Jagadguru MahaBrahmrishi Shree Kumar Swami ji

Q&A with Gurudevji

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समय और औषधि

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, रोग के लिए समय तथा औषधि का क्या संबंध है? आपने एक बार उल्लेख किया था कि अमुक औषधि तोड़ने के लिए अमुक समय जरूरी है। इसके पीछे क्या रहस्य है? परम् पूज्य गुरुदेव : अगर किसी व्यक्ति का जन्म का दिन, दिशा, समय तथा स्थान का पता लग जाये तो उसी से उस व्यक्ति का सारा व्यक्तित्व पता लग जायेगा कि उस व्यक्ति का काम होगा अथवा नहीं होगा। आप किस समय में किस दिशा में जा रहे हैं, उससे पता लग जायेगा कि आपको सफलता। मिलेगी कि नहीं मिलेगी। इसी तरह औषधि के भी तोड़ने का समय होता है। अगर आपने गलत समय में औषधि तोड़ ली है तो वह आपको हानि कर जायेगी। जैसे ज्योतिष शास्त्र के आधार पर जन्म समय से ही उस बच्चे का भविष्य जाना जाता है। जैसे कोई अपने माँ के पेट से निकलता है तो उसका जन्म माना जाता है। ठीक उसी तरह जब वृक्ष से पत्ते टूटते हैं तो वह उसका जन्म माना जाता है।। वह मानव के शरीर में आकर नया जन्म ग्रहण करता है। औषधि को किस समय में तोड़ना चाहिए, किस भाव दशा में तोड़ना चाहिए, किस अवस्था में तोड़ना चाहिए, यह सारा उसी तरह से है जैसे हमारा चलना, हमारा जाना, हमारा घर से निकलना, किसी नये कार्य को करना है या शुभ मुहूर्त में कार्य करना है। इसके जैसे नियम हैं ठीक उसी प्रकार औषधि तोड़ने के भी नियम हैं। अगर आप कोई गलत समय में मुहूर्त करेंगे तो वह असफल हो जायेगा तथा जो असंभव कार्य हैं, अगर उसे सही समय पर करेंगे तो वह सहज हो जायेगा। यह चिकित्सक को भी देखना चाहिए कि वह किस मुहूर्त में रोगी को दवाई दे रहा है। उस मुहूर्त का क्या उपयोग है तथा उसमें किस दवाई का सेवन करना चाहिए। यह हजारों में किसी एक आयुर्वेद के चिकित्सक को मालूम है कि जनवरी के महीने में चन्द्रप्रभा बूटी तथा महाराज गुग्गल रोगी को नहीं दी जाती है। इस दोनों औषधि को अगर कोई चिकित्सक किसी रोगी को जनवरी माह में देगा तो वह औषधि काम नहीं करेगी। इसी तरह गुलदावरी बूटी है, मैनमिष है, चाईना अष्टर है। इसे अगर कोई चिकित्सक रोगी को मार्च महीने में सेवन करने देता है तो वह औषधि, काम नहीं करेगी। इसी प्रकार नीम, बकायन, बेरीगेटाकेना, सालमपंजा, कोंच के बीच, लाजवंती के बीज हैं, इस सभी का फरवरी माह में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। तुलसी के पत्ते को रविवार के दिन इस्तेमाल नहीं करना चाहिए तथा पूर्णमासी या अमावस्या के दिन इसको तोड़ना नहीं चाहिए। जब स्त्री माहवारी के दिनों में रहे तो इसके पत्ते को नहीं तोड़ें। इस प्रकार एक-एक वृक्ष का बहुत महत्व है। जो तत्ववेत्ता संत हैं, औषधि को जानने वाले हैं, वे नियम के अनुसार रोगी पर इन जड़ी-बूटियों का प्रयोग करते हैं।

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काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार पर नियंत्रण के अद्भुत

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, इस जगत में चाहे साधारण व्यक्ति हो या कोई संत, सभी के सामने यही स्थिति है कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार पर नियंत्रण कैसे पाया जाए ? परम पूज्य गुरुदेव : यह प्रश्न जन कल्याण के लिए अति उत्तम है। इस जगत में जितने भी युद्ध हो रहे हैं, झगड़े हो रहे हैं, माता-पिता के, भाई-बहनों के, दोस्तों के, पति-पत्नी के देशों के, उनका मूल यह पांचों तत्वों का वास्तविक अर्थ न जानना है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार इन तत्वों को खराब कहना या इन तत्वों को अच्छा कहना, इसी से सारे विवाद हैं। इसी से आज सारे जगत में युद्ध हो रहे हैं। अगर कोई व्यक्ति इन तत्वों को जान ले, जैसे कोई चिकित्सक है वह रोग के मूल कारण को जानता है। क्योंकि कारण जानने के लिए उन्हें कितने-कितने टैस्ट कराने पड़ते हैं। लाखों रुपया खर्च करना पड़ता है। लेकिन औषधि तो मात्र कुछ रुपयों की होती है। उसी तरह से मूल है इन्हें जांच करना कि काम है क्या, क्रोध है क्या, इसकी उत्पत्ति कहां से हुई ?फिर इसे नियंत्रण कैसे किया जाए, इसे उपयोग में कैसे लाया जाएगा? अगर कोई इस स्थिति को जान लें तो वह सारे रोगों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। क्योंकि आज जगत में जितने भी रोग हैं सब पेट की खराबी से होते हैं, लीवर की गड़बड़ी से हो रहे हैं। जैसे किसी व्यक्ति को क्रोध आता है तो वह यह नहीं देखेगा कि वह क्या बोल रहा है या किससे बोल रहा है या ऐसा बोलने से दूसरे पर क्या प्रभाव पड़ेगा, वह पूरा क्रोध करेगा। उसके बाद जब आदमी क्रोध करके पछतायेगा तो वह व्यक्ति कभी भी क्रोध से पार नहीं हो सकता, वह थोड़े समय बाद फिर क्रोध करेगा। जो भी व्यक्ति माफी मांगेगा जगत की नजर में, कानून की नजर में, व्यावहारिकता की नजर में उसे अच्छा कहा जाएगा। उस पर दया की जायेगी और उसे अच्छा माना जायेगा। लेकिन जैसे उसको माफ कर दिया जायेगा वह थोड़े समय के बाद देखेगा कि व्यक्ति खुद कहेगा कि मैंने क्रोध किया था या काम किया था। जैसे कोई व्यक्ति अगर बलात्कार करता है तो उसे जब पता लगता है कि यह मैंने गलत काम किया तो वह पछताता है। उसे माफ भी कर दिया जाता है। लेकिन थोड़े समय बाद वह आदमी देखता है कि मेरे पास इसका कोई नियंत्रण नहीं हो रहा मैं अपने आपको कंट्रोल कर रहा हूं लेकिन मेरे पास इसका कोई उपाय नहीं है। थोड़े समय के बाद वह फिर उसी प्रक्रिया से गुजरता है तो वह आदमी पछताता है। इसी पछतावे में और करने में उसका जीवन बीत जाता है। वह रोगों से ग्रस्त हो जाता है और कोई आदमी आत्महत्या कर लेता है, कोई रोगों से ग्रस्त हो जाता है। जब कोई व्यक्ति इन तत्वों को जान लेता है तो है नब्बे प्रतिशत जो रोग हैं वे स्वयं समाप्त हो जाते हैं। इनके मूल कारणों को न जानना और इनके उपाय को न जानना सारे रोगों का जन्मदाता है। क्रोध शक्ति का प्रतीक है। क्रोध का अर्थ है इस व्यक्ति में शक्ति है। अगर व्यक्ति शक्तिहीन होगा या बीमार होगा तो उसे कभी क्रोध नहीं आएगा। सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि क्रोध, लोभ, अहंकार कोई खराब चीज़ नहीं है। इसका उपयोग करना हमें नहीं आ रहा। इसके उपयोग करने के उपाय क्या हैं, यह मैं आपको बताऊंगा। जो व्यक्ति इसका प्रयोग जान लेगा वह क्रोध को खराब नहीं कहेगा। एक तो जब भी किसी व्यक्ति को क्रोध आये, वह सबसे पहले हृदय में यह मान ले कि प्रभु ने मुझे प्रसाद दिया है। यह मेरे पास क्रोध आया है मैं इसका उपयोग करूंगा, क्योंकि यह देखा गया है कि जैसे ही क्रोध आता है तो वह व्यक्ति को पूरी गुलामी में ले लेता है। उसको अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है। उसमें व्यक्ति का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। सिर्फ क्रोध का अस्तित्व रह जाता है। व्यक्ति अपने आप को भूल जाता है। उसकी चेतना लुप्त हो जाती है, उसकी सहनशक्ति का लोप हो जाता है और क्रोध अपनी मर्जी से व्यक्ति को चलाता है। सबसे पहले व्यक्ति को यह सोचना चाहिए कि मैं क्रोध के नियंत्रण में नहीं रहूंगा। अब मैं इस पर नियंत्रण करूंगा, अब मैं इसको अपने पास बांध लूंगा और इसका मैं उपयोग करूंगा। इसका एक मंत्र है। जब भी क्रोध आता है तो वह सांस की प्रक्रिया के द्वारा आता है। जब भी किसी व्यक्ति को क्रोध आए तो वह एक मिनट के लिए अपनी सांस को बंद कर ले और नाभि से मात्र ‘ह्रीं’ मंत्र का उच्चारण करें। इस तरह का मां जगदम्बा का मंत्र है। अगर श्वास उससे बंद नहीं होता तो वह धीरे-धीरे नाभि के अंदर से ह्रीं मंत्र का उच्चारण करे तथा श्वांस धीरे-धीरे ले। जब व्यक्ति मंत्र का प्रयोग करेगा और साक्षात जो दिव्य शक्तियां हैं वह उसकी नाभि में उसके हृदय में प्रवेश कर जाएंगी और वह शक्ति फिर उसे बोध कराएगी कि उस क्रोध ने उसको कितना सुन्दर बना दिया है। अगर क्रोधी व्यक्ति का टैस्ट करवाया जायेगा तो उसका उत्तर वही आएगा जो एक पागल व्यक्ति का होता है। जब किसी व्यक्ति को काम वासना आती है तो वह अपने आपको भूल जाता है क्योंकि कामुक व्यक्ति सदा कमजोर होता है तथा शांत व्यक्ति अधिक शक्तिशाली होता है तथा उसमें काम शक्ति भी अधिक होती है। क्रोधी व्यक्ति में काम शक्ति की कमी होती है उसके शरीर में नाना प्रकार के रोग होते हैं। जब भी किसी व्यक्ति में काम या क्रोध का आवेग आये तो सबसे पहले जाने कि यह काम है, यह प्रभु का प्रसाद है क्योंकि काम से हमारी उत्पत्ति हुई है। काम से जगत की उत्पत्ति हुई है, काम परमात्मा की तरफ ले जाता है। हमारे जो माता-पिता हैं वे भी काम से पैदा हुए, हम भी काम से पैदा हुए। जब भी कामवासना आए व्यक्ति को ‘क्लीं‘ शब्द का प्रयोग करना चाहिए। पहले एक बार ‘ॐ‘ शब्द का प्रयोग करे, उसके बाद ‘क्लीं क्लीं’ बोलता जाए। जब व्यक्ति बार-बार ‘ॐ’ का प्रयोग करेगा तो उसकी लयबद्धता टूट जाएगी और धन की कमी

