथा सभी देवी-देवताओं ने इसके बारे में महिमा गाई है। भगवान श्रीकृष्ण ने जो स्वयं अवतार थे, अर्जुन को यह उपदेश दिया था कि वह दुर्गा कवच का पाठ करें। महर्षि अर्जुन ने माँ जगदम्बा का तप किया, पूजन-अर्चना की। जिसका उन्हें फल मिला, जिसे समस्त जगत जानता है। राजाओं में अकबर सभी धर्मों का आदर करते थे। अकबर ने भी माँ जगदम्बा को सोने का छत्र चढ़ाया था। जो व्यक्ति तप करता है, पाठ करता है, मां की आराधना करता है, उसे ही माँ का प्रतिफलन ज्ञात होता है। क्योंकि माँ जगदम्बा में ऐसी शक्ति है कि व्यक्ति चाहे कुछ भी कर सकता है, माँ जगदम्बा के कारण ही लोगों में कुछ करने की प्रेरणा के भाव का जन्म होता है। जो व्यक्ति नवरात्र के दिनों में मांस, मछली, प्याज, लहसुन का सेवन नहीं करता है। जो व्यक्ति नवरात्र के दिनों में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता है। अर्थात् इन नौ दिनों में विधि-विधान से पूजन करता है उस पर पूरे साल भर माँ जगदम्बा की कृपा बनी रहती है। अगर कोई इन नौ दिनों के अंदर गलत व्यवहार करता है तो उसे जिंदगी भर के लिए अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ता है। अगर कोई पति-पत्नी इन दिनों में विपरीत आचरण करेंगे तो उनकी गृहस्थी सफल नहीं होगी, दोनों के मध्य तलाक भी हो सकता है। जो व्यक्ति इन दिनों में माँ जगदम्बा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं, उन्हें माँ जगदम्बा हर प्रकार के साधन से सम्पन्न करती है। उन्हें किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता है, ऐसा शास्त्रों में वर्णित है। ये नौ दिन मानव कल्याण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

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मदिरा से मुक्ति का दिव्य उपाय

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, मदिरा की लत एक गंभीर रोग की तरह है, बहुत से लोग इसका शिकार होते हैं। इससे मुक्ति चाहते हैं आप कृपा करें कि इससे कैसे मुक्ति मिले ? परम पूज्य गुरुदेव : मदिरा से आदमी को थोड़ी देर के लिए मानसिक तनाव से विश्राम मिलता है इसके अलावा इसे पीने से रोग ही पैदा होते हैं। मदिरा आंखों पर भी प्रभाव डालती है, शुगर बढ़ता है, वजन बढ़ता है, कोलेस्ट्राल को बढ़ाती है, हृदय रोग को बढ़ाती है, पैप्टिक अल्सर भी इससे होता है। जगत में ऐसा कोई रोग नहीं है जो मदिरा से न होता हो। मंदिरा छोड़ने के लिए आदमी में इच्छा शक्ति की परम आवश्यकता है। अगर कोई व्यक्ति कहेगा कि मुझे मदिरा छोड़नी ही नहीं चाहे मेरा गुर्दा खराब हो जाए, लीवर खराब हो जाए, हार्ट अटैक पड़ जाए या मैं समाप्त ही क्यों न हो जाऊं तो ऐसे व्यक्ति के लिए कोई औषधि नहीं है। जो व्यक्ति अपने बच्चों का, तन, मन, धन का ध्यान रखना चाहता है, स्वस्थ रूप से जीना चाहता है, अगर वह संकल्प करे तो 2-3 माह में वह मदिरा का सेवन पूरी तरह छोड़ सकता है। इसकी औषधि इस प्रकार है- सदाबहार के फूल का रस, करेले का रस, सौंफ का रस, मैनमिष के पत्तों का रस, बेरीगेटाकेना के पत्तों का रस, टमाटर के बीज का रस, संतरे के छिलके का रस, मौसमी के छिलके का रस, खेजड़ी के पत्ते और खेजड़ी की जड़ का रस। इन सभी को मिलाकर एक बोतल में रख लें। शराब पीने वाला व्यक्ति जब भी शराब पीना चाहे उसे आधा चम्मच रस पिला दें। इससे उसे शराब का स्वाद भी आयेगा और नशा भी आएगा। इस तरह 2-3 माह के सेवन से धीरे-धीरे वह शराब से नफरत करने लगेगा क्योंकि उसकी चेतना जाग जायेगी और उसे पता चल जायेगा कि शराब मेरे लिए कितनी हानिकारक हैं। अगर कोई चिकित्सक या कोई व्यक्ति इसका प्रयोग करना चाहें तो मुफ्त में करें क्योंकि जिस तरह कोई मां अपना दूध नहीं बेचती, पुजारी भगवान नहीं बेचता, मां अपना प्रेम नहीं बेचती, अपने बच्चे को नहीं बेचती उसी तरह ये जड़ी बूटियां हैं। इनको व्यापार के रूप में इस्तेमाल न करें अन्यथा उस व्यापारी व्यक्ति को हानि हो सकती है। अतः इसका प्रयोग जन कल्याण के लिए ही करें।

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