Jagadguru MahaBrahmrishi Shree Kumar Swami ji

Author name: Team - Mahabrahmrishi Shree Kumar Swami Ji

Q&A with Gurudevji

वास्तु ज्ञान का अति दुर्लभ सत्य

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि अपने घरों, व्यावसायिक स्थानों आदि को वास्तु के हिसाब से बनाना चाहिए इससे कार्य सिद्ध होते हैं परंतु बहुत से लोगों का तर्क है कि उनके घर वास्तु के हिसाब से नहीं बने हैं, फिर भी उनके कार्य सिद्ध हो रहे हैं। इसके पीछे क्या रहस्य है? परम् पूज्य गुरुदेव : आपने जन-कल्याण के लिए आधुनिक वर्ग के लोगों की, युवा वर्ग की, बुद्धिजीवी वर्ग की जो समस्या रखी है वह बहुत उत्तम है यह सत्य है कि व्यक्ति इन सब चीजों को नहीं मानते हैं। इसके पीछे कुछ कारण है। जैसे हमारी भाषा है, हमारा व्यवहार है, वह हमें संस्कारों से मिला है। इस तरह हमारा वातावरण बना है। आजकल सभी समझते हैं कि मैं मुसलमान हूँ, मैं हिन्दू हूँ, मैं सिक्ख हूँ, मैं ईसाई हूँ। यह कोई नहीं मानते हैं कि मैं मानव हूँ। उनके मन में यह भावना रहती है कि मैं अपने-अपने धर्म के लिए कुछ करूंगा। इतने उत्तम शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी उनके अंदर यह भावना नहीं आती है कि मैं मानवता के लिए कुछ करू। आजकल ऐसे कम व्यक्ति हैं जो मानवता के लिए कुछ करते हैं। धर्म का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अर्थ होता है धारण करना। जब कोई व्यक्ति विशेष ज्ञान को ग्रहण करता है, जब व्यक्ति ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जानता है, ज्ञान के रहस्यमय तत्व को जानता है तो उसे जानने को ही धर्म कहा जाता है, धारण करना कहा जाता है। इतने शैक्षिक वातावरण में भी किसी शिक्षण संस्थानों में इसके बारे में कुछ नहीं बताया जाता है। इसको बताने के लिए उस विषय में शिक्षक का निपुण होना अत्यन्त आवश्यक है। जिस वातावरण में मनुष्य रहता है, वहाँ जो उनके गुरुजन है, धर्माधिकारी हैं, उस पर आधारित होता है। जो व्यक्ति सनातन प्रवृत्ति के हैं, उनके माता-पिता उन्हें शुरू से ही इस सभी का बोध करायेंगे। अगर व्यक्ति सनातन धर्म में आने के बाद किसी और गुरु से संबंधित हो जाये। अगर ऐसे गुरू के पास शिष्य-चला जाता है तो वह गुरू कहता है कि वह ही केवल परमात्मा है, केवल उसी को माने तथा किसी देवी-देवता को नहीं माने। अगर व्यक्ति किसी वास्तु की पूजा करेगा या देवी-देवता की पूजा करेगा तो उस गुरू का महत्व कम हो जायेगा। अतः ऐसे गुरु ऐसा ज्ञान अपने शिष्य को नहीं बताते हैं। हिन्दू धर्म वाले मुस्लिम धर्म की अच्छाइयों को जानना नही चाहते हैं। ठीक उसी तरह मुस्लिम धर्म वाले हिन्दू धर्म की अच्छाइयों को जानना नहीं चाहते हैं। व्यक्ति का जो दृष्टिकोण है, व्यक्ति किस ग्रह में पैदा होता है, बाकी उसकी जन्मकुंडली क्या है, इस पर उसका आधा जीवन आधारित होता है और आधा जीवन आधारित होता है कि वह किस घर में रहता है। अगर किसी व्यक्ति के ग्रह की स्थिति इतनी सशक्त है, इतनी पूर्ण है कि उस पर गुरू (बृहस्पति) की कृपा है तो उस पर कोई भी बाधा नहीं आयेगी, कोई भी संकट नहीं आयेगा। यह उसके पूर्व जन्मों का प्रताप है। आज हम जिन्हें ऊँचे-ऊँचे पदों पर देखते हैं, वह उनके पूर्वजन्मों का फल है, तप का प्रभाव है। आज जो दावा कर रहे हैं कि वास्तु के हिसाब से मेरा घर नहीं है परंतु सभी कार्य सिद्ध हो रहे हैं, वह अहंकार वश ऐसा कहते हैं। सत्यता यह है कि उनके घर में कष्ट है, रोग हैं क्योंकि जो व्यक्ति शांत प्रवृत्ति का है, शांत है, वह कभी भी दावा नहीं करेगा। वह वैज्ञानिक प्रक्रिया से गुजर कर जीवन यापन करेगा। अगर कोई व्यक्ति वास्तु देवता की पूजा-अर्चना कर व्यवहार करेगा तो उसके सारे कार्य सफल होंगे। जो व्यक्ति वास्तु के अनुसार दुकान, फैक्ट्री, बिजनेस को चलायेगा, उसके व्यापार में काफी धन की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति तत्ववेत्ता संत के पास जाकर वास्तु के मर्म को समझकर अपना कार्य प्रारंभ करता है तो ऐसे व्यक्ति के सारे कार्य सिद्ध होते हैं, फलदायी होते हैं। ऐसे व्यक्ति शतायु होकर जीते हैं एवं धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की दृष्टिकोण से जीवन जीते है। उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि जब किसी व्यक्ति के घर का मुख्य द्वार उत्तर दिशा में हो या पूरब दिशा में हो तो उसके सारे कार्य सिद्ध होते हैं और अगर यह स्थिति न हो तो कोई न कोई विघ्न आ जाते हैं, इसके पीछे क्या रहस्य हैं? परम पूज्य गुरुदेव : यह संपूर्ण विश्व के कल्याण का प्रश्न है। हमारा जीवन ग्रह स्थिति पर आधारित है। हमारा जन्म किस ग्रह स्थिति में हुआ, यह जीवन का आधा हिस्सा है। इससे ज्योतिष आचार्य या आयुर्वेदाचार्य उसकी ग्रह दशा देखकर जीवन का आकलन करते हैं। अगर व्यक्ति के ग्रह-दोष ठीक न हों और उसमें वास्तु दोष भी अधिक हों तो व्यक्ति का जीवन अनंत दुःखों से घिर जाता है। अगर किसी व्यक्ति का टायलेट, बाथरूम पूरब दिशा की ओर होगा तो उसके घर में काफी संकट होगा, काफी रोग आएंगे या किसी के घर का मुख्य द्वार दक्षिण की ओर होगा तो उसके घर में काफी रोग आएंगे। उसके घर में ऐसे-ऐसे रोग आएंगे जो मृत्यु जैसे दुःखदायी होंगे। इसी तरह से एक अनंत विज्ञान है जिसमें कई चीजें देखी जाती हैं जैसे ‘उसकी मिट्टी कैसी है, घर की आभा कैसी है, उसमें पिता का स्थान कहां है, पुत्र या पुत्री कहां रहते हैं, संबंधियों का बिस्तर कहां है, बेड का सिर कौन सी दिशा में है, जल का स्थान कहां है आदि। जिन व्यक्तियों के घरों में ये दोष दूर हो जाते हैं उन्हें किसी तरह की कोई कमी नहीं रहती। जो तत्त्ववेत्ता संत हैं, ऋषि-मुनि हैं वह अपने आत्मीय तल से वहां रहने वाली आत्माओं से साक्षात्कार करते हैं और उससे वार्तालाप कर वहां से हटा सकता है और दिव्य आत्मा को निमंत्रित कर सकता है। ऐसे जो वास्तु शास्त्र के विशेषज्ञ हैं उनमें जब इस प्रकार की आभा आती है तो उसके अन्दर दिव्य आत्मा का आगमन होता है। प्रभु कृपा से इस रहस्य को जानने के लिए काफी लंबे समय की आवश्यकता होती है। फिर भी मैं ऐसे योग बताऊंगा जिसे करने से व्यक्ति अपने नये घर का निर्माण