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प्रभु का अद्भुत न्याय

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, आमतौर पर जनसाधारण की यह मान्यता है और एक स्वाभाविक संशय भी है कि जो व्यक्ति धार्मिक है, धर्मपरायण है अथवा जिस व्यक्ति की ईश्वर में आस्था अधिक होती है, वह ही आमतौर पर अधिक पीड़ित होता है, व्यथित होता है, दुःखी होता है एवं भौतिक तथा सामाजिक दृष्टि से अभावग्रस्त भी होता ऐसा क्यों? परम पूज्य गुरुदेव : ऐसा नहीं हैं यह केवल भ्रम है। आप यह कैसे कह सकते हैं कि इस जन्म में जो पुण्य वह कर रहा है, उसका सुफल उसे आगे आने वाले जीवन या जन्मों में क्या मिलेगा या कब मिलेगा? और अभी हाल में जो वह भुगत रहा है, क्या पता इस कर्मफल का किस जन्म जन्मांतर से संबंध जुड़ा हुआ है, जिसे इसी जन्म में भोगना निश्चित है। मानव जीवन में तीन प्रकार के कमी का समावेश रहता है-क्रियामान, प्रारब्ध एवं संचित । अब संचित कर्मों का जिस प्रकार उपयोग हो रहा होगा, उस समय उस प्रकार की ग्रह दशा होगी, उस प्रकार का वातावरण मिलेगा, उस प्रकार की हम संगति करेंगे अथवा तदनुरूप व्यसनों में हम फंस जाएंगे। उस-उस प्रकार के रोगों से पीड़ित हो जाएंगे। यह निश्चित है। लेकिन पाप पूर्व जन्म का है या अनेकों जन्म जन्मान्तरों का, यह नहीं मालूम कि किस जन्म का है?यह शास्त्र सम्मत बात है एवं इसमें सत्य का समावेश है। जब आप यह कहते हैं कि फलां आदमी भगवान का नाम भी ले रहा है और उस पर घोर संकट, दुःख, आपत्तियां भी आ रही हैं और आपको यह विरोधाभास भी दिखाई देता है, पर कभी आपने इस दृष्टिकोण से भी सोचकर देखा है कि अगर वह प्रभु का नाम भी न लेता तो और भी भयानक संकटों का शिकार हो जाता, चल भी न पाता। किसी अस्पताल में पड़ा होता अर्थात उसकी ऐसी दु:स्थिति होती जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। सच यही है कि प्रभु का नाम ही उसे उन भयानक संकटों से बचाए हुए है। मान लो अपने दुष्कर्मों के कारण उसे सूली पर चढ़ाया जाना नियत है या फांसी लगना विधि द्वारा निर्धारित है। लेकिन प्रभु नाम कवच से मात्र सुई चुभने के दर्द या कांटा लगने से ही उसका छुटकारा हो जाए। ऐसे में सूली की जगह ‘शूल’ ले लेता है यानी कर्मों का दुष्परिणाम प्रतीकात्मक होकर रह जाता है। मामूली दर्द के रूप में कर्मफल सूक्ष्म हो जाता है। एक और उदाहरण से समझें कि आपको बेहद सर्दी लग रही है और आपने कम्बल ओढ़ रखा है और कम्बल लेने के बाद भी आपको ठण्ड लग रही है तो जरा कल्पना करो, अगर आपने कम्बल भी न लिया हो तो आपका क्या होता? आप विदेशों को ले लीजिये। यूरोप को ले लीजिए। भौतिकता में डूबे हुए विदेशी प्रभु का नाम नहीं लेते, नास्तिक प्रवृत्ति के है लेकिन वह ऐश्वर्य भी भोग रहे हैं, यह आपको आभास हो सकता है। लेकिन कभी उनके भीतर उनके अन्तर में झांको क्योंकि हम तो पूरे विश्व में भ्रमण करते हैं। लोगों का देखते हैं, समझते हैं। मंत्रीगण, राजनीतिज्ञ, उद्योगपति ये सभी व्यथित हैं, छिन्न-भिन्न हैं। अपितु जो निर्धन हैं, अभावग्रस्त हैं वे संतुष्ट हैं। आप भौतिक आँखों से देखते हैं तो आप भौतिक कष्ट ही देखते हैं, लेकिन आंतरिक अवस्था अलग है। प्रभु का जो सिमरण है वह भीतरी कष्टों का भी निवारण करता है। अपने-अपने इष्टदेव का सिमरण अपने विश्वास के अनुसार करने से आपका अन्तःकरण धवल, शुद्ध हो जाता है। वासना का अन्त दुःख ही है। कोई भी भोग भोगते हुए आपको अच्छा लगेगा लेकिन उसका अन्त, उसकी परिणति हमेशा दुःखमयी ही होगी, यह अटल ध्रुवसत्य है। प्रभु का नाम प्रारंभिक अवस्था में हमें कष्टकर, असुविधाकर लग सकता है लेकिन अन्त कल्याणकारी होगा। समस्त रोगों का नाश करने वाला होगा। प्रभु सिमरण करने वाला सभी तापों से मुक्त हो जाता है। तन, मन, धन व आत्मा से परिपूर्ण हो जाता है। उसे कोई अभाव नहीं रहता। उसका लोक-परलोक दोनों संवर जाते हैं।

