Jagadguru MahaBrahmrishi Shree Kumar Swami ji

Q&A with Gurudevji

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मन के पार जाने की राह

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, हमारे दुःखों, कष्टों का मूल मन है, इसे नियंत्रित करने के लिए बहुत सी विधियां अपनाई जा रही हैं। आप कृपा करके बताएं कि मन पर कैसे नियंत्रण किया जाए? परम पूज्य गुरुदेव : यह सारा जगत माया के प्रसार से व्यापार और स्वार्थ का डेरा बन चुका है। अगर मन का पूरा नियंत्रण हो जाए तो विस्फोट तक हो सकता है और मेरे उक्त वक्तव्य पर आजकल के तथाकथित धर्मगुरू रुष्ट होकर विद्रोही भी हो सकते हैं। उन्हें आपत्ति हो सकती है लेकिन जैसा कि कहा गया है। कि ‘अन्याय सहना भी एक प्रकार से पाप है’ तो अगर मैं इस सारी स्थिति से वाकिफ होते हुए भी मौन रहता हूं, तटस्थ रहता हूं, वास्तविकता का प्रकटीकरण नहीं करता तो मुझे या कोई भी और जो जानकार है पर खामोश है, उन्हें भी सत्य को छिपाने का दोष लगता है। जैसा कि इतिहास में दर्ज है कि गैलीलियो के इस उद्घाटन कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है’ से पहले लोग यही मानते थे कि । पृथ्वी स्थिर है एवं सूर्य घूमता है तो गैलोलियों की आवाज को दबाने के लिए उसे तरह-तरह के प्रलोभन दिये गए कि ‘तू ऐसा कहेगा तो हमारे सारे धर्मग्रंथ गलत हो जाएंगे।’ पर सच्चाई छिप नहीं सकती। इसीलिए गैलीलियो ने किसी प्रकार भी दबाव के आगे झुकने से मना कर दिया कि ‘अगर में आज चुप रह जाता हूँ तो कल कोई और वैज्ञानिक आकर सत्य को प्रकाशित करेगा तो मैं पाए। का भागी क्यूं बनू?” सत्य की खातिर ही सुकरात ने भी विष का प्याला पिया और अन्तिम क्षणों में भी उसकी सत्य की खोज जारी रही। आजकल धर्मगुरु एक फैक्ट्री के प्रोडक्ट की तरह पैदा हो रहे हैं और अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए ही ऐसा आचरण व ज्ञान बांटते फिर रहे हैं जिससे जनसाधारण की मानसिकता निम्न स्तरों की तरफ जा रही है। ऐसी जितनी भी | विधियां मार्केट में धर्म के ठेकेदारों द्वारा बताई गई है, सब निष्फल हैं। मन को नियंत्रण करने वाला कोई भी यंत्र या उपकरण नहीं है। मन तो दर्पण है जो आपको आपका वास्तविक रूप दिखाता है, उसका नियंत्रण कैसे संभव हो सकता है। जो मन को कोई कंट्रोल में कर ले, काबू में कर ले, ऐसा भी कोई व्यक्ति नहीं है। हाँ मन को जाना जा सकता है एवं मन के पार जाया जा सकता है। मेरी बातें आपको अटपटी लग सकती हैं, लेकिन सच्चाई यही है। आप बताइये दुनिया में कोई ऐसा व्यक्ति है जो अंधरे को नियंत्रण में कर ले ?प्रकाश अंधेरे को मिटा तो सकता है लेकिन नियंत्रण नहीं कर सकता। एक का अस्तित्व दूसरे का समापन है। इसे आप विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक आईंस्टीन के सापेक्ष सिद्धान्त से भी जोड़ सकते हैं। निष्कर्ष यह निकलता है कि मन को लोप तो किया जा सकता है, मन को विलीन तो किया जा सकता है। मन से पार तो जाया जा सकता है पर नियंत्रण हास्यास्पद है। मन को काबू करने की विधियां बताने वाले भी मन से ही तो बात करते हैं। तो मन से मन कभी कंट्रोल में नहीं आता। आदमी इसी प्रयास में डोर के धागों की तरह उलझता चला जाता है। आजकल के गुरु किसी गुरुमंत्र द्वारा मन को बांधने की विधि, उपाय, टैक्नीक बताते हैं कि ‘तू इसमें बंधा रह और मेरा नाम जपता रह’, पर वास्तव में उन्हें सफलता नहीं मिलती। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, एक आम धारणा है कि योग से मन को बांधा जा सकता है। क्या ऐसा संभव है? परम पूज्य गुरुदेव : योग क्रियाओं, त्राटक या प्राणायाम से मन कुछ समय के लिये शान्त अवश्य हो सकता है लेकिन काबू नहीं हो सकता। मैं विश्व के अनेकों योगियों, साधकों के पास गया हूं, जिनके लाखों शिष्य हैं और वे स्वयं अभी तक अपने मन पर कंट्रोल नहीं कर पाए हैं। उनके अहम् को थोड़ी सी चोट पहुंचे तो वह भड़क उठते हैं तो यह सब कहने की बातें हैं। मन को बांधने के गलत प्रयोग मानव को गलत दिशा में ले जाते हैं और मन को बार-बार बांधते हैं। और मन खूंटे से बंधे जानवर की तरह बार-बार स्वयं को बंधन से मुक्त करना चाहता है और पुनः पुनः चंचल हो उठता है। अगर डॉक्टर किसी स्वस्थ आदमी को रोगी मानकर दवाई देता रहे तो वह तो उस रोगी से भी ज्यादा खतरनाक स्थिति हो जाएगी, अगर उस आदमी को वह रोग रहता। जैसे होम्योपैथी में प्रोविंग ऑफ ड्रग्स सिद्धान्त है जिसके चलते जो दवाई किसी रोगी को ठीक करती है, वही अगर स्वस्थ आदमी प्रयोग कर ले तो उसी रोग के लक्षण उस स्वस्थ आदमी में उत्पन्न हो जाते हैं। कुछ डॉक्टर रोगी की जांच करने पर उसमें कोई रोग न पाकर उसे ‘भ्रम’ नामक रोग का शिकार बना देते हैं कि तुझे फलां रोग है। ऐसे डॉक्टर नहीं चाहते कि रोगी उनकी गिरफ्त से छूटे, क्योंकि अगर उससे रोगी छूट जाएगा तो डॉक्टर को कष्ट हो जाएगा। उसी प्रकार अगर हम किसी वकील के पास जाते हैं तो समस्या चाहे कोई हो या न हो वह फिर भी कम करने के लिए कोई न कोई समस्या बना देगा। वह नहीं चाहेगा कि उसका क्लाइंट उससे छूटे। हर बार कोई न कोई नया झमेला डालकर उसकी तारीख डलवा देगा और जितना हो सके केस को लम्बा खींच कर से जाएगा ताकि उसकी सोने की मुर्गी अण्डे देती रहे। लेकिन सही मायनों में अगर कोई वकील होगा तो अपने मुवक्किल की समस्या का हल कम से कम पेशियों में करना चाहेगा। जैसे वह उसका केस लोक अदालत में ट्रांसफर करवा सकता है या स्वयं मध्यस्थ बनकर दोनों पार्टियों में कंप्रोमाइज करवा देगा। पर इस प्रकार के प्रोफेशनल मिलना आज की दुनिया में एक स्वप्न की भाँति है। इसी प्रकार अगर कोई डॉक्टर, चिकित्सक वास्तव में निर्लोभी है, शुद्ध अन्तःकरण का है एवं सात्विक आचार विचार के साथ निःस्वार्थ व्यक्तित्व है तो वह जल्द से जल्द रोगमुक्त करना चाहेगा पर स्वार्थ में अन्धे कुछ डॉक्टर धोखे से असहाय रोगी के गुर्दे तक निकाल लेते हैं व उन्हें बेच भी देते हैं। आजकल के अधिकांश तथाकथित गुरु उपरोक्त प्रकार के डॉक्टरों एवं वकीलों की श्रेणी

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इष्टदेव के दर्शन के रहस्य