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यमुना जल का वैज्ञानिक महत्व

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, जैसी माँ गंगा की दिव्यता है। वैसी मां यमुना की भी है। आप कृपया बताएं कि माँ यमुना के तट पर आकर कौन-कौन से रोगों से मुक्ति मिलती हैं? परम् पूज्य गुरुदेव : आपने जनकल्याण के लिए, समाज की जो समस्या रखी है, उनको सामने रखते हुए जगत के लिए जो अनूठा, जिज्ञासा भरा प्रश्न का अनुरोध किया है, वह निश्चय ही अर्थपूर्ण है। इस पहलू को समझने के लिए हमें कई आयामों को देखना पड़ेगा। तभी इसके महत्व के सार को जाना जा सकता है। सबसे पहले हमें इसके प्रारंभिक रूप में जाना पड़ेगा। जैसे आम जगत् में जो श्रेष्ठ पुरुष हैं या ऊँचे-ऊँचे पदों पर बैठे व्यक्ति हैं वे जब अपने स्थान का चुनाव करेंगे तो वे निकृष्ट स्थान का चुनाव नहीं करेंगे। वे उस स्थान को चुनेंगे जो अति उत्तम लगेगा। व्यक्ति अपने भ्रमण के लिए, मानसिक शांति के लिए उत्तम स्थानों का ही चयन करता है। भगवान् विष्णु ने जगत् कल्याण के लिए लीला करने के लिए वृंदावन की धरती को चुना। अगर इन्होंने इस स्थान का चयन किया, जहाँ उन्होंने बाल क्रीडा की, जहाँ से उनका अत्यंत लगाव रहा तो यह निश्चय ही परम् गहन रहस्य की बात है। यह धरती परम कल्याणकारी है, दिव्यता रखती है। जहाँ भगवान् के चरण पड़े, उस धरती की महिमा उसी तरह रहती है जैसे पूर्व में थी अर्थात् उनके समय में थी। भगवान् श्रीकृष्ण ने माँ यमुना के स्थान को चुना था, उन्होंने इस धरती का स्पर्श किया था, उन्होंने इस स्थान पर अपनी आभा दी, जल विहार किया तो उसका जो महत्व है वह हमेशा एक सा रहेगा। यह जो यमुना की बाहरी गंदगी है वह बाहरी परिवेश से संबंध रखती है, वातावरण से संबंधित है, सरकार से संबंधित है। इस पवित्र स्थान में जहाँ भगवान् विष्णु इतने वर्षों तक रहे हैं, वैसे स्थान की महत्ता किसी दूसरे स्थान की अपेक्षा अधिक है। भगवान् श्रीकृष्ण ने यमुना में स्नान किया है। इसलिए इस स्थान की जो दिव्यता है वह कभी खत्म नहीं होगी। इसका जल साफ नहीं है या यहाँ के रहने वाले लोगों की स्थिति अच्छी नहीं है, यह बाहरी वातावरण है, वह भगवान् की दिव्यता से संबंधित नहीं है। यह जो यमुना का बाहरी प्रारूप है, वह यहाँ के विभाग के कारण है। अगर यहाँ के विभाग के मंत्री चाहें, संचालक चाहें तो इसके प्रारूप को वे सुन्दर बना सकते हैं। अगर इसे स्वच्छ नहीं रखा जा रहा है तो यह हमारे लिए दुर्भाग्य की बात है। जब व्यक्ति यहाँ आता है तो अद्भुत आभा से युक्त हो जाता है। यमुना जी में स्नान करता है तो अद्भुत शांति मिलती है। अगर कोई व्यक्ति इसकी आभा को आँखों से देखना चाहेगा तो नहीं देख पायेगा क्योंकि यह दिव्यता का विषय है। यमुना के तट पर माँ यमुना के सिमरण के बाद भगवान् श्रीकृष्ण तथा राधा का जो सिमरण करता है ऐसे व्यक्ति को हजारों-करोड़ों वर्षों की तपस्या का फल मिलता है, क्योंकि यहाँ पर भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्यता प्रस्फुटित होती रहती है। इस बात को आप इस तरह समझें कि हमारी माँ जब बूढ़ी हो जाती हैं। तो वह तब भी हमारे लिए माँ ही रहती है। ठीक इसी प्रकार यमुना जी के गंदा होने से माँ यमुना का महत्व कम नहीं हो जाता है। माँ यमुना के दर्शन मात्र से ही जन्मों-जन्मों का फल प्राप्त होता है। अगर कोई व्यक्ति मानसिक अवसाद से ग्रस्त है, उसके मस्तिष्क में अवरोध है, वह तनाव से ग्रस्त है तो वैसा व्यक्ति अगर यमुना के किनारे आकर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का सिमरण करता है, तो केवल एक दिन के सिमरण करने से उसके मानसिक अवसाद, तनाव देखते-ही-देखते क्षण भर में खत्म हो जायेंगे।