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दीपक जलाने से रोगों से मुक्ति

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, आपने कई बार उल्लेख किया है कि दीपक जलाने से रोगों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। आखिर यह कैसे संभव है? परम पूज्य गुरुदेव : देखिये प्रकाश का काम अंधेरे को भगाना होता है तो नकारात्मक शक्तियों को हम अंधेरे का प्रतीक मान सकते हैं। दीपक जलाने से नकारात्मक शक्तियों का ह्रास होता है। आप जानकर हैरान होंगे कि हमारे आसपास जो भी घटित हो रहा है वह यूं ही नहीं हो रहा। हर घटना में सत्यता एवं वास्तविकता है। आजकल जो दुर्घटनाएं हो रही हैं, लोगों में विवाद हो रहे हैं, क्रोध का प्रकटीकरण हो रहा है। आपसी मन-मुटाव, बात-बात में पति-पत्नी में वाद-विवाद एवं राजनीतिक झगड़े जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उत्पन्न हो रहे हैं। अचानक कोई असाध्य रोग पैदा हो जाता है। या किसी का एकदम एक्सीडेंट हो जाता है। इन सबकी पृष्ठभूमि में जो उत्तरदायी है वह नकारात्मक ऊर्जाएं ही हैं और यह सब आधुनिक विज्ञान को स्वीकार्य नहीं है। यह सब आधुनिक विज्ञान की पहुंच से बाहर है। बाह्य तौर पर हमें सब कुछ अचानक घटित हुआ लगता है लेकिन जो सूक्ष्म जगत के जानकार हैं उनके लिए अचानक कुछ भी नहीं होता। उन्हें पता होता है कि ऐसी घटनाएं पूर्व निश्चित हैं। भगवान श्री बाल्मीकि ने वर्षों पहले ही रामायण की घटनाओं का अक्षरशः उल्लेख कर दिया था। सूरज चाँद की गति भी सृष्टि के कुछ नियमों के अधीन है तो क्षुद्र मानव शरीर का भी संचालन कहीं न कहीं से होता है। मानव को जब क्रोध आता है तो वह स्वयं कम अपितु उसकी ग्रहस्थिति अधिक जिम्मेवार होती है। उस स्थिति में उसके भीतर नकारात्मक शक्तियों का बलात प्रवेश हो जाता है। पर उस ग्रह स्थिति निर्माण के भी स्पष्ट कारण होते हैं। भगवान श्री गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में स्पष्ट लिखा है- सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलख कहेउ मुनिनाथ । हानि-लाभ जीवन मरण, यश-अपयश विधि हाथ ।। तो यह सब विधाता के हाथ में, परमात्मा के नियमों के अधीन होता है। यानि ये घटनाएं पूर्व निर्धारित होती हैं लेकिन आधुनिक विज्ञान इन्हें ऐक्सीडेंट या दुर्घटना का रूप दे देता है। लेकिन सकारात्मक शक्तियों के सान्निध्य में रहने वाले मानव इन अनहोनियों से बच सकते हैं क्योंकि होनी तो निश्चित है वह टल नहीं सकती। हाँ अनहोनी को अवश्य टाला जा सकता है। तो दीपक जलाने से (विशेषकर संध्या के वक्त घर में सुख-शांति का विचरण होता है दीपक की लौ दिव्य शक्तियों को आमंत्रित करती है। उस वक्त अगर प्रभु नाम का सिमरण भी किया जाए या गुरु द्वारा प्रदत्त किसी विशेष मंत्र का जाप किया जाए तो सोने पर सुहागा हो सकता है। सारी राक्षसी तामसिक शक्तियां भस्मीभूत हो जाती हैं। और दीपक जलाने की प्रथा तो हर धर्म, वर्ग व कबीलों में ही रही है मुसलमान भाई चिराग रोशन करते हैं, ईसाई बन्धु कंडल जलाकर मरियम का आवाहन करते हैं। जैन, बुद्ध धर्मो में सांकेतिक तौर पर दीपक की रोशनी प्रकट की जाती है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखें तो यह सारा जगत प्रकाश एवं ध्वनि की तरंगों से निर्मित है, स्पन्दनयुक्त है। तो दीप प्रकाश एवं मन्त्रोच्चारण से हम आपदाओं को दूर रख सकते हैं। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, आपने बहुत अद्भुत बातें बताई हैं लेकिन जिज्ञासावश इसी से जुड़ा एक और प्रश्न पूछना चाहूंगा। श्रद्धावान लोगों के लिए तो यह क्रिया परम लाभदायक होनी ही चाहिए लेकिन जो लोग आस्थावान नहीं हैं, आस्तिक नहीं हैं उनके लिए दीपक जलाने का क्या महत्व रहेगा ? परम पूज्य गुरुदेव : पहली बात तो यह कि दीपक जलाना किसी आस्था या विश्वास का विषय नहीं है। एक बाह्य प्रक्रिया है और ज्ञानियों के लिए अद्भुत ज्योति का प्रतीकात्मक चिन्ह । जैसे आप चीनी खाते हैं तो यह कोई आस्था या विश्वास से जुड़ी जबरदस्ती की वस्तु नहीं है, अपितु आवश्यकता की सामग्री है क्योंकि चीनी खाने से आपको कार्बोहाइड्रेट, शर्करा के रूप में शक्ति, ऊर्जा या कैलोरी मिलेगी। इसी प्रकार चीनी न खाना या छोड़ना भी कोई आस्था नहीं है । छोड़ेगा वही जिसे शुगर का रोग होगा, डायबिटीज होगी। तो दीपक जलाना वह छोड़ेगा जिसे नास्तिकता का रोग होगा। दीपक जलाना तो औषधि का स्वरूप है और यह चिकित्सा के अंतर्गत आता हैं। कीटाणु या विषाणु कितना सूक्ष्म है फिर भी भयंकर रोगों से हमें आक्रान्त कर सकता है। परमाणु बम भयंकर तबाही मचा सकता है। लेकिन प्रकाश किरणों का रूपान्तरण करके कितने सृजनात्मक काम किये जा सकते हैं। बाहरी और भीतरी परिवर्तन किये जा सकते हैं। आपने सुना होगा, ऐसी रिसर्च हुई है कि गोबर से पुते घरों में परमाणु बम की विकिरणों का दुष्प्रभाव खत्म हो जाता है और हमारी सनातन पद्धति में गोबर लीपकर वेदी बना, रंगोली सजाकर दीपक जलाने का विधान है। तो सब कुछ वैज्ञानिक है। पूर्ण सत्य क्योंकि सत्य कभी अपूर्ण या अर्द्धसत्य हो ही नहीं सकता। सत्य तथ्य का दूसरा नाम है। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, प्रकाश पुंज या औरा किसे कहते हैं?परम पूज्य गुरुदेव : दैवीय पुरुषों में सिर के आसपास एक वृत्ताकार आभा मण्डल मौजूद रहता है जिसे केवल ज्ञान नेत्रों से देखा जा सकता है। तत्त्ववेत्ता संत ब्रह्मज्ञानी इसका अवलोकन कर सकते हैं। इसको दिव्य चक्षुओं से देख सकते हैं। रूस में एक वैज्ञानिक हुए हैं। उन्होंने क्रिलियान नामक कैमरे का आविष्कार किया जो इस आभामण्डल का फोटोग्राफ भी ले सकता है। जिससे पता चलता है कि किसी आदमी में ऊर्जा का स्तर कितना है। लेकिन वेदाचार्य को किसी कैमरे की आवश्यकता नहीं होती। वे अपने तप के प्रभाव से ही इंसानों के आभामंडल या ऊर्जाचक्र को देख लेते हैं। सूर्य की रोशनी को प्रिज्म से निकाला जाए तो वह सात रंगों में बंट जाती है यानि बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी एवं लाल इन्हीं सात रंगों के अनुसार विभिन्न व्यक्तियों के ऊर्जा स्तर भी सात प्रकार के होते हैं। यह एक प्रकार की स्केनिंग है। साईंस के विद्यार्थियों ने न्यूटन्स डिस्क का नाम सुना होगा।इसमें एक चक्र पर सातों रंग बना दिये जाते हैं और इसे चक्र की तरह घुमाया जाता है तो केवल सफेद रंग का आभास होता है। ऐसे सूर्य की किरणों बादलों में छिपी पानी की बूंदों में परिवर्तित होकर इन्द्रधनुष का रंग ले