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, इष्टदेव के दर्शन आमने-सामने कैसे हो सकते हैं? परम पूज्य गुरुदेव : आपका प्रश्न अति उत्तम है। इस जगत में अधिकतर लोग तन के रोगों के बारे में जानना चाहते हैं। कोई मानसिक रोग से परेशान है, कोई पारिवारिक रोग से परेशान हैं। बहुत कम ऐसे लोग हैं जो प्रभु के दर्शन की कामना करते हैं। यह भावना संसार में अतिश्रेष्ठ है। यह प्रभु के द्वारा ही प्राप्त होती है। यह अति उत्तम अवस्था कही गई है। जब कोई मानव धन की कामना करता है, रोग की कामना करता है तो यह सकाम कामना होती है। मानव में पिछले जन्मों के संस्कारों से, ग्रह की स्थिति से, अच्छे माता-पिता के संस्कारों से, अच्छे गुरु के सान्निध्य से प्रभु दर्शन की कामना जाग्रत होती है। जिसको प्रभु के दर्शन हो जाते हैं उनके तन, मन, धन के रोग स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि मेरे कई प्रकार के भक्त हैं लेकिन ‘ज्ञानी’ को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। जो मनुष्य सारे कर्म मेरे लिए, मेरे दर्शन पाने के लिए कर रहा है उसके सारे काम स्वतः ही पूरे हो जाते हैं। उन्हें इस संसार में किसी प्रकार की कमी नहीं रहती। ऐसे-ऐसे मंत्र हैं, ऐसी प्रार्थना है जिनका हृद शुद्ध है और जिनके हृदय से स्वतः ही प्रार्थना निकलती है प्रभु उन्हें अवश्य ही दर्शन देते हैं। लेकिन शास्त्रोक्त नियम भी हैं, शास्त्रोक्त फल भी हैं, ऐसे अनंत लोग जो पर्वतों, गुफाओं व इस जगत में भी साधारण रूप से विचरते हैं जिन्हें भ जगदम्बा के, भगवान श्रीकृष्ण के, भगवान श्रीराम, सद्गुरु नानक के साक्षात दर्शन हो चुके हैं। अगर उस नियम को अपनाएं और उस मंत्र को सम्पुटित कर सुबह-शाम प्रार्थना करें और शतचण्डी का पाठ करें तो मां दुर्गा के अवश्य दर्शन हो जायेंगे। इसके प्रमाण है पथिक बाबा के शिष्य विशुद्धानन्द जी ऐसे संत जगत में आज भी हैं जिन्हें मां जगदम्बा के भगवान श्रीकृष्ण के, भगवान श्रीराम के साक्षात दर्शन हो चुके हैं और वे जब चाहें बात कर सकते हैं। उनके आदेश से वे चलते हैं, जगत में विचरते हैं, प्रार्थना करते हैं तथा लोगों के कष्ट हरते हैं। जब आदमी निष्काम हो जाता है तो फिर ये संत अपनी कृपा से उसे वीजमंत्र देते हैं। बीजमंत्र के द्वारा यह सम्पुटित पाठ करके, जो इसका विधिपूर्व परायण करते हैं, उन्हें मां जगदम्बा ऐसे दर्शन देती हैं जैसे हम तुम आमने-सामने बैठे हैं। इस पृथ्वी पर जो भी चल रहा है वह मां जगदम्बा की कृपा से ही चल रहा है। मां जगदम्बा की कृपा से इस जगत में जो चाहे कर सकते हैं। किसी भी रोग का निवारण कर सकते हैं। किसी भी अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं। किसी भी सिद्धि को प्राप्त कर सकते हैं। इस जगत से परे जो अनंत अनंत लोक हैं, उनकी भी वे यात्रा कर सकते हैं या जो भी उनकी मनोकामना हो वह मां जगदम्बा की कृपा से पूर्ण कर सकते हैं। वे सभी जिज्ञासु जो मां जगदम्बा के दर्शन के प्रार्थी हैं वे इस मंत्र को जिन-जिन गुरुओं को मां जगदम्बा के दर्शन हो चुके हैं, उनसे बीजमंत्र लेकर इस मंत्र का उपयोग करें। मंत्र: विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम् । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ जो इस मंत्र का विधिपूर्वक सम्पुटित पाठ करके दुर्गा सप्तशती का शतचण्डी पाठ कराते हैं तो मां जगदम्बा उसे अवश्य दर्शन देती हैं। ऐसा ऋषि-मुनियों द्वारा, शास्त्रों द्वारा प्रत्यक्ष जाना गया है, अनुभव किया गया है। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, हमारे देवताओं की मूर्तियां क्या वास्तविक हैं या मन की भावना को साकार किया गया है, अनुभव किया गया है ? परम पूज्य गुरुदेव : यह प्रश्न आज के युवा वर्ग के लिए और आधुनिक समाज के लिए परम कल्याणकारी है। आजकल हमारी संस्कृति पश्चिमी देशों से प्रभावित है। इस जगत में सबसे कठिन कार्य प्रभु की भक्ति करना है। अगर आप किसी युवा वर्ग को कह दें कि फलां जगह धन है या यह कार्य करने से धन मिलेगा या अमेरिका, कनाडा चलना है या फलां जगह चलने से बड़ा लाभ होगा हो ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो उसकी तरफ आकर्षित न हो। सौ में से कोई एक व्यक्ति होगा जो प्रभु की भक्ति की तरफ आकर्षित होगा। अगर कोई विद्यार्थी संस्कृत का ज्ञान आध्यात्म विषय का ज्ञान करके उसमें दक्षता प्राप्त कर से तो इस जगत में जो चाहे प्राप्त कर सकता है। जिसे अनंत अनंत विषयों का ज्ञान करके आधुनिक युग में नहीं प्राप्त कर सकता। आज का युवा वर्ग हालांकि रूप से सुन्दर है, शरीर सुन्दर है, धन की कमी भी नहीं है, मन से भी सबल है लेकिन जितना वह विकार ग्रस्त हो रहा है उसका कारण प्रभु की भक्ति का न होना है। आध्यात्मिक विषयों की कमी होना है। क्योंकि इन विषयों को पढ़ाया नहीं जाता। विदेशों में कहीं आध्यात्म नहीं मिलेगा। हमारी शिक्षा विदेशी संस्कृति पर आधारित है। हमारे देश में जो उच्च कोटि के विषय हैं उनका लोप हो चुका है। जितने भी व्यक्ति हैं वे सरल चीज को पाने के लिए आकर्षित होते हैं। क्योंकि वह सहजता से मिल जाती है। प्रभु की भक्ति इतनी कठिन है कि हमें बार-बार प्रार्थना करने पर मिलती है। अगर किसी के पास इस जगत की सारी चीजें हैं और उसे आप कहें कि सुबह, शाम दो घंटे प्रभु का सिमरण करे या भक्ति करे तो उसके लिए यह बड़ा दुर्लभ होगा। उसके पूरे शरीर का रोम-रोम कांपने लगेगा. उसका मन उससे विद्रोह करने लगेगा, उसका तन उससे बगावत करने लगेगा। उसे लगेगा कि जैसे उसकी शक्ति की छिन्न हो गई है। वह कमजोर हो गया है। आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि कोई बूढ़ा आदमी, कोई निर्बल आदमी भक्ति भी नहीं कर सकता। अगर कोई व्यक्ति बचपन में, जवानी में भक्ति की तरफ आकर्षित नहीं हुआ तो बुढ़ापे में भी वह भक्ति नहीं कर सकता। उसने जवानी में जो कार्य किया है बुढ़ापे में भी वही कार्य करेगा। और मृत्यु के समय भी उसके दिमाग में वही धन घूमेगा, स्त्री घमेगी। हमारे देश में ऐसे राजनयिक, नेता हुए हैं जो बड़े-बड़े विद्वान थे, जैसे

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बीज मंत्रों के दिव्य प्रभाव