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गंगा जल का वैज्ञानिक महत्व

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, गंगा जल का आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। हमारे हिन्दू संस्कृति के लोग गंगा को एक देवी के रूप में, एक माँ के रूप में स्वीकारते हैं। लेकिन आजकल की जो आधुनिक पीढ़ी है, वह गंगा को केवल साधारण नदी मानते हैं। गुरुदेव यह बताने की कृपा करें कि गंगा जल का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से क्या महत्व है? परम् पूज्य गुरुदेव : इस पृथ्वी पर जितनी भी नदियाँ हैं उनकी धारा का प्रवाह तथा गंगा नदी की धारा का प्रवाह एकदम विपरीत है। जिस दिशा में गंगा का प्रवाह है, उस दिशा में किसी भी नदी का प्रवाह नहीं है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर आप किसी नदी में हड्डी डाल देंगे तो वह वैसी की वैसी रह जाता है जबकि गंगा नदी में अगर हड्डी डाल देंगे तो वह हड्डी गलकर जल में विलीन हो जाती है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर किसी मुर्दे को गंगा में डाल देंगे तो मुर्दे से किसी भी प्रकार की दुर्गंध नहीं आयेगी। इसके अलावा कुछ मंत्रों का उच्चारण गंगा जल के द्वारा ही संभव है। जो व्यक्ति गंगा जल का सेवन नियमित करता है, उससे उसके हृदय को ताकत मिलती है एवं विभिन्न प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। अगर किसी आदमी को ल्यूकोड़मा है जिसका कोई इलाज नहीं है। ऐसे व्यक्ति अगर कुलंजना की जड़, मैनमिश की जड़ तथा बेरीगेटाकेना की जड़ को गंगा जल में रख कर पीस लें तथा उस स्थान पर लगायें, जिस स्थान पर ल्यूकोडुमा हुआ है तो पाँच-छः माह के अंदर ही वह रोग से छुटकारा पा जायेगा। त्वचा संबंधी अगर किसी को रोग हैं जैसे फोड़े-फुंसी, एग्जिमा आदि तो अगर नीम के पत्ते तथा चंदन को गंगा जल में पीस कर उक्त स्थान पर लगा लेगा तो त्वचा संबंधी रोग दूर हो जायेगा। गंगा जल का ऐसा प्रभाव है कि इस पर पूरे ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, माँ गंगा के स्नान करने से किस प्रकार के रोगों का उपचार होता है? इसके जल से किन-किन फलों की प्राप्ति होती है? परम् पूज्य गुरुदेव : आज अगर भारतीय भूमि पर शांति है यहां लोगों में आपसी प्रेम है तो वह तीन कारणों से है-गंगा, गीता तथा गायत्री। इनकी कृपा से यह सारा जगत प्रकाशमय है। अगर गंगा पृथ्वी पर न रहे तो पूरी पृथ्वी ऐसी हो जाएगी जैसे शरीर से आत्मा निकल जाती है। वैसे तो गंगा देखने से जल के समान प्रतीत होती है लेकिन इसके कुछ आह्वान मंत्र हैं। अगर कोई व्यक्ति गंगा के किनारे रात दो बजे गुरुमंत्र के बाद ग्यारह बार माँ गंगा के स्त्रोत का उच्चारण करेगा तो वह इक्कीस दिनों में ही माँ गंगा की अनुभूति करने लगेगा और अगर वह इकतालीस दिन इसका सिमरण करेगा तो माँ गंगा के साक्षात् दर्शन करने में सफल होगा। माँ गंगा से मन चाही मुराद पा सकता है पर वह नकारात्मक सोच का व्यक्ति न हो। कोबरीक के वृक्ष की लकड़ी कोई उपयोग में नहीं आती, उसके पत्ते कोई पशु-पक्षी भी नहीं खाते हैं। मगर सुबह के समय इसके फल को अगर गंगा जल में रख कर गंगा स्त्रोत (कवच) के बाद कोई उस गंगा जल का सेवन करता है तो उसका शरीर काँति से पूर्ण हो जाएगा। उसे धन की कभी कमी नहीं होगी, ऐसे परिवार में कभी क्लेश नहीं होगा एवं पति-पत्नी के बीच कभी तनाव नहीं होगा। अगर कोई व्यक्ति एड्स, कैंसर जैसे भयानक रोग से ग्रस्त है तो वह अगर चालीस दिन तक ऐसे जल का सेवन करेगा तो वह भी ठीक हो जाएगा। ऐसी माँ गंगा एवं कोबरीक फल की महिमा है। ऐसे-ऐसे ऋषि-मुनि गंगा तट पर बैठे हैं। जो देखने में गरीब लगते हैं परंतु इनमें कुछ ऐसे हैं जो साधन संपन्न होते हुए भी माँ गंगा के तट पर भगवान् गणपति, माँ लक्ष्मी, माँ गंगा, भगवान् शिव, भगवान् विष्णु एवं भगवान् ब्रह्मा का सिमरण करते रहते हैं और उन्हें प्रभु की कृपा प्राप्त होती है। जो भी व्यक्ति अपना पूजन शिवलिंग पर करता है तो उसे हजार गुणा फल मिलता है परंतु जो व्यक्ति अपने पूजन को गंगा स्नान कर गंगा के किनारे करता है, उसे अरबों-अरबों वर्षों का फल मिलता है एवं अनेक प्रकार से दैवीय कृपा की प्राप्ति होती है।

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भगवान श्रीकृष्ण के माखन चुराने का रहस्य

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, बाबा नंद एवं माँ यशोदा के यहाँ नौ लाख गायें हुआ करती थीं, उनके घर में मक्खन की प्रचुरता थी। फिर भी भगवान श्रीकृष्ण गोपियों के घर जाकर मक्खन क्यों चुराया करते थे ? परम् पूज्य गुरुदेव : यह अत्यंत मनोरम, भाव प्रधान एवं भक्तिपूर्ण, प्रशंसनीय प्रश्न है। भगवान की लीलाओं को जानने के लिए अनंत अनंत शास्त्रों का अध्ययन करना पड़ता है। आम मानव जब इस संसार में आता है तो वह कर्मों के दंड को भुगतने के लिए संसार में जन्म लेता है। लेकिन भगवान का अवतार जब इस धरती पर होता है तो वह अपने भक्तों का उद्धार करने, कल्याण करने के लिए होता है। अधर्म का नाश करके धर्म को स्थापित करना – यह भगवान् का मूल उद्देश्य होता है। भगवान् श्रीकृष्ण के समय में अर्थात् जहाँ-जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण ने विचरण किया, वहाँ जो भी ग्वाल-बाल थे, गोपियाँ थीं, वे सभी पिछले जन्म में असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी थे। उन्होंने अनेक जन्मों तक प्रभु से कामना की थी, ‘हे प्रभु हमें अपने चरणों में स्थान दो।’ ये सारे पूर्व जन्मों में ऋषि-मुनि थे। जब इन ऋषि-मुनियों का भगवान के साथ जन्म हुआ तो भगवान् ने उनके हृदय के वास्तविक अर्थों को जानने के लिए ऐसा मायाजाल रचा। वे यह जानना चाहते थे कि किन्हें प्रभु के प्रति समर्पण है तथा किनके हृदय में कोई लोभ है या नहीं है। जो भक्त आत्मा होगी, वह जितना देगी, उसके हृदय में और अधिक विशालता आयेगी। सद्गुरु भगवान् नारायण यह देखना चाहते थे कि ये सभी पूर्व जन्मों की तरह कार्य कर रहे हैं अथवा नहीं। भगवान श्री कृष्ण के समय मक्खन का व्यापार किया जाता था। वैसे इन गोपिकाओं को मालूम था कि भगवान श्रीकृष्ण अवतारी पुरुष हैं। साधारण मनुष्यों को अपने पिछले जन्म का स्मरण नहीं रहता है परंतु ऋषि-मुनियों को पिछले जन्मों का स्मरण रहता है। अतः भगवान् श्रीकृष्ण इन गोपियों अर्थात् पूर्व जन्म के ऋषियों द्वारा दिये गये वचन की परीक्षा लेने के लिए उनकी जो प्रिय वस्तु मक्खन है, उसको चुरा लिया करते थे। उन्हें मालूम था कि यह भगवान् की लीला है उन्हें इस मक्खन चोरी की क्रीड़ा में आनंद आता था। भगवान देखते थे कि कौन मुझे तन-मन-धन से प्रेम करता है। यह उनकी लीला थी क्योंकि भगवान की एक-एक क्रीड़ा अर्थ रखती है। वे अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें कुछ देने के लिए लीला करते थे क्योंकि जो सद्गुरु के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पित करता है, उसे समस्त चीजों की प्राप्ति होती है। वे ग्वालों एवं गोपियों के दुःखों को दूर करने के लिए ऐसा करते थे।