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स्त्रियों के लिए उत्तम ध्यान विधि

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, ध्यान के अनेकों रूप माने जाते हैं जिसका उल्लेख हमारे शास्त्रों एवं ग्रन्थों में किया गया है। कृपया आप बताएं कि स्त्रियों के लिये कौन ही ध्यान क्रिया उचित होती है जिससे वे शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक दृष्टि से स्वस्थ हो जाएं? परम पूज्य गुरुदेव : आपने बहुत अच्छा एवं उपयुक्त प्रश्न किया है। पूरे विश्व में ध्यान की अनेकों विधियां प्रचलित हैं। वास्तविकता यह है कि स्त्री के लिए कभी ध्यान मार्ग सहज नहीं होता। पुरुषों के लिए भक्ति व समर्पण अति दुष्कर है, कठिन है। स्त्रियों के लिए समर्पण ही परम लाभकारी व आशातीत कल्याणकारी है। भक्ति व समर्पण हृदय प्रधान है। स्त्रियां प्रकृति की तरफ से ही कोमल हृदय की होती हैं। समर्पण उनमें सहज होता है। भक्ति रस तो मीरा के समर्पण से फूट निकला, तो स्त्रियां मात्र समर्पण से ही ध्यान का लाभ प्राप्त कर सकती हैं। लेकिन प्राणायाम जैसी श्वासों को नियंत्रण करने की विधियों को वे अधिक देर तक नहीं कर पाएंगी।आप यह जानकर आश्चर्यचकित होंगे कि ध्यान की जितनी भी विधियां भगवान शिव ने शिवसूत्र व तन्त्रसूत्र में उल्लेखित की हैं उनमें प्रेम व समर्पण ही सर्वश्रेष्ठ है। क्योंकि श्वास नियमन से स्त्रियों में संवेदना आ जाएगी व क्षणिक आराम मिलेगा। लेकिन जैसे ही वे संसार में लौटेंगी, कार्यक्षेत्र, गृहस्थी में, मार्केट में जाएंगी तो उनकी बाहरी शारीरिक शक्तियां पुनः जागृत हो जाएंगी। अधिक ध्यान करने से उनका मन करेगा कि वे कमरे के अंदर बैठी रहें, दिव्य आनन्द, आत्मिक अनुभूति में डूबी रहें लेकिन शारीरिक संवेदनशीलता के कारण उनकी शारीरिक क्षमता कम हो जाती है। बाह्य शक्तियां सूक्ष्मरूप में उनमें प्रविष्ट हो जाती हैं। ध्यान छोड़ने के बाद वे नाना प्रकार की शारीरिक व्याधियों से घिर जाएंगी। सांसारिक माहौल में लौटने से उनकी संवेदनशीलता ज्यादा उग्र रूप धारण कर लेगी। उनकी मानसिक उद्विग्नता भी बढ़ेगी। ध्यान से पहले स्त्री को मंत्र- कवच से सुरक्षित हो जाना चाहिए क्योंकि कवच की शक्ति सर्वाधिक होती है। दूसरे हर स्त्री को पित्त, कफ की प्रवृत्ति व प्रकृति के अनुसार ही ध्यान प्रक्रिया का चुनाव करना चाहिए। जैसे प्राणायाम या विपश्यना जैसी पद्धतियों को अपनाने में कुछ न कुछ असुविधा वे अवश्य महसूस करेंगी। लेकिन किसी गुप्त कवच का प्रयोग करने से मानसिक तनाव नहीं होगा। समर्पण ही अति उत्तम है एवं भक्ति मार्ग ध्यान से ज्यादा श्रेयस्कर है। सबसे उत्तम स्थिति पति को परमेश्वर मानकर उसके प्रति समर्पित होना है। विदेशों की संस्कृति में समर्पण का अभाव है। वे समानाधिकारी की भावना से ग्रस्त हैं। तभी उन्हें नाना प्रकार के रोग लगते हैं। जो भारतीय स्त्रियां अपनी समृद्ध संस्कृति को विस्मृत कर पाश्चात्य भौतिकतावादी संस्कृति की राह पर चल निकली हैं, जो स्त्री अधिकार व बदले की भावना से ग्रस्त हैं, उन्हें भी ऐसी ही बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। समर्पण भाव से युक्त स्त्रियां चिर युवा रहती हैं। चेहरे की चमक बरकरार रखते हुए वे झुर्रियों वगैरह से दूर रहती हैं। जीवन भर व्याधियों से मुक्त रहती हैं। मानसिक अवसाद से भी वे मुक्त रहती हैं।

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पति-पत्नी के मधुर संबंधों का दैवीय उपाय

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, आजकल बहुत से रोग पति-पत्नी के बीच आपसी तनाव और इससे उपजे मानसिक दबाव के कारण हो रहे हैं आप कृपया शास्त्रों का कोई ऐसा रहस्य बताएं जो पति-पत्नी के बीच मधुर संबंध बनाने में अहम भूमिका निभाए। परम पूज्य गुरुदेव : यह सम्पूर्ण विश्व का कल्याण करने वाला प्रश्न है। आज जिस तरह रोगों में जैसे शुगर, दमा, अर्थराइटिस आदि ने महामारी की तरह घेर रखा है, उनके मूल कारण में पति-पत्नी के तनाव का भी योगदान है। आज के जो शिक्षित वर्ग हैं वे अपने अधिकारों के लिए, बल के लिए, बुद्धि के लिए जितने झगड़े कर रहे हैं, उससे तनाव बढ़ता ही जाता है। क्योंकि उनकी शिक्षा उन्हें पतन की ओर ले जा रही है। कुछ लोग शिक्षा का सदुपयोग भी कर रहे हैं और अपना जीवन सुखी बना रहे हैं। अधिकतर देखने में आता है कि पति-पत्नी में जो प्रेम होना चाहिए, नहीं है। हमारे पुराने बुजुर्ग जिनकी उम्र 70-80 साल हो गई, 100 साल हो गई उन्होंने तलाक के बारे में कभी कल्पना तक नहीं की, सोचा ही नहीं कि तलाक नाम की भी कोई चीज होती है। वृद्ध स्त्रियां कभी यह नहीं सोचती कि पति बेकार है, काम भी नहीं कर रहा है या अपाहिज है। वे कहती हैं ‘प्रभु कृपा करो मैं सात जन्म तक या हर जन्म में इस पति के साथ ही रहूं।’ यह कितनी आध्यात्मिक और दैवीय बात है। विदेशों में 90 प्रतिशत ऐसा नहीं है। वहां अगर कोई स्त्री देखती है कि यह पुरुष मेरे काम का नहीं है या मेरी बात नहीं मानता या पुरुष कहता है कि मेरी पत्नी मेरी आज्ञा नहीं मानती तो वहां तलाक हो जाता है। वहां स्त्री-पुरुषों को पता भी नहीं होता कि उनकी कितनी बार शादी हो चुकी है। लेकिन यहां भारतीय सभ्यता है। यहां की स्त्री ऐसा सोच भी नहीं सकती। इसके पीछे उनके माता-पिता का प्रभाव है, दैवीय गुण है, उनकी शिक्षा है, हमारे ऋषि-मुनियों की शिक्षा का प्रभाव है। प्रभु कृपा से मैं एक मंत्र बता रहा हूं। अगर कोई पति-पत्नी इस मंत्र का प्रयोग करेगा तो उसके आपसी झगड़े शांत हो जाएंगे। अगर कोई पति-पत्नी पूजा पाठ नहीं कर रहा और सुखी है तो इसका मतलब है कि उसने पिछले जन्म में अवश्य ही तप किए हैं तभी इस जन्म में उन्हें अच्छी पत्नी या पति मिला। अगर पति-पत्नी बच्चों को कुछ नहीं दे सकते तो कम से कम उनके सामने झगड़ा तो न करें क्योंकि ऐसा करने से बच्चों के ऊपर भी इसका असर पड़ता है और वे भी उसी तरह का आचरण करते हैं। ऐसे लोग कभी सुख-समृद्धि के साथ जीवन व्यतीत नहीं कर सकते। यह हमारे ऋषि-मुनियों तथा वैज्ञानिकों के द्वारा सिद्ध हो चुका है और अनेकों इस तरह के उदाहरण हैं। प्रयोग के तौर पर यह मंत्र मैं जन कल्याण के लिए बता रहा हूं जिसके प्रयोग से उन्हें अवश्य लाभ मिलेगा। ॐ गं ह्रीं दुं दुर्गति नाशिन्यै महामायै स्वाहा । एवं मंत्र : पत्नी मनोरमा देहि मनोवृत्तानुसारिणी तारिणी संसारसागरस्य …कुलोद्भवाम् । इस मंत्र का उपयोग जो शतचण्डी पाठ के साथ करेगा उसे निश्चित लाभ होगा। इससे पहले भगवान गणपति की आराधना करें क्योंकि कोई भी पूजा करने से पहले भगवान गणपति की आराधना करना आवश्यक होता है, इससे पति-पत्नी में किसी भी प्रकार का तनाव समाप्त हो जायेगा।

