Jagadguru MahaBrahmrishi Shree Kumar Swami ji

Mahabharat

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अहंकार का परिणाम

विनम्रता व समर्पण ही व्यक्ति को महान बनाती है और परमात्मा तक पहुंचा देती है। जब तक मनुष्य विनम्र होगा और अहंकार रहित होगा तब तक उसमें विकार नहीं आता। वह सतत् ऊपर की ओर बढ़ता जाता है। लेकिन प्रायः ऐसा होता है कि जैसे ही उसे कोई मुकाम मिल जाता है वह वही रुक जाता है। इतना ही नहीं कुछ समय पश्चात् वह अहंकार भाव से भर जाता है। उसकी सोच यह होती है कि जो कुछ भी मैंने प्राप्त किया है वह मैंने अपनी योग्यता से किया है। इसमें किसी का कोई योगदान नहीं है। ऐसे कई उदाहरण हैं कि विश्व की बड़ी हस्तियों ने अपनी विनम्रता व पाठ के प्रभाव से उच्च पद को प्राप्त किया लेकिन पद पर पहुंचने के उनमें अहंकार आ गया और पाठ से विमुख हो गए। इसका परिणाम यह निकला कि उनका पुनः पतन हो गया। तपोराज तप से राज्य की प्राप्ति होती है और तप के क्षय होने पर पुनः नर्क की प्राप्ति हो जाती है। अतः तप करते रहना चाहिए, सत्य को कभी नहीं भूलना चाहिए।  युधिष्ठिर को अपनी सच्चाई गर्व हो गया था लेकिन एक झूठ के कारण उन्हें भी नर्क भोगना पड़ा था। महाभारत युद्ध में उन्होंने कहा कि अश्वत्थामा मारा गया जबकि अश्वत्थामा नाम का हाथी मारा गया था। इसी अर्द्धसत्य ने उन्हें नर्क की पीड़ा भी अंतिम समय में दी थी कि उनकी तब उंगली गल गई। थी जब वे स्वर्गारोहरण कर रहे थे। बालि ने भगवान राम से पूछा कि मुझे आपने क्यों मारा? क्या मैं आपका बैरी हूं और सुग्रीव प्यारा है? भगवान ने कहा कि जो व्यक्ति विनम्रता को छोड़कर अहंकार के वश होकर गलत कार्य करने लगता है और मर्यादाओं को भंग करता है, उसे दंडित करने में कोई बुराई नहीं है। तुमने अहंकारवश अपने भाई का राज्य छीन लिया और उसकी पत्नी को भी अपने घर में पत्नी के रूप में रख लिया है। अतः तुम जैसे दोषी को मृत्युदंड देने में कोई पाप नहीं है। इसी प्रकार भीष्म पितामह जब कुरुक्षेत्र के मैदान में शरशैय्या पर लेटे हुए थे तब भगवान श्रीकृष्ण उनसे मिलने के लिए आए। भीष्म पितामह ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि हे प्रभु, मैंने सारा जीवन धर्माचरण में व्यतीत किया और अपनी प्रतिज्ञा का वहन किया। लेकिन क्या कारण है कि अंतिम समय में मुझे तीरों की नोक पर लेटना पड़ रहा है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि हे भीष्म, आप सभी के लिए और स्वयं मेरे लिए भी वंदनीय हो । आपका प्रश्न जायज है। आपने उम्र भर अपने कर्तव्यों का पालन किया और पूरे कुल का संरक्षण व संवर्धन प्रदान किया। आपको याद नहीं है कि जब आप युवावस्था में थे तब आप में इतना अहंकार था कि किसी को कुछ नहीं समझते थे। आपने युद्धों में कितने ही सैनिकों व जीवों का संहार किया है। शिकार में न जाने कितने पशुओं का वध किया है। (बोधगया समागम) –प्रभु कृपा पत्रिका,जनवरी, 2019

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पेड़ों को काटने के दुष्परिणाम

पेड़ों को काटना नहीं चाहिए। पेड़ों को काटने का अपराध भी मनुष्य की हत्या करने के समान ही है। पेड़ हमें जीवन प्रदान करते हैं। आज जितनी भी प्रदूषण व पर्यावरण की समस्या पूरे विश्व के सामने है, वह पेड़ों को काटे जाने की वजह से है। हमें जितना भी संभव हो वृक्ष लगाने चाहिए। पेड़ हमें प्राण वायु प्रदान करते हैं, ऊर्जा देते हैं। महाभारत की एक कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपनी मृत्यु के अंतिम क्षण शर-शैय्या पर लेट कर बिताए थे। उल्लेखनीय है कि उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान मिला हुआ था और वे सूर्य के उत्तरायण होने पर ही प्राण त्याग करना चाहते थे, जिसमें अभी देर थी। उतने दिनों तक वे रणभूमि में ही शर-शैय्या पर लेटे रहे। एक दिन उनसे मिलने के लिए भगवान श्रीकृष्ण आए। भीष्म पितामह ने विनम्र भाव से उनसे पूछा कि हे प्रभु, मैंने तो पूरा जीवन सनातन मर्यादाओं का पालन करते हुए धर्माचरण से व्यतीत किया है लेकिन मुझे यह क्यों भोगना पड़ रहा है कि मैं इस शर-शैय्या पर कष्टपूर्वक लेटा हुआ हूं? भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि हे पितामह, आपने एक समय पीपल के पेड़ के पत्ते को अपने बाण की नोक से बींध दिया था जिसके फलस्वरूप आपको यह संताप भोगना पड़ रहा है। पीपल के पेड़ को बींधने मात्र की इतनी बड़ी सजा भीष्म पितामह को भोगनी पड़ी तो वृक्ष को काटने की सजा क्या हो सकती है, वह आप अंदाजा लगा सकते हैं। पेड़ों की सेवा करने और उनका पालन करने से परमात्मा प्रसन्न होते हैं और इनकी दुआएं मिलती हैं। इनको कष्ट पहुंचाने व काटने से ऐसी बदुआएं मिलती हैं कि मनुष्य का जीवन नर्क बन जाता है।  हमें इन पेड़-पौधों से वे जड़ी-बूटियां प्राप्त होती है जो जीवनदायिनी होती हैं। अब यह दुखद स्थिति है कि जंगल तो नाममात्र के लिए रह गए हैं, पहाड़ों तक पर लोग वृक्षों व पौधों को उजाड़ रहे हैं। अज्ञान के अभाव में हम जड़ी-बूटियों की और औषधीय गुणों वाले पौधों की पहचान नहीं कर पाते और उन्हें नष्ट कर देते हैं। हमारे ऋषि-मुनियों के आश्रमों की भूमि में ऐसे-ऐसे विलक्षण पेड़-पौधे होते थे कि जो तत्क्षण प्रभाव करने वाले औषधीयगुणों से युक्त होते थे। आज की एजुकेशन इस तरह का ज्ञान नहीं देती। साथ ही यह भी बता देना चाहता हूं कि विदेशों के वैज्ञानिकों ने इस ज्ञान को पकड़ लिया है। अब हमारी इन जड़ी-बूटियों का उपयोग वे कर रहे हैं। वह दिन दूर नहीं कि वे इन्हें अपना पेटेंट भी करा लें। हमें समय आते जाग जाना चाहिए। जो आयुर्वेद हमारी धरोहर है अब उपयोग दूसरे देश कर रहे हैं। -प्रभु कृपा पत्रिका, जनवरी, 2019

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