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पर्वतीय क्षेत्रों के अद्भुत प्रभाव

गुरुदास : परम् पूज्य गुरुदेव, जैसे कि माना जाता है कि उत्तरांचल (पर्वतीय प्रदेशों) में एक ऊर्जा प्रवाहित होती है। इस ऊर्जा से किन-किन रोगों का निदान और उपचार होता है। आप कृपा करें। परम् पूज्य गुरुदेव : जो व्यक्ति इण्डस्ट्री के वातावरण में या प्रदूषण के वातावरण में रहता है, उन्हें छाती के रोग, गले के रोग, आँखों के रोग, कानों के रोग, त्वचा संबंधी रोग, श्वास संबंधी रोग हो जाते हैं। ऐसे व्यक्ति को नाना-नाना प्रकार के रोग घेर लेते हैं और इन सब रोगों का कोई उपचार भी नहीं है। आज इतनी एलर्जी जो हो रही है उसका मुख्य कारण प्रदूषण है। मुंबई, दिल्ली अथवा बड़े-बड़े शहरों में जायेंगे तो छोटे-छोटे बच्चे जो एक माह के हैं, दो माह के हैं, तीन माह के हैं, उन्हें निमोनिया, एलर्जी हो रही है, ट्यूमर हो रहे हैं, कैंसर हो रहे हैं। यह सब केवल प्रदूषण के कारण हो रहा है। लेकिन उत्तरांचल की धरती पर प्रदूषण का नामोनिशान तक नहीं है। इतना सुंदर, शुद्ध और स्वच्छ है कि जो व्यक्ति रोग से ग्रस्त हैं वे यहाँ आकर रहेंगे तो बिना चिकित्सा के ही ठीक हो जाएंगे क्योंकि इन पौधों, औषधियों में जो देवीय गुण हैं। इनकी आभा है, इनकी जो हवा है, इन्हें छूकर जब यह हमारे श्वास में जाती है तो नाना प्रकार के रोगों का अंत कर देती है। अगर कोई व्यक्ति इण्डस्ट्री के एरिया में रहता है, वह मात्र एक महीना उत्तरांचल की धरती पर रहे तो उसका ई एस आर का लेवल ठीक हो जायेगा। टी एल सी डी एल सी ठीक हो जायेगा तथा उनका हिमोग्लोबिन का लेबल भी बढ़ जायेगा। अगर व्यक्ति को श्वास के रोग हैं। अथवा जो व्यक्ति स्टीराईड मेडिसिन तक ले रहे हैं, उन्हें लेने की आवश्यकता नहीं होती। हर मानव को चाहिए कि उत्तरांचल की धरती पर आये। यहाँ आकर देवी-देवताओं के महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों का भ्रमण करें, रसास्वादन करे और दैवीय कृपा का आशीर्वाद भी प्राप्त करें। इस सुन्दर, स्वच्छ एवं शुद्ध वातावरण में अपने तन और मन को स्वस्थता प्रदान करें। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, उत्तरांचल की धरती पर जो दिव्य वातावरण है, यह जो दिव्य स्थान है, उसका रोगों के निदान तथा उपचार में बहुत बड़ा महत्व है। हम सप्त ऋषि सरोवर के घाट पर बैठे हैं। इस सप्त ऋषि सरोवर के दिव्य वातावरण में किस प्रकार के रोगों का उपचार होता है? आप कृपा करें। परम् पूज्य गुरुदेव : इस दिव्य भूमि का महत्व है कि यहाँ भगवान् नारद मुनि, सभी सप्तऋषि और अन्य कई देवी-देवता यहाँ आकर साधना कर चुके हैं। आज भी बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, तपी तपस्वी यहाँ आकर साधना करते हैं। और कई-कई ऋषि-मुनि ऐसे हैं जिन्होंने कई जन्मों से यहाँ तपस्या की है, साधना की है। इस धरती का यह प्रभाव है कि इस धरती के आभामंडल में जो भी आत्मा आ जाती है, उसके धर्म, अर्थ, काम संबंधी सभी दोषों का, सभी रोगों का निवारण होता है। जो भी इन महात्माओं के सानिध्य में आ जाता है, इनके आशीर्वादों से ही रोग से ही उन रोगों से मुक्त हो जाता है, जिन रोगों का आधुनिक चिकित्सा जगत् में कोई उपचार नहीं है। यहां ऋषि-मुनियों का इतना आशीर्वाद और प्रभाव है कि जो आम मानव हैं, पापी प्राणी हैं, जिस मानव ने निकृष्ट काम किए हैं, वह भी अगर इस धरती पर आ जाता है तो उसे भी प्रभु की कृपा से पुण्य की प्राप्ति होती है। यहां जितनी भी प्रकार की जड़ी-बूटियाँ हैं, उसका तो अपना महत्व है ही परंतु साथ ही उन ऋषि-मुनियों का अधिक महत्व है जिसकी कृपा से उन जड़ी-बूटियों में दिव्यता आती है, आभा आती है। अगर आयुर्वेद की जड़ी-बूटियों में ऋषि-मुनियों का आशीर्वाद न हो, प्रभाव न हो तो ये जड़ी-बूटियाँ मौन हैं, कुछ कार्य नहीं कर सकती हैं। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, उत्तरांचल की भूमि पर कौन-कौन सी दिव्य औषधियाँ है? परम् पूज्य गुरुदेव : वैसे तो विश्व में जितनी भी प्रकार की औषधियाँ है, उसका पचास प्रतिशत् भाग उत्तरांचल की धरती पर अवतरण हुआ है क्योंकि विश्व में जितने भी ऋषि-मुनि, जितने भी दिव्य संत हैं उनमें पचास प्रतिशत् संतों का उत्तरांचल की धरती पर आगमन हुआ है। उनके चरण पड़े हैं। इस धरती की जो आभा है, वह अपने-आप में दिव्य है, अनूठी है। वैसे सफाई के दृष्टिकोण से अनेक स्थान है लेकिन दिव्यता की दृष्टि से इस धरती की जो महिमा है, वह सभी ऋषि-मुनियों ने गाई है, ग्रंथों में वर्णित है। इसलिए पृथ्वी के जितने भी आध्यात्मिक लोग हैं वे इस धरती पर भ्रमण करने, पूजा करने, तीर्थयात्रा के दृष्टिकोण से आते रहते हैं। इस धरती पर इतनी दिव्य औषधियां है जिसका वर्णन करना अत्यंत कठिन है। इस धरती पर जितने भी तरह के घास हैं, वृक्ष हैं, वे सारी औषधि हैं। ऐसी कोई भी जड़ी-बूटी नहीं है जिसमें दिव्य गुण न हो, जो कोई-न-कोई रोग को ठीक न करती हो। इसको जानने के लिए ऋषि-मुनियों के द्वारा जो मंत्र हैं, उसे उच्चारण करके औषधियों को तोड़ा जा सकता है। क्योंकि इसमें कई ऐसी-ऐसी जड़ी बूटियां हैं जो स्वयं बोलती हैं कि मुझे इस रोग के लिए उपयोग किया जाये। ऐसी कितनी ही जड़ी-बूटियों का चिकित्सा शास्त्र में वर्णन भी नहीं है। लेकिन ऋषि-मुनि इनके मंत्रों द्वारा या भाव जगत् के द्वारा इन्हें पहचान सकते हैं क्योंकि यह जड़ी-बूटियाँ भाव तल में रहती हैं। जब ऋषि-मुनि भावातीत अवस्था में चले जाते हैं तब जड़ी-बूटियाँ स्वयं बोलती हैं कि मुझमें गुण है, मुझे इस प्रकार से तोड़ा जाए और मेरा इस प्रकार से प्रयोग किया जाए। ये दिव्य औषधियाँ हंसती हैं, बोलती हैं। ये हमारे दुःखों का निवारण करती हैं, हमारे रोगों को खत्म करती हैं। इसमें सारी प्रकार की आभा है। जो भी व्यक्ति सिर्फ इस उत्तरांचल की धरती पर आकर प्रणाम भी कर लेता है तब भी उसके रोगों का यह धरती अंत करने वाली है। जो भी कोई इन औषधियों को मंत्रों द्वारा तोड़ने जायेगा तो वह देखेगा कि इन जड़ी-बूटियों में किसी में सफेद ऊर्जा, किसी में हरी तथा किसी में पीली ऊर्जा निकलती है। क्योंकि ये जड़ी-बूटियां मन के पार के जगत में रहती है, ये भावातीत तल में रहती है, ये आत्मिक तल