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, क्या सगुण परमेश्वर की भक्ति से हम सांसारिक भोग या आनंद प्राप्त कर सकते हैं? क्या हमें इससे मोक्ष मिल सकता है? क्या बीजमंत्रों के प्रभाव से भाग्य बदल सकता है? क्या बीजमंत्रों से भगवान का दर्शन होना संभव है? परम पूज्य गुरुदेव : साकार और निराकार ऐसे हैं जैसे बर्फ और जल। बर्फ से जल आता है और जल से बर्फ बनती है। जैसे भगवान नटराज चित्रकार से चित्र अलग होता है लेकिन नटराज से नृत्य अलग नहीं होता। इसी प्रकार हमें निराकार की भक्ति, परमात्मा की भक्ति जो हमें तन से, मन से, धन से सबसे परे ले जाती है, विचारों से परे ले जाती हैं, क्योंकि परमात्मा निर्विकार है, अकाल है, अमूर्त है, भावातीत है, विचारातीत है। कुछ संत महात्मा उसके ध्यान में लगे रहते हैं। अनेक संतों ने हमें निराकार ईश्वर की भक्ति का ज्ञान दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में भी कहा है, ‘मेरे चार प्रकार के भक्त हैं। एक अर्थाथी जो अर्थ के लिए मेरे पास आता है। एक आर्त है, जो दुखी है, कष्टों से घिरा है, वह मेरे पास आता है। एक जिज्ञासु है, वह जिज्ञासा के लिए मेरे पास आता है और एक ज्ञानी है जो निराकार तत्व से मुझे जानता है और वह मेरी भक्ति में लीन रहता है। मुझे ये सभी प्रिय हैं।” भगवान का जो निराकार स्वरूप है उसकी तरफ लाखों-करोड़ों में कोई एक व्यक्ति जाता है। जब तक हम तन से दुःखी हैं, मन से दुःखी हैं, धन को कमी है, कजों से घिरे पड़े हैं। बच्चों के पास खाने के लिए नहीं है, पहनने के लिए वस्त्र नहीं है, मकान नहीं है। जिसकी आंखें भूख से जल रही हैं। उसके लिए परमात्मा का ध्यान करना बहुत कठिन है। जब व्यक्ति सभी सुखों से तृप्त हो जाता है तो उसका ध्यान निराकार परमात्मा की तरफ लगता है। वेदों में एक लाख श्लोक हैं। वे ज्ञान के हैं। भक्ति के हैं। निराकार के हैं। लेकिन जो 95 हजार श्लोक हैं वे संगीत के आयुर्वेद के विद्या के, फिजिक्स, कमेस्ट्री, बायलोजी के, धन के हैं। ऋषि-मुनियों ने भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उपदेश किया है। मोक्ष का मार्ग तब जायेगा जब हम धर्म को जानेंगे, अर्थ हमारे पास होगा, काम होगा, शान्ति होगी, हमारा शरीर निरोग होगा। जिसके घर में धन की कमी है इन बीजमंत्रों के प्रभाव से धन की कमी दूर होगी। भगवान शिव, भगवान नारायण, भगवान गणपति, भगवान ब्रह्मा ने कहा है, ‘जो इन मंत्रों का पाठ करेगा उसके घर में किसी चीज की कमी नहीं रहेगी।’ इस जगत का नियम है कि जैसा भी कर्म करेगा उसका फल अवश्य मिलेगा। जो व्यक्ति किसी को कष्ट देकर व्यभिचार से, हिंसा से, चोरी, बेईमानी, हेराफेरी से धन कमाता है। इस प्रकार का कमाया धन रोग बन जाता हैं उससे अनेक कष्ट आते हैं। ऐसे लोग सरकार व कानून की नजरों से बच सकते हैं। लेकिन परमात्मा से नहीं बच सकते। बीज मंत्रों के पाठ करने से सारे कष्ट दूर होंगे, ऐसा भगवान शिव, भगवान गणपति, भगवान नारायण का वायदा है। और इससे परमात्मा भी मिलेगा, इससे मुक्ति मिलेगी, भुक्ती मिलेगी उससे संसार का सब कुछ मिलेगा। यह भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश का निश्चित वायदा है, उनकी गारण्टी है। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, बहुत से लोगों के मन में यह जिज्ञासा होती है कि बीज मंत्रों के पाठ से जो हमें लाभ मिलता है उसके पीछे क्या रहस्य है? क्या मंत्रों में जो शब्द हैं उनसे हमें लाभ होता है या उन शब्दों से जो तरंगें निकलती हैं उनसे हमें लाभ होता है या यह लाभ उन देवी-देवताओं की कृपा से होता है जिनके ये मंत्र हैं। इस जिज्ञासा का आप निवारण करें। परम पूज्य गुरुदेव : यह अति कल्याणकारी प्रश्न है इसका दो प्रकार का उत्तर है। एक तो वैज्ञानिक है कि किस मंत्रों में क्या-क्या ध्वनि है उसका क्या-क्या प्रभाव है, किस ध्वनि से क्या-क्या कलर निकलते हैं, किस-किस ध्वनि से मृत्यु दी जा सकती है, किस-किस ध्वनि से जीवन दिया जा सकता है, जैसे आपने गंगा को देखा। गंगा कितनी पावन है और आपको यह जानकर हैरानी होगी कि गंगा कोई पावन नहीं है, सिर्फ जल है। भगवान शिव ने कहा है कि गंगा पावन है, तब गंगा पावन है, भगवान नारायण ने कहा है कि ये पावन है, तव पावन है। भगवान ब्रह्मा ने कहा है, पावन है तब पावन है। जो भगवान ने कह दिया वही सत्य है। अगर भगवान ने कह दिया कि ये जल नहीं अमृत है तो ये अमृत है। जिस तरह आप अमृतसर, हरमिंदर साहिब जाते हैं, स्नान करते हैं, वह जल है, जैसे आम जल है। लेकिन सद्गुरुओं ने कहा है कि जो इसमें स्नान करेगा उसके पाप हटेंगे तो जल से पाप नहीं हटते, सद्गुरुओं के वचनों से पाप हटते हैं। सद्गुरुओं ने कह दिया- गुरू ग्रंथ साहिब मानियो प्रगट गुरा के देह,जाका हृदय शुद्ध है सो शब्द में लेह । यह बीज मंत्र जो मैं दे रहा हूं, यह भगवान नारायण के हैं। मैं आपको सरलता से समझा हूं कि भगवान नारायण, भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा ने कहा है कि इन मंत्रों के पाठ से लाभ मिलता है, तब लाभ मिलता है। शब्दों में कुछ नहीं है। अगर मैं आपको कह दूं कि एबीसीडी का जाप करो तो आपके काम हो जाएंगे तो आपके काम हो जाएंगे। लेकिन इसमें एबीसीडी काम नहीं करेगी एबीसीडी तो सारी दुनिया करती है लेकिन किसी का काम नहीं होता। राम-राम सारी दुनिया करती है लेकिन अगर सद्गुरू कह दे कि राम-राम जपो तो कार्य होता है।

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शुद्ध धन की दिव्यता

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, आमतौर पर यह देखने में आता है कि जो व्यक्ति धनी नहीं है, वह अधिक सात्विक रहता है, उसकी भावना अधिक निर्मल होती है। लेकिन जब व्यक्ति धनी हो जाता है तो उसकी प्रवृत्ति बदल जाती है तो वह धन लाभकारी अथवा प्रभु कृपा का अंश कैसे हुआ? परम पूज्य गुरुदेव : भगवान राम कोई कम धनी नहीं थे। राजा जनक, दशरथ तथा हरिश्चन्द्र कोई कम धनी नहीं थे। परंतु इनके मन में अहंकार नहीं था। आज भी ऐसे व्यक्ति हैं जो कम धनी नहीं हैं परंतु उनके अंदर धनी होने का घमंड नहीं है। जिन्हें धन आने के बाद अहंकार होता है उसकी स्थिति धन आने से नहीं होती है। अगर वह गरीब भी होगा, तब भी उसकी स्थिति ऐसी ही होगी। धन तो उस अवस्था को प्रकट करता है। अगर सच्चा मित्र है तो वह गरीबी में भी साथ देता है, अगर पतिव्रता पत्नी है तो वह हर अवस्था में