Q&A with Gurudevji, Ramayan

श्रीराम और माँ सीता के विरह का गोपनीय रहस्य

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, श्रीराम और माँ सीता के विरह का रहस्य क्या है ? परम पूज्य गुरुदेव : रामायण की यथार्थता के बारे में यह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। इस प्रश्न को समझने के लिए काफी शांत मन और निष्काम भावना की आवश्यकता है, तभी इसे समझा जा सकता है। एक छोटी सी कथा, जो ऋषियों व संतों द्वारा जानी गई है उसके माध्यम से इसे समझा पाएंगे। जब भगवान श्रीराम रावण का वध करके 14 वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या लौटे तब सभी ने कैकेई को कहा कि तूने ऐसा क्या कार्य किया कि इतने सर्वप्रिय जनमानस, करुणा के सागर और कल्याणकारी श्रीराम को 14 वर्ष के लिए वनवास भेज दिया। आपके हृदय में पीड़ा नहीं हुई? कैकेई ने कहा, ‘राम से मेरा अनन्य प्रेम है, मैं राम को उतना ही प्रेम करती हूं जितना भरत को पर मन्थरा ने उस समय मेरे मन में क्या डाल दिया कि मेरी बुद्धि भ्रमित हो गई और मैंने न जाने किस कारणवश मन्थरा के कहने पर ऐसा आचरण किया। ऐसा चरित्र किया जिससे मुझे पति का विछोह भी सहना पड़ा और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को वनवास भेजना पड़ा।’ तब मन्थरा को बुला कर पूछा गया कि आपने ऐसा क्यों किया ?तो मन्थरा दासी ने कहा, ‘वास्तव में मेरा हृदय राम के प्रति अपार स्नेह से भरा हुआ है। मैं जिन ऋषियों के आश्रम में जाती थी उन ऋषियों ने मुझे ऐसी प्रेरणा दी कि तुम ऐसा कैकेई से बोलो।‘ जब ऋषि-मुनियों को बुलाया गया तो उन्होंने कहा, ‘हम जिन देवी-देवताओं की आराधना करते हैं, प्रार्थना करते हैं, उनको साक्षात देखते हैं उन देवी-देवताओं ने हमें यह कहा, आदेश दिया था कि तुम ऐसी प्रेरणा, सन्देश मन्थरा के हृदय को दो।’ और जब देवी-देवताओं को आराधना करके बुलाया गया और उनसे कारण पूछा गया कि आपने ऐसा क्यों किया? तो उन्होंने कहा, ‘हमें भगवान श्रीराम ने स्वयं ऐसा करने को कहा था।’ भगवान श्रीराम या श्रीकृष्ण पर इस जगत का कोई भी नियम लागू नहीं होता और भगवान वशिष्ठ को भी इस बात का ज्ञान था। भगवान श्रीराम ने जगत को दिखाया कि हम किस तरह पत्नी के साथ और पत्नी के बिछोह में भी समभाव से रह सकते हैं। भगवान श्रीराम का आगमन जन कल्याण, मर्यादा के लिए था कि कैसे भाई-भाई को रहना चाहिए, कैसे पिता-पुत्र को रहना चाहिए, कैसे भक्त और भगवान को रहना चाहिए। जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है- यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत! …… जब धर्म का नाश होने लगता है, अधर्म का बोलबाला हो जाता है और जगत में दिव्य शक्तियों को लोग नहीं मानते, अपनी मनमर्जी से चलते हैं और नाना प्रकार के आडंबर फैल जाते हैं, भगवान विष्णु की भक्ति कम होने लगती है, सभी हिरण्यकश्यप की तरह अपने आपको भगवान मानने लगते हैं। तब भगवान उन शक्तियों का नाश करने के लिए अवतरित होते हैं। भगवान श्रीराम को भी पता था क्योंकि उन्होंने रावण और आसुरी शक्तियों का नाश करना था । यह भगवान की लीला थी, ऐसा शास्त्रों में वर्णित है। इसे कोई भी देख सकता है। राजा जनक का राज्य बहुत बड़ा था। अयोध्या का राज्य उनके सामने कुछ भी नहीं था। लेकिन सीता के इतनी साधन संपन्न होते हुए भी, सर्वगुणसंपन्न होते हुए भी कोई भाव कभी नहीं आया। आप यह जानकर हैरान होंगे कि स्त्रियों के रोगों का एक कारण यह भी है कि वे बीते समय को भुला नहीं पाती। जिस प्रकार कोई शिष्य अपने आप को महत्व देने लगे या विद्यालय आकर अपने गुरु का अपमान करने लग जाए तो उसमें वह विद्वता नहीं आती जैसे आनी चाहिए जो स्त्री अपने माता-पिता के गुणों का बखान करती है और पति के माता-पिता को या पति के परिवार को सम्मान नहीं देती, उस स्त्री के मन में कभी आत्मिक शांति नहीं आ सकती, चाहे वह किसी भी गुरु के पास चली जाए, किसी भी आश्रम में चली जाए, कितनी भी तपस्या कर लें। आजकल के परिवेश में ऐसा मानना उचित नहीं लग रहा, इसमें स्त्रियों को लगेगा कि शायद हमारे सम्मान को कम किया जा रहा है क्योंकि स्त्री-पुरुष समान हैं। लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है। स्त्री-पुरुष कभी समान नहीं हो सकते। जैसे गुरु-शिष्य कभी समान नहीं हो सकते, पिता-पुत्र कभी समान नहीं हो सकते। पुत्र अगर राष्ट्रपति भी बन जाए तब भी वह अनपढ़ माता-पिता की बराबरी नहीं कर सकता। उसी तरह स्त्री चाहे कितने भी धनाढ्य परिवार से आई हो, कितना भी धन कमाने लगे, वह पति के बराबर नहीं हो सकती। कितनी स्त्रियां इस प्रकार की हैं जो अनेक आश्रमों में, अनंत गुरुओं के पास जाती हैं मगर वे पति को कुछ नहीं समझती। जो पत्नी अपने पति को कुछ भी नहीं समझेगी और अपने गुरू को सम्मान देगी उस स्त्री को कभी आत्मिक शांति नहीं मिलेगी, उसकी कभी कुण्डली जागृत नहीं होगी। आप यह जानकर हैरान होंगे कि माता सीता बार-बार आग्रह करके श्रीराम के साथ वनवास गई थी। वनवास के बाद भी भगवान राम ने सीता मां के बार-बार कहने पर और आंतरिक भावना में गुप्त संदेश के वशीभूत होकर समाज कल्याण के लिए उन्हें ऋषि के आश्रम में भेजा। इसमें भी एक रहस्य है। आमतौर पर देखने में यह लगता है कि मां सीता की बड़ी दुःखदायी अवस्था है। वास्तव में देखा जाए तो जब स्त्री का गर्भधारण हो जाता है। उस समय पुरुष का संसर्ग न होना बच्चों के लिए कल्याणकारी होता है। इस रहस्य को आधुनिक जगत नहीं जानता। गर्भवती स्त्री जिस प्रकार के वातावरण में रहेगी बच्चे का विकास उसी तरह का होगा। बाल्मीकि से बढ़कर और कोई तत्त्ववेत्ता कौन होगा? इसलिए भगवान राम ने सीता मां को उनके आश्रम में भेजा, जिससे उन बच्चों का विकास हुआ। जो स्त्रियां गर्भ अवस्था में आराम करती हैं, अपने शरीर को चलने फिरने नहीं देती, अपने शरीर से कोई व्यायाम नहीं करती, उनके बच्चे कमजोर होते हैं। उन्हें शारीरिक रूप से नाना प्रकार के रोग घेर लेते हैं। सीता माता के आश्रम में रहने से वहां ऋषियों की वाणी, उनकी शक्ति और वहाँ जो वे स्वयं काम करती थी उसका लव कुश पर प्रभाव पड़ा। उसी से लव कुश का निर्माण