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पूर्वजों का जीवन में महत्व

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, हमारे पूर्वजों का आधार क्या है? परम पूज्य गुरुदेव : यह प्रश्न जगत कल्याण के लिए तथा बड़ा ही सारगर्भित व रहस्य की जिज्ञासा से परिपूर्ण है। आधुनिक जगत में युवा वर्ग, विज्ञान व अनेक प्रकार के धार्मिक व मनोवैज्ञानिक व्यक्तियों द्वारा बार-बार इसकी खोज की गई है। आत्मा सदैव एक रस, एक जगह रहती है तो फिर लोक-परलोक, शरीर बदलना या पितृदोष क्या है? इसका रहस्य क्या है? इस पर बड़े-बड़े वैज्ञानिकों, आधुनिक युग के व्यक्तियों तथा शिक्षार्थियों द्वारा विवेचना हुई है। इस पर सभी की अलग-अलग राय है। इस प्रश्न को केवल वे ऋषि जान सकते हैं जो शरीर के पार जाते हैं और शरीर के रहस्य को जानते हैं। आत्मा वास्तव में आती-जाती नहीं है। जैसे अगर हमारे शरीर को जला दे, नष्ट कर दें या पीड़ा पहुंचाए तो हमारी आत्मा को कष्ट नहीं होता। हमारे तन के द्वारा मन को कष्ट होता है। मन के साथ चित्त वृत्तियां होती हैं। नाना प्रकार के मन पिण्डों का रूप धारण करते हैं। जब भी शरीर का जन्म होता है तो आत्मा के साथ मन, बुद्धि और ऐसे नाना प्रकार के जो क्रिया कलाप हैं, भौतिक तत्व हैं जो अदृश्य तत्व हैं। उनका समावेश होता है। इस तरह यह चित्त द्वारा शरीर में आता जाता है। जैसे कई बार हम स्वप्न में अन्य-अन्य लोकों में चले जाते हैं या समुद्र में घूमते हैं या ऐसे-ऐसे स्थानों पर जाते हैं जहां पहले कभी नहीं गए होते। यह मन के द्वारा या मन की जो सूक्ष्म इन्द्रियां हैं उनके द्वारा होता है। जो ब्रह्मवेत्ता सत्य को जानकर ऋषि-मुनियों द्वारा सारगर्भित ब्रह्म को जान लेता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता, वह कभी इस लोक में नहीं आता। लेकिन जो मानव ब्रह्म तत्व को नहीं जानता, प्रभु के तत्व को नहीं जानता वह इसी जन्म में, इसी लोक में बार-बार लौटते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने भी इसके बारे में गीता में लिखा है, “जो भी अतृप्त आत्माएं होती हैं, अतृप्त मन होते हैं, अतृप्त इन्द्रियां होती हैं वे अपनी कामना की पूर्ति के लिए बार-बार आती हैं।” कुछ व्यक्ति तो ऐसे हैं जो शरीर छोड़ते हैं तो अपने घरों के आसपास ही रहते हैं। या अपनी दुकानों के पास रहते हैं। वे किसी भी योनि में जा सकते हैं, किसी भी शरीर में जा सकते हैं। ऐसे-ऐसे आधुनिक मनोवैज्ञानिकों द्वारा यह जाना गया है। अतृप्त आत्माएं (मन) फिर दूसरे के शरीर में आकर दुःख भी देते हैं और सुख भी देते हैं और नाना प्रकार के कष्टों से मुक्ति भी देते हैं। ऐसा ऋषि-मुनियों द्वारा प्रत्यक्ष जाना गया है। श्राद्ध के दिनों में या पवित्र स्थानों में या अमावस या पूर्णमासी के दिनों में जो स्त्री-पुरुष रति क्रिया में ग्रस्त होते हैं, उन्हें नाना-नाना प्रकार के रोगों से ग्रस्त होना पड़ता है, ऐसा ऋषियों द्वारा जाना गया है। यह शास्त्रों का मत है कि जो शास्त्रों द्वारा बताए गए मार्ग पर चलते हैं, प्रभु कृपा से उन्हें सभी रोगों से मुक्ति प्राप्त होती है। एक सत्य कथा है – एक बार एक आदमी ने काफी मेहनत करके एक अच्छी दुकान बनाई, लेकिन उसका बेटा लायक नहीं था। उस व्यक्ति की मृत्यु हो गई तो उसके बेटे ने दुकान संभाली। कुछ समय बाद देखते हैं कि एक कुत्ता आता है। वह दुकान के बाहर बैठा रहता है। लड़का बार-बार उस कुत्ते को मारता, कुत्ता नहीं जाता। लड़का फिर उस कुत्ते को डंडा मारता है पर कुत्ता नहीं भागता। ऐसा करते-करते एक दिन लड़के ने कुत्ते को ऐसा मारा कि उसकी मृत्यु हो गई। उसी समय एक तत्ववेत्ता संत वहां पहुंचे। उन्होंने कहा-“आपने यह क्या किया, यह तो पूर्व जन्म में आपके पिता थे। क्योंकि आपने कभी भी अपने पिता का कहना नहीं माना। उनका ध्यान सदैव दुकान और आप पर लगा रहता। वे आपकी रक्षा के लिए तथा आपको देखने के लिए दुकान के आगे बैठा करते थे कि आप दुकान ठीक से चलाते हैं या नहीं। ”  जिसका अंत समय में धन में या वासना में ध्यान रहता है, वह नीच योनि में भी जा सकता है, ऐसा शास्त्रों में वर्णित है।