साथ रहती है। जो व्यक्ति धन आने के बाद बदल जाते हैं। मूलतः उनकी स्थिति शुरू से ऐसी ही होती है। जो व्यक्ति मां महालक्ष्मी के मंत्रों का जाप करता रहता है तो ऐसे व्यक्ति के पास हमेशा धन रहता है, ऐसा संतों, ऋषि-मुनियों द्वारा प्रमाणित माना गया है। जिस पर मां लक्ष्मी की कृपा होती है उस पर कोई कष्ट नहीं आते, कोई विघ्न नहीं आते। जिस पर मां सरस्वती की कृपा होती है, वह कलाकार होता है। उसकी वाणी में मां सरस्वती विराजती हैं। ऐसे लोग संगीत के क्षेत्र में उन्नति कर रहे हैं। जिन्हें आज प्रतिष्ठित पदों पर आसीन या साधन संपन्न देख रहे हैं, ऐसे व्यक्तियों ने पूर्व जन्म में अवश्य ही साधन व तप किया है। जो व्यक्ति साधनहीन व निर्धन हैं, प्रभु कृपा से उनके लिए ये मंत्र अत्यन्त लाभकारी हैं। सबसे पहले सद्गुरु को नमस्कार करें क्योंकि सद्गुरु की कृपा के बिना देवी-देवता भी प्रसन्न नहीं होते। सद्गुरु या अपने इष्टदेव का ग्यारह बार ध्यान करें उसके बाद गणपति स्त्रोत, संकट मोचन गणपति श्लोक और गणपति कवच का उच्चारण करें। इन तीनों का उच्चारण ग्यारह बार करके बीज मंत्रों का पाठ करें। चालीस दिन में ही आप यह देखकर हैरान हो जाएंगे कि इन विधियों से आपके सारे कष्ट दूर हो गये हैं। अगर किसी ने किसी गुरु से मंत्र नहीं ले रखा है या कोई गुरु धारण नहीं किया है तो मन से भगवान शिव को अपना गुरु मान लें, क्योंकि भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा सर्व व्यापक और सर्वकालिक हैं। ऐसा कोई भी समय नहीं रहा है जब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, शिव और गणपति आदि देव नहीं थे या नहीं रहेंगे। सदैव रहे हैं, आगे भी रहेंगे। मां सरस्वती, मां लक्ष्मी सबकी हर प्रकार रक्षा करती हैं चाहे वह हिन्दू मुसलमान, ईसाई या किसी धर्म का मानने वाला हो। सभी देवी-देवता हर जाति धर्म के लिए समान रूप से कृपा करते हैं। जैसे सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी किसी जाति या धर्म विशेष के लिए विशेष कृपा (कार्य) नहीं करते बल्कि सबके लिए करते हैं। उसी प्रकार देवी-देवता भी कोई भेदभाव नहीं करते। साधन संपन्न होने पर भी हमें इस उपाय को (पूजा-पाठ को) नहीं छोड़ना चाहिए। जिस तरह हमारे माता-पिता हमें पैदा करते हैं। वह सतगुरु जो हमें प्रेरणा देता है तो हम ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी सत्गुरु या माता-पिता को नहीं भूलते, उसी प्रकार ये देवी-देवता हैं जब ये हमें संतुष्ट करते हैं तो इन्हें भूल नहीं जाना चाहिए अर्थात पूजा-अर्चना करते रहना चाहिए। वास्तव में कुछ लोग ऐसे होते हैं कि जब वे साधन संपन्न हो जाते हैं तो सोचते हैं कि यह सब मैंने अपने बाहुबल से किया है, अपनी विद्या से किया है लेकिन उसमें उनके माता-पिता का तप-त्याग शामिल है। इसलिए इसमें जो माता-पिता का त्याग है, गुरु की कृपा है, देवी-देवताओं का आशीर्वाद है उन्हें कभी नहीं भूलना चाहिए। ऐसा करने वाले को जीवन में कभी कष्ट नहीं होता तथा सभी देवताओं की कृपा बनी रहती है।

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