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उपचार की अद्भुत विधि का रहस्य

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, रोगों को जांचने की व उनके उपचार की पुरातन पद्धतियां लोप होती जा रही है, इसका कारण क्या है? परम पूज्य गुरुदेव : इस प्राचीन, सनातन, गूढ़ दिव्य विद्या के लुप्त होने का मुख्य कारण है कि मानव अतिस्वार्थी हो गया है क्योंकि जितना यह बाह्य जगत है, दृष्टिगोचर सृष्टि है इसे हम मन एवं शारीरिक इन्द्रियों से ही जान सकते हैं। हमारी सारी शिक्षा, भौतिक शिक्षा मन पर ही आधारित है और अच्छा बुरा मन का स्वभाव है। इसे ‘परा विद्या’ भी कहा जाता है। लेकिन जब मानव ‘अ-मन’ अवस्था में चला जाता है तो वास्तविक अमन-चैन, परम शान्ति सद्चित आनन्द का अनुभव होता है। वह भावातीत अवस्था, मन के पार जाने की अवस्था में वही व्यक्ति पहुंच पाता है जिनके अंदर कोई स्वार्थ नहीं हैं, कोई कामना नहीं हैं। क्योंकि इच्छा या कामना ही तमाम दुःखों का मूल कारण है। बुद्ध धर्म में भी कहा गया है कि ऐसा देव पुरुष, महामानव का दर्जा पा जाता है और जब वह दिव्य शक्तियों का पवित्र व केंद्रित मन से आह्वान करता है, आत्मा की गहराइयों से प्रार्थना करता है तो समस्त ब्रह्माण्ड की दिव्य शक्तियां, ऊर्जा का रूप धारण करके उस विशेष पुरुष की वाणी में आ विराजती। हैं। उनके हृदयासन पर विराजमान हो जाती हैं। तो वे दिव्य शक्तियां जैसा उन्हें आदेश देती हैं, उपदेश देती हैं, वैसे-वैसे शब्द वाणी के द्वारा प्रवाहित होते चले जाते हैं। मां सरस्वती स्वयं ऐसे महामानवों की जिह्वा पर विराजमान हो जाती हैं एवं प्रभु कृपा उनके नेत्रों से, दृष्टिपात के रूप में अविरल बह निकलती है। उनके हाव-भाव से भी दिव्य कृपा की ही बरसात होती है। वे मौन रहकर भी दिव्य प्रसाद वितरित कर सकते हैं। ऐसे महापुरुषों से ही जगत चक्र कायम है। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव जी, क्या इस दिव्य पद्धति को किसी ट्रेनिंग या विशेष प्रशिक्षण द्वारा जाना जा सकता है? परम पूज्य गुरुदेव : इस विद्या यानी कि अपरा विद्याध्ययन के लिए भी सांसारिक शिक्षा की तरह ट्रेनिंग की परमावश्यकता है। पर उसके लिए ईश्वरीय कृपा की भी उतनी ही आवश्यकता रहती है। साक्षात गुरु की भी आवश्यकता है। इस चराचर जगत में जितनी भी विद्याएं हैं, स्थूल विद्याएं हैं, उनसे भी कहीं कठिन यह सूक्ष्म विद्या है उसके लिए योग्य व सक्षम गुरु के साथ-साथ योग्य पात्र भी मिलना चाहिये। दोनों के अन्दर निःस्वार्थता होनी अनिवार्य है। दोनों के अंदर जगत कल्याण, विश्व भ्रातृत्व एवं वसुधैव कुटुम्बम् की भावना होने की उत्तम अवस्था होनी चाहिये। ऐसी दिव्य-व्यवस्था में प्रभु ‘आयुर्विज्ञान के रहस्य’ गुरु के भीतर एवं गुरु शिष्य के भीतर प्रवाहित करता है।हमारे ग्रंथों एवं वांङ्मय में ऐसी प्राचीन गुह्यपद्धति का महाउल्लेख है। इतिहास में ऐसे अनेकों वर्णन आए हैं। महाभारत में एक कथा आती है कि उपमन्यु के गुरु आयुद्धकामना एक ऋषि हुए हैं। उपमन्यु ने एक बार तीव्र क्षुधा के कारण जंगल में आक के पत्ते खा लिए थे, जिसके उपरान्त उनकी आंखों पर काफी दुष्प्रभाव पड़ा। आक एक विषैला पौधा है। उपमन्यु आक के पत्तों के दुष्प्रभावस्वरूप दृष्टिदोष से पीड़ित होकर एक सूखे कुएं में गिर गए। व्याकुल होकर उन्होंने अपने गुरुदेव से प्रार्थना की। गुरुदेव के आदेश से उपमन्यु ने अश्विनी कुमारों का स्मरण किया। तब अश्विनी कुमार बन्धुओं ने उन्हें अथर्ववेद व ॠग्वेद की कुछ ऋचाओं का पाठ बतलाया और खाने को कोई औषधि न देकर केवल एक पुआ (मीठी पूरी) खाने को दिया। उनके निर्देशों का पालन करने पर उपमन्यु की आंखें पहले से भी ज्यादा ज्योति से प्रज्ज्वलित हो गई। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, एक और प्रश्न दिव्य-दृष्टि के बारे में है। जिस दिव्य-दृष्टि के बल पर संजय ने आंखों से अन्धे धृतराष्ट्र को महाभारत का आँखों देखा हाल सुनाया था। इसके पीछे क्या कोई यथार्थ अथवा सत्य है? परम पूज्य गुरुदेव : दिव्य दृष्टि का सिद्धान्त बिल्कुल एक वास्तविकता है और एक परम यथार्थ है व पूर्ण सत्य है। महर्षि व्यास जी ने वह अद्वितीय दिव्य दृष्टि केवल मात्र संजय को, वह भी महाभारत युद्ध के दौरान केवल 18 दिनों के लिये प्रदान की थी। विद्वान तो उस समय और भी रहे होंगे, लेकिन सुपात्र केवल संजय को ही माना गया। इससे यह सिद्ध होता है कि गुरु कृपा किसी एक पर ही हो सकती है। कोई एक विशेष शिष्य ही अपने प्रारब्ध (संचित) कर्म एवं पुरुषार्थ (वर्तमान प्रयास) के आधार पर उस दैवीय कृपा का अधिकारी हो सकता है। सभी पर या बहुतों पर इस दिव्य कृपा का बरस पाना संभव नहीं होता। फोटो या तस्वीर देखकर रोगी का निदान एवं चिकित्सा विधान बता देना भी गुरु कृपा का प्रसाद ही है। जैसे आजकल दूरदर्शन पर विश्वभर में घट रही घटनाओं को मात्र उपग्रह, सैटेलाइट के प्रक्षेपण से आप देख सकते हैं, यह दूरदृष्टि है। दूरदर्शन या विश्वदर्शन है। लेकिन जो दृष्टि संजय को दिव्य चक्षुओं के रूप में दी गई वह दिव्य दृष्टि है जो त्रिकालदर्शी एवं सम्पूर्ण ब्रह्मांड में भ्रमण करने में सक्षम है। वह दिव्य दृष्टि इन्द्रियातीत है। उसे शब्दों के द्वारा, मन के द्वारा, बुद्धि के द्वारा एवं बाह्य नेत्रों द्वारा नहीं जाना जा सकता। वह दिव्य, अगोचर, अगम्य है। कोई वैज्ञानिक यंत्र ऐसा नहीं है जो उसे जांच सके, माप सके या परख सके। यह तो अनुभव का विषय है जो मन-बुद्धि से परे है।