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समय और औषधि

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, रोग के लिए समय तथा औषधि का क्या संबंध है? आपने एक बार उल्लेख किया था कि अमुक औषधि तोड़ने के लिए अमुक समय जरूरी है। इसके पीछे क्या रहस्य है? परम् पूज्य गुरुदेव : अगर किसी व्यक्ति का जन्म का दिन, दिशा, समय तथा स्थान का पता लग जाये तो उसी से उस व्यक्ति का सारा व्यक्तित्व पता लग जायेगा कि उस व्यक्ति का काम होगा अथवा नहीं होगा। आप किस समय में किस दिशा में जा रहे हैं, उससे पता लग जायेगा कि आपको सफलता। मिलेगी कि नहीं मिलेगी। इसी तरह औषधि के भी तोड़ने का समय होता है। अगर आपने गलत समय में औषधि तोड़ ली है तो वह आपको हानि कर जायेगी। जैसे ज्योतिष शास्त्र के आधार पर जन्म समय से ही उस बच्चे का भविष्य जाना जाता है। जैसे कोई अपने माँ के पेट से निकलता है तो उसका जन्म माना जाता है। ठीक उसी तरह जब वृक्ष से पत्ते टूटते हैं तो वह उसका जन्म माना जाता है।। वह मानव के शरीर में आकर नया जन्म ग्रहण करता है। औषधि को किस समय में तोड़ना चाहिए, किस भाव दशा में तोड़ना चाहिए, किस अवस्था में तोड़ना चाहिए, यह सारा उसी तरह से है जैसे हमारा चलना, हमारा जाना, हमारा घर से निकलना, किसी नये कार्य को करना है या शुभ मुहूर्त में कार्य करना है। इसके जैसे नियम हैं ठीक उसी प्रकार औषधि तोड़ने के भी नियम हैं। अगर आप कोई गलत समय में मुहूर्त करेंगे तो वह असफल हो जायेगा तथा जो असंभव कार्य हैं, अगर उसे सही समय पर करेंगे तो वह सहज हो जायेगा। यह चिकित्सक को भी देखना चाहिए कि वह किस मुहूर्त में रोगी को दवाई दे रहा है। उस मुहूर्त का क्या उपयोग है तथा उसमें किस दवाई का सेवन करना चाहिए। यह हजारों में किसी एक आयुर्वेद के चिकित्सक को मालूम है कि जनवरी के महीने में चन्द्रप्रभा बूटी तथा महाराज गुग्गल रोगी को नहीं दी जाती है। इस दोनों औषधि को अगर कोई चिकित्सक किसी रोगी को जनवरी माह में देगा तो वह औषधि काम नहीं करेगी। इसी तरह गुलदावरी बूटी है, मैनमिष है, चाईना अष्टर है। इसे अगर कोई चिकित्सक रोगी को मार्च महीने में सेवन करने देता है तो वह औषधि, काम नहीं करेगी। इसी प्रकार नीम, बकायन, बेरीगेटाकेना, सालमपंजा, कोंच के बीच, लाजवंती के बीज हैं, इस सभी का फरवरी माह में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। तुलसी के पत्ते को रविवार के दिन इस्तेमाल नहीं करना चाहिए तथा पूर्णमासी या अमावस्या के दिन इसको तोड़ना नहीं चाहिए। जब स्त्री माहवारी के दिनों में रहे तो इसके पत्ते को नहीं तोड़ें। इस प्रकार एक-एक वृक्ष का बहुत महत्व है। जो तत्ववेत्ता संत हैं, औषधि को जानने वाले हैं, वे नियम के अनुसार रोगी पर इन जड़ी-बूटियों का प्रयोग करते हैं।

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प्रेस विज्ञप्ति – रायपुर समागम, 4 – 5 मार्च 2023

रायपुर। अति आधुनिक शहर रायपुर के अमर मैरिज पैलेस में 4-5 मार्च 2023 को आयोजित होने वाले प्रभु कृपा दुख निवारण समागम की चर्चा जोरों पर है। छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी होने के साथ-साथ औद्योगिक और व्यापारिक केन्द्र रायपुर में निवास करने वाले लोग अपनी व्यस्ततम जीवनशैली के कारण दुखों, कष्टों व समस्याओं से घिरे रहते हैं। जब भी इन्हें परम पूज्य सद्गुरुदेव जी के आगमन के विषय में समाचार मिलता है तो ये बहुत ही उत्सुकता से इनके आगमन की प्रतीक्षा करते हैं। इस समागम के प्रति श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखने को मिल रहा है। इस समागम की तैयारियां बहुत जोर-शोर से चल रही हैं। श्रद्धालु भाई-बहनों में अपार उत्साह देखने को मिल रहा है। समागम आयोजक समिति के कार्यकर्ताओं ने बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगा दिए हैं। बड़े-बड़े पोस्टर भी पूरे शहर में लगा दिए गए हैं। समागम आयोजन स्थल पर पहुंचने वाले मार्गों के दोनों तरफ रंगीन झंडियां लगाई गई हैं। यहां की सभी की धर्मशालाएं, होटल, लॉज, यात्री निवास लगभग भरते जा रहे हैं। समागम आयोजन स्थल के मार्गों पर चहल-पहल देखी जा सकती है। भगवान श्री लक्ष्मी नारायण धाम के समागम आयोजकों ने इस अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी संख्या में आने को मद्देजर रखते हुए विशेष प्रबंध किए हैं। सेवा समिति के सदस्यों ने बताया कि परम पूज्य सद्गुरुदेव जी को महान ‘महाब्रह्मर्षि‘ (Mahabrahmrishi) पद से काशी विद्वत परिषद व सप्तऋषियों ने अलंकृत किया है, इससे हम सभी गौरवान्वित हुए हैं और हम उनके दर्शनों के लिए बहुत आतुर हैं। इससे पहले अमेरिका, कनाडा, यूरोप तथा अन्य पश्चिमी देशों ने भी बीज मंत्र की महाशक्ति को स्वीकार किया है। वहां की सरकारें प्रभु कृपा के शक्तिशाली विज्ञान को देखकर आश्चर्यचकित हैं। विश्व की महाशक्ति अमेरिका ने परम पूज्य महाब्रह्मर्षि श्री कुमार स्वामी जी को 29 अप्रैल 2022 को ‘मास्टर ऑफ बीज मंत्र’ व ‘स्कॉलर ऑफ स्प्रिचुअल साइंस’ अवार्ड दिया है, इससे भारतवासियों, साधु समाज तथा बुद्धिजीवियों के मन में असीम उत्साह का संचार हुआ है। सभी के मन में इस बीज मंत्रों के महासाधक व महामानव के दर्शनों की उत्कंठा है। सेवा समिति के सदस्यों ने आगे बताया कि परम पूज्य महाब्रह्मर्षि श्री कुमार स्वामी जी पूरे विश्व में प्रभु कृपा दुख निवारण समागमों के माध्यम से बीज मंत्र विज्ञान व अवध न महायोग के द्वारा दुख निवारण रहस्य प्रदान करते हैं जिससे तन, मन, धन के कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है तथा जीवन में खुशहाली आती है। जिन रोगों का इलाज मेडिकल साइंस नहीं कर पाई वह दुख निवारण पाठ से संभव हुआ है। समागमों में सुनाए गए अनुभव इसके साक्षात प्रमाण हैं। सारा विश्व सनातन संस्कृति और आयुर्वेद की ओर देख रहा है क्योंकि जिन रोगों का समाधान विश्व के डाक्टर और वैज्ञानिक वर्षों से खोज रहे थे उनका समाधान परम पूज्य महाब्रह्मर्षि श्री कुमार स्वामी जी ने सहजता से कर दिया है।

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काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार पर नियंत्रण के अद्भुत

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, इस जगत में चाहे साधारण व्यक्ति हो या कोई संत, सभी के सामने यही स्थिति है कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार पर नियंत्रण कैसे पाया जाए ? परम पूज्य गुरुदेव : यह प्रश्न जन कल्याण के लिए अति उत्तम है। इस जगत में जितने भी युद्ध हो रहे हैं, झगड़े हो रहे हैं, माता-पिता के, भाई-बहनों के, दोस्तों के, पति-पत्नी के देशों के, उनका मूल यह पांचों तत्वों का वास्तविक अर्थ न जानना है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार इन तत्वों को खराब कहना या इन तत्वों को अच्छा कहना, इसी से सारे विवाद हैं। इसी से आज सारे जगत में युद्ध हो रहे हैं। अगर कोई व्यक्ति इन तत्वों को जान ले, जैसे कोई चिकित्सक है वह रोग के मूल कारण को जानता है। क्योंकि कारण जानने के लिए उन्हें कितने-कितने टैस्ट कराने पड़ते हैं। लाखों रुपया खर्च करना पड़ता है। लेकिन औषधि तो मात्र कुछ रुपयों की होती है। उसी तरह से मूल है इन्हें जांच करना कि काम है क्या, क्रोध है क्या, इसकी उत्पत्ति कहां से हुई ?फिर इसे नियंत्रण कैसे किया जाए, इसे उपयोग में कैसे लाया जाएगा? अगर कोई इस स्थिति को जान लें तो वह सारे रोगों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। क्योंकि आज जगत में जितने भी रोग हैं सब पेट की खराबी से होते हैं, लीवर की गड़बड़ी से हो रहे हैं। जैसे किसी व्यक्ति को क्रोध आता है तो वह यह नहीं देखेगा कि वह क्या बोल रहा है या किससे बोल रहा है या ऐसा बोलने से दूसरे पर क्या प्रभाव पड़ेगा, वह पूरा क्रोध करेगा। उसके बाद जब आदमी क्रोध करके पछतायेगा तो वह व्यक्ति कभी भी क्रोध से पार नहीं हो सकता, वह थोड़े समय बाद फिर क्रोध करेगा। जो भी व्यक्ति माफी मांगेगा जगत की नजर में, कानून की नजर में, व्यावहारिकता की नजर में उसे अच्छा कहा जाएगा। उस पर दया की जायेगी और उसे अच्छा माना जायेगा। लेकिन जैसे उसको माफ कर दिया जायेगा वह थोड़े समय के बाद देखेगा कि व्यक्ति खुद कहेगा कि मैंने क्रोध किया था या काम किया था। जैसे कोई व्यक्ति अगर बलात्कार करता है तो उसे जब पता लगता है कि यह मैंने गलत काम किया तो वह पछताता है। उसे माफ भी कर दिया जाता है। लेकिन थोड़े समय बाद वह आदमी देखता है कि मेरे पास इसका कोई नियंत्रण नहीं हो रहा मैं अपने आपको कंट्रोल कर रहा हूं लेकिन मेरे पास इसका कोई उपाय नहीं है। थोड़े समय के बाद वह फिर उसी प्रक्रिया से गुजरता है तो वह आदमी पछताता है। इसी पछतावे में और करने में उसका जीवन बीत जाता है। वह रोगों से ग्रस्त हो जाता है और कोई आदमी आत्महत्या कर लेता है, कोई रोगों से ग्रस्त हो जाता है। जब कोई व्यक्ति इन तत्वों को जान लेता है तो है नब्बे प्रतिशत जो रोग हैं वे स्वयं समाप्त हो जाते हैं। इनके मूल कारणों को न जानना और इनके उपाय को न जानना सारे रोगों का जन्मदाता है। क्रोध शक्ति का प्रतीक है। क्रोध का अर्थ है इस व्यक्ति में शक्ति है। अगर व्यक्ति शक्तिहीन होगा या बीमार होगा तो उसे कभी क्रोध नहीं आएगा। सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि क्रोध, लोभ, अहंकार कोई खराब चीज़ नहीं है। इसका उपयोग करना हमें नहीं आ रहा। इसके उपयोग करने के उपाय क्या हैं, यह मैं आपको बताऊंगा। जो व्यक्ति इसका प्रयोग जान लेगा वह क्रोध को खराब नहीं कहेगा। एक तो जब भी किसी व्यक्ति को क्रोध आये, वह सबसे पहले हृदय में यह मान ले कि प्रभु ने मुझे प्रसाद दिया है। यह मेरे पास क्रोध आया है मैं इसका उपयोग करूंगा, क्योंकि यह देखा गया है कि जैसे ही क्रोध आता है तो वह व्यक्ति को पूरी गुलामी में ले लेता है। उसको अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है। उसमें व्यक्ति का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। सिर्फ क्रोध का अस्तित्व रह जाता है। व्यक्ति अपने आप को भूल जाता है। उसकी चेतना लुप्त हो जाती है, उसकी सहनशक्ति का लोप हो जाता है और क्रोध अपनी मर्जी से व्यक्ति को चलाता है। सबसे पहले व्यक्ति को यह सोचना चाहिए कि मैं क्रोध के नियंत्रण में नहीं रहूंगा। अब मैं इस पर नियंत्रण करूंगा, अब मैं इसको अपने पास बांध लूंगा और इसका मैं उपयोग करूंगा। इसका एक मंत्र है। जब भी क्रोध आता है तो वह सांस की प्रक्रिया के द्वारा आता है। जब भी किसी व्यक्ति को क्रोध आए तो वह एक मिनट के लिए अपनी सांस को बंद कर ले और नाभि से मात्र ‘ह्रीं’ मंत्र का उच्चारण करें। इस तरह का मां जगदम्बा का मंत्र है। अगर श्वास उससे बंद नहीं होता तो वह धीरे-धीरे नाभि के अंदर से ह्रीं मंत्र का उच्चारण करे तथा श्वांस धीरे-धीरे ले। जब व्यक्ति मंत्र का प्रयोग करेगा और साक्षात जो दिव्य शक्तियां हैं वह उसकी नाभि में उसके हृदय में प्रवेश कर जाएंगी और वह शक्ति फिर उसे बोध कराएगी कि उस क्रोध ने उसको कितना सुन्दर बना दिया है। अगर क्रोधी व्यक्ति का टैस्ट करवाया जायेगा तो उसका उत्तर वही आएगा जो एक पागल व्यक्ति का होता है। जब किसी व्यक्ति को काम वासना आती है तो वह अपने आपको भूल जाता है क्योंकि कामुक व्यक्ति सदा कमजोर होता है तथा शांत व्यक्ति अधिक शक्तिशाली होता है तथा उसमें काम शक्ति भी अधिक होती है। क्रोधी व्यक्ति में काम शक्ति की कमी होती है उसके शरीर में नाना प्रकार के रोग होते हैं। जब भी किसी व्यक्ति में काम या क्रोध का आवेग आये तो सबसे पहले जाने कि यह काम है, यह प्रभु का प्रसाद है क्योंकि काम से हमारी उत्पत्ति हुई है। काम से जगत की उत्पत्ति हुई है, काम परमात्मा की तरफ ले जाता है। हमारे जो माता-पिता हैं वे भी काम से पैदा हुए, हम भी काम से पैदा हुए। जब भी कामवासना आए व्यक्ति को ‘क्लीं‘ शब्द का प्रयोग करना चाहिए। पहले एक बार ‘ॐ‘ शब्द का प्रयोग करे, उसके बाद ‘क्लीं क्लीं’ बोलता जाए। जब व्यक्ति बार-बार ‘ॐ’ का प्रयोग करेगा तो उसकी लयबद्धता टूट जाएगी और धन की कमी