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सद्गुरु की पहचान

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, सद्गुरु की पहचान क्या है? सद्गुरु कौन होना चाहिए? आप कृपा करें। परम् पूज्य गुरुदेव : सद्गुरु कभी भीड़ के द्वारा किसी को प्रभावित नहीं करता है। क्योंकि भीड़ भी एक दिशा है, भीड़ भी एक बंधन है, भीड़ भी एक मोह है, भीड़ भी अपनी प्रतिभा दिखाने का, अपना प्रोडक्ट दिखाने का एक विज्ञापन है। सद्गुरु कभी विज्ञापन नहीं करते हैं। आप शिरडी के साईं बाबा, सद्गुरु नानकदेव, अष्टावक्र, स्वामी रविदास की फोटो देखेंगे तो आपको लगेगा कि ये एक भिखारी दिखते हैं जबकि ये वास्तव में ब्रह्मांड के स्वामी हैं। सद्गुरु अपने आप अर्थात अकेले में भी पूर्ण है। सद्गुरु स्वयं सर्व सम्पन्न है, सद्गुरु स्वयं नारायण है, सद्गुरु स्वयं शिव है, सद्गुरु स्वयं ब्रह्मा है। जो इस आस्था से सद्गुरु के पास जाता है, उसे सद्गुरु मिलता है। सद्गुरु आपको समय में नहीं ले जाएगा, सद्गुरु आपको उसी पल परमपिता परमात्मा की बोध करा सकता है, परमपिता परमात्मा की जानकारी करा सकता है। परमपिता की जानकारी में सबसे पहले यह जान लेना जरूरी है कि जैसे हम किसी वस्तु को देखते हैं, उस वस्तु को देखने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता है। सबसे पहले आँख, दूसरा प्रकाश तथा तीसरा वस्तु की आवश्यकता। यह जो परमात्मा है, वह इन्द्रियों के द्वारा नहीं जाना जा सकता है। इस जगत् में जो भी है, वह इन्द्रियों के द्वारा जाना जाता है। भगवान् श्रीकृष्ण ने भी कहा है कि परमात्मा को जानने का इन्द्रियों द्वारा कोई उपाय नहीं है। जैसे अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण से कहा कि प्रभु मैं विराट रूप देखना चाहता हूँ। जब भगवान् श्रीकृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया तो अर्जुन जैसा असाधारण मानव भी कांपने लगा। भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने रूप को दिखाने के लिए अर्जुन को दिव्य चक्षु प्रदान किये थे। उन दिव्य नेत्रों द्वारा अर्जुन ने स्वयं परमात्मा के स्वरूप को जाना था। इस तरह जो भगवान् हैं, परमात्मा हैं, वह स्वयं जाना जा सकता है, ऐसा भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है। सद्गुरु हमेशा आपके भ्रमों को तोड़ता है तथा आपकी जो खोज है, उसे पूर्णता देते हैं। उसे मुक्ति देते हैं, उसे मंजिल देते हैं, उसे शांति देते हैं। जैसी आपकी आँख होगी, वैसे ही दृश्य नजर आयेंगे। सद्गुरु को ढूंढने से पहले आप में प्रज्ञा होनी चाहिए, बोध होनी चाहिए। यह जान लेना चाहिए कि किस-किस प्रकार से सद्गुरु है और किस-किस प्रकार से सद्गुरु नहीं है। सद्गुरु देने का नाम है, सद्गुरु लेने का नाम नहीं है। सद्गुरु का यदि शाब्दिक अर्थ करें तो सद् का अर्थ है परमात्मा, गु का अर्थ है अंधेरा और रु का अर्थ है प्रकाश। गुरु आपको अलग-अलग दिशाओं के अलग-अलग विषयों के मिलेंगे लेकिन सद्गुरु अलग-अलग विषयों के नहीं होते। सद्गुरु एक ही विषय का होता है जो सत् का ज्ञान करवाता है। वह सर्वशक्तिमान होता है और वह स्वयं नारायण होता है, परमात्मा होता है। सदा एक ही होता है, एक ही हुआ है और एक ही रहेगा। वह जब भी संसार में आता है तो लीला करने के लिए आता है। जैसे भगवान श्रीराम आए, वे सीता के वियोग में विलाप कर रहे हैं, पेड़ों से पूछ रहे हैं, पर्वतों से पूछ रहे हैं, चंद्रमा और तारों से पूछ रहे हैं। यह हमें प्रतीत होता है। वास्तव में नारायण के लिए हंसना, रोना या विलाप करने जैसी कोई घटना नहीं होती। न ही उनके लिए तारीफ या निन्दा कुछ होती है। जैसे एक पलक झपकी या सागर की तरंग आई उसी तरह सद्गुरु के लिए यह संसार है। हमारे लिए संसार की एक-एक चीज बड़ा महत्व रखती है। थोड़ा सा लाभ हो गया तो हमारी प्रसन्नता का पारावार नहीं रहता, थोड़ी हानि हो गई तो हमारे दुःखों का अंबार लग जाता है, पर सद्गुरु के लिए ऐसा नहीं होता। यह जगत संबंधों पर टिका हुआ है। जगत में माता-पिता से बढ़कर कोई ऐसा संबंध नहीं होता, लेकिन जगत में जब माता-पिता को बच्चे देखते हैं कि ये माता-पिता मेरी मनोकामना पूर्ण नहीं कर रहे तो माता-पिता से भी बच्चे विरोध कर लेते हैं। इसी तरह पति-पत्नी में है। पति की जब मनोकामना पूर्ण नहीं होती तो वह पत्नी से विद्रोह कर लेते हैं। जब पत्नी की मनोकामना पूर्ण नहीं होती तो वह पति से विद्रोह कर लेती है। इसी तरह यह जगत अपने स्वार्थी, मनोकामनाओं से बना हुआ है। परंतु जब कोई सद्गुरु से संबंध बनाता है तो सद्गुरु पहले ‘उसकी जांच करता है कि इसका संबंध जगत के संबंधों की तरह है या उससे भिन्न है। वह उस व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण नहीं करता, रोग दूर नहीं करता, कई तरह से परीक्षा लेता है कि यह व्यक्ति दुःख में भी सुख की तरह रहता है। जब सद्गुरु को विश्वास हो जाता है कि इसका संबंध अलौकिक है, व्यावहारिक नहीं है, पारलौकिक है तो उस अवस्था में एक घटना घटती है जो सद्गुरु और शिष्य को ही मालूम होती है। उसको जगत नहीं देख सकता, ये आंखें नहीं देख सकती। क्योंकि इन्द्रियों की पहुंच वहां तक नहीं होती। सद्गुरु अपने शिष्य से कितना भी दूर हो पर हृदय के तल पर, आत्मिक तल पर कोई दूर नहीं होता। उस संबंध में कोई मीरा – श्रीकृष्ण दो नहीं होते, राधा श्रीकृष्ण दो नहीं होते। जो लोग ऐसा मानते हैं वास्तव में वे अज्ञानी हैं। सद्गुरु शिष्य की एक-एक अवस्था को जानता है। जब शिष्य पूर्णरूप से समर्पित हो जाता है। समर्पित होने का अर्थ है कि शिष्य के अन्दर सद्गुरु की सारी शक्तियां आ जाएं। ज्यों जल में जल आए खटाना, त्यों ज्योति संग जोत समाना । जैसे गागर में सागर समा जाए तो सागर और गागर दो नहीं रह जाते, उसका अस्तित्व दूसरा नहीं रह जाता। उसी तरह जब कोई शिष्य अपने शिष्य भाव से पार चला जाता है तो उसमें सद्गुरु के गुण प्रविष्ट हो जाते हैं। उसी से उसके रोगों का अंत हो जाता है, क्योंकि सद्गुरु बाहरी रूप से शरीर है। शरीर नाशवान है लेकिन आंतरिक तल पर वह परमात्मा से मिला हुआ है। जैसे हमें सागर के अन्दर देखने में बर्फ नजर आती है। वह थोड़ी देर के लिए नजर आती है, पर वह सागर है और सागर के साथ एक

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मोक्ष कैसे पाएं ?