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प्रभु का अद्भुत न्याय

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, आमतौर पर जनसाधारण की यह मान्यता है और एक स्वाभाविक संशय भी है कि जो व्यक्ति धार्मिक है, धर्मपरायण है अथवा जिस व्यक्ति की ईश्वर में आस्था अधिक होती है, वह ही आमतौर पर अधिक पीड़ित होता है, व्यथित होता है, दुःखी होता है एवं भौतिक तथा सामाजिक दृष्टि से अभावग्रस्त भी होता ऐसा क्यों? परम पूज्य गुरुदेव : ऐसा नहीं हैं यह केवल भ्रम है। आप यह कैसे कह सकते हैं कि इस जन्म में जो पुण्य वह कर रहा है, उसका सुफल उसे आगे आने वाले जीवन या जन्मों में क्या मिलेगा या कब मिलेगा? और अभी हाल में जो वह भुगत रहा है, क्या पता इस कर्मफल का किस जन्म जन्मांतर से संबंध जुड़ा हुआ है, जिसे इसी जन्म में भोगना निश्चित है। मानव जीवन में तीन प्रकार के कमी का समावेश रहता है-क्रियामान, प्रारब्ध एवं संचित । अब संचित कर्मों का जिस प्रकार उपयोग हो रहा होगा, उस समय उस प्रकार की ग्रह दशा होगी, उस प्रकार का वातावरण मिलेगा, उस प्रकार की हम संगति करेंगे अथवा तदनुरूप व्यसनों में हम फंस जाएंगे। उस-उस प्रकार के रोगों से पीड़ित हो जाएंगे। यह निश्चित है। लेकिन पाप पूर्व जन्म का है या अनेकों जन्म जन्मान्तरों का, यह नहीं मालूम कि किस जन्म का है?यह शास्त्र सम्मत बात है एवं इसमें सत्य का समावेश है। जब आप यह कहते हैं कि फलां आदमी भगवान का नाम भी ले रहा है और उस पर घोर संकट, दुःख, आपत्तियां भी आ रही हैं और आपको यह विरोधाभास भी दिखाई देता है, पर कभी आपने इस दृष्टिकोण से भी सोचकर देखा है कि अगर वह प्रभु का नाम भी न लेता तो और भी भयानक संकटों का शिकार हो जाता, चल भी न पाता। किसी अस्पताल में पड़ा होता अर्थात उसकी ऐसी दु:स्थिति होती जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। सच यही है कि प्रभु का नाम ही उसे उन भयानक संकटों से बचाए हुए है। मान लो अपने दुष्कर्मों के कारण उसे सूली पर चढ़ाया जाना नियत है या फांसी लगना विधि द्वारा निर्धारित है। लेकिन प्रभु नाम कवच से मात्र सुई चुभने के दर्द या कांटा लगने से ही उसका छुटकारा हो जाए। ऐसे में सूली की जगह ‘शूल’ ले लेता है यानी कर्मों का दुष्परिणाम प्रतीकात्मक होकर रह जाता है। मामूली दर्द के रूप में कर्मफल सूक्ष्म हो जाता है। एक और उदाहरण से समझें कि आपको बेहद सर्दी लग रही है और आपने कम्बल ओढ़ रखा है और कम्बल लेने के बाद भी आपको ठण्ड लग रही है तो जरा कल्पना करो, अगर आपने कम्बल भी न लिया हो तो आपका क्या होता? आप विदेशों को ले लीजिये। यूरोप को ले लीजिए। भौतिकता में डूबे हुए विदेशी प्रभु का नाम नहीं लेते, नास्तिक प्रवृत्ति के है लेकिन वह ऐश्वर्य भी भोग रहे हैं, यह आपको आभास हो सकता है। लेकिन कभी उनके भीतर उनके अन्तर में झांको क्योंकि हम तो पूरे विश्व में भ्रमण करते हैं। लोगों का देखते हैं, समझते हैं। मंत्रीगण, राजनीतिज्ञ, उद्योगपति ये सभी व्यथित हैं, छिन्न-भिन्न हैं। अपितु जो निर्धन हैं, अभावग्रस्त हैं वे संतुष्ट हैं। आप भौतिक आँखों से देखते हैं तो आप भौतिक कष्ट ही देखते हैं, लेकिन आंतरिक अवस्था अलग है। प्रभु का जो सिमरण है वह भीतरी कष्टों का भी निवारण करता है। अपने-अपने इष्टदेव का सिमरण अपने विश्वास के अनुसार करने से आपका अन्तःकरण धवल, शुद्ध हो जाता है। वासना का अन्त दुःख ही है। कोई भी भोग भोगते हुए आपको अच्छा लगेगा लेकिन उसका अन्त, उसकी परिणति हमेशा दुःखमयी ही होगी, यह अटल ध्रुवसत्य है। प्रभु का नाम प्रारंभिक अवस्था में हमें कष्टकर, असुविधाकर लग सकता है लेकिन अन्त कल्याणकारी होगा। समस्त रोगों का नाश करने वाला होगा। प्रभु सिमरण करने वाला सभी तापों से मुक्त हो जाता है। तन, मन, धन व आत्मा से परिपूर्ण हो जाता है। उसे कोई अभाव नहीं रहता। उसका लोक-परलोक दोनों संवर जाते हैं।

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