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, मोक्ष क्या है और इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है ? कृपया इस जिज्ञासा का निवारण कीजिए। परम पूज्य गुरुदेव : आपने अति उत्तम प्रश्न किया है। हर मानव चाहे वह किसी भी धर्म या संप्रदाय से संबंधित है, इसी प्रश्न को लेकर ध्यान, साधना तथा योग द्वारा मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयासरत है। हमारे धर्म ग्रंथ भी मानव जीवन का उद्देश्य मोक्ष ही मानते हैं। जिसको प्राप्त करने हेतु व्यथित मानव सद्गुरु की शरण में जाता है। मोक्ष का अर्थ बन्धन मुक्त हो जाना ही है। इसे एक उदाहरण से समझें। जैसे किसी के रोगी होने पर चिकित्सक रोगी को स्वास्थ्य कहीं से बाहर से लाकर नहीं देता है, उसे रोग से मुक्ति दिला देता है तो स्वस्थ तो वह रोगी स्वयं ही हो जाता है। ऐसे ही मानव की उत्पत्ति पांच विकारों यानी काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार से हुई है। काम यानी वासना सृष्टि की उत्पत्ति का मूल है। आधुनिक विज्ञान इन पांच भावों को रोग या विकार नहीं मानता। वह इन्हें स्वाभाविक क्रिया ही मानता है, लेकिन सनातन तथा प्राचीन धर्मशास्त्रों ने इन्हें विकारों की ही संज्ञा दी है। जैसे वात, कफ, पित्त जो कि स्वाभाविक शरीर क्रिया के लक्षण समूह हैं, को दूषित करते हैं और समावस्था तो शरीर व मन से पार जाने में ही है। यही आध्यात्मिक अवस्था है। जब मानव किसी तत्त्ववेत्ता, ब्रह्मर्षि, सद्गुरु की शरण में जाकर इन पांच महाविकारों से मुक्ति प्राप्त करता है तो मोक्ष को पा जाता है और उस शख्स का पुनर्जन्म नहीं होता। वह आवागमन के चक्करों से छुटकारा पा जाता है। निर्वाण पद का अधिकारी होकर परमपद पाकर प्रभु परमात्मा से अंगीकार हो जाता हैं स्वेच्छा से वह नया जन्म या अवतार भी धारण कर सकता है। जीवन है तो विकार भी है, लेकिन जीवन रहते हुए भी विकारों से रहित, सात्विक, कर्तव्यनिष्ठ, कर्मयोगी का आदर्श जीवन जिया जा सकता है और यही जीते जी मोक्ष प्राप्त करना है। भगवान बुद्ध कहते हैं कि जन्म का मूल कारण इच्छा है एवं इच्छा ही दुःख है। कामना, चाहना ही इच्छा का मूल कारण है चाहे वह इच्छा प्रभु पाने की ही क्यों न हो। इच्छा से पार चले जाना स्वयं से साक्षात्कार हो जाना है, बुद्धत्व हासिल करना है। वही परम स्थिति है। मोक्ष की अनुभूति है। भगवान महावीर भी कहते हैं कि यह जन्म ही पाप है। मरण भी पाप है जवानी को भी, बचपन को भी रोग कहा गया है। शरीर की सारी अवस्थाएं ही दुःखस्वरूप हैं। पर जो मानव इस शरीर के बन्धनों से परे मूल तत्व को पहचान लेता है वही ‘अमर’ हो जाता है। मुक्त हो जाता है। किसी तत्त्ववेत्ता से परम गूढ़ रहस्यमी दिव्य ज्ञान प्राप्त करने के बाद मानव मोक्ष का अधिकारी हो जाता है। यह तभी संभव है जब कोई ज्ञान पिपासु पपीहे की तरह व्याकुल होकर, स्वाति की बूंद की सी प्रतीक्षा व धैर्य संजोए जब किसी तत्त्वदर्शी के सममुख श्रद्धा से नतमस्तक होता है, पूर्ण समर्पण भाव से दण्डवत करता है, स्व अस्तित्व भूल जाता है, तभी वह विराट स्वरूप देखने का सुपात्र बनता है। मोक्ष का एक अन्य अर्थ है- वह शख्स जो मन का गुलाम नहीं है, वासनाओं का गुलाम नहीं है। बल्कि काम, क्रोध, लोभ और अहंकार अब उसके गुलाम हो गए हैं। उसके द्वारा नियंत्रित हैं। ये जंगली हिंसक जानवर प्रतीक महाविकार, उस मानव के समक्ष पालतू बिल्लियों की भाँति बन जाते हैं। योगी लोग अपनी इच्छा से ही क्रोधित होते हैं। जब मदमस्त विषधर की तरह यह विकार मानव या देवों को पथच्युत करने की कोशिश करते हैं, दुस्साहस करते हैं तो उनका हश्र भी वहीं होता है जो कि कामदेव का शंकर जी को उकसाने की कोशिश में हुआ था। भस्म हो जाते हैं काम, क्रोध, इत्यादि । कामाग्नि, दिव्याग्नि की भेंट चढ़ जाती है। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, मोक्ष प्राप्त करने के बाद मानव जाता कहां है? क्या होता है निर्वाण प्राप्ति के बाद? परम पूज्य गुरुदेव : आपने अति महत्वपूर्ण प्रश्न किया है। इस बाबत एक जगह सद्गुरु श्री नानकदेव जी ने लिखा है- “ज्यों जल में जल आए खटाना, त्यों ज्योति संग जोत समाना।“ अर्थात् जैसे सागर की लहर सागर में खोकर अपनी पहचान छोड़ जाती है। बूंद स्वयं सागर बन जाती है। वैसे ही बूंद जीवात्मा भी परमात्मा के विशाल सागर में विलीन हो जाती है। महात्मा बुद्ध कहते हैं कि दीपक के बुझ जाने का नाम मोक्ष है। वैसे ही शरीर समाप्त होने पर भौतिक शरीर तो पंचतत्त्वों में विलीन हो जाता है और आत्मा परमात्मा में बशते मानव ने अपने जीवन काल में अपने स्वयं से साक्षात्कार कर लिया हो। समर्पण भाव से सद्गुरु से दीक्षा ले ली हो एवं सद्कर्मा व भक्तिमार्ग से अपने संचित कर्मों को भस्मीभूत कर दिया हो। यही मानव। जीवन की परमश्रेष्ठ अवस्था है। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, अब जिज्ञासा यह उठती है कि मानव जीवन का ध्येय अगर मोक्ष प्राप्त करना है तो जीते जी मोक्ष प्राप्त करने के बाद शरीर की क्या उपयोगिता रह जाती है ? परम पूज्य गुरुदेव : एक रोगी जो औषधि खा रहा है अथवा हास्पिटल में एडमिट है, उसके स्वस्थ होने के बाद हास्पिटल का क्या महत्व रह जाता है? इलाज करने वाले चिकित्सक की क्या अहमियत रह जाती है? मान लो कोई पैदा ही हास्पिटल में हुआ हो और उसका पूरा जीवन ही अस्पताल में बीता हो और कोई उसे बलात् हास्पिटल से जाने के लिये कहे तो वह पीड़ा तो महसूस करेगा ही पर कोई यथार्थवादी ही जानता है कि वह अस्पताल कोई घर नहीं है-एक किराए का मकान है, धर्मशाला है, सराय है, रैन बसेरा हैं। यह जगत तो ट्रेनों का एक जंक्शन है कोई ट्रेन आती है तो कोई जाती है। पर योगियों के लिये, मनीषियों के लिए यह संसार ऐसे हो गया है जैसे रोगी के लिए दवा, डाक्टर या हास्पिटल। जब उन्होंने उस परमानन्द का रसास्वादन करके जगत को भोगा तो उन्हें जगत न अच्छा लगा न बुरा। जैसे आप किसी मार्ग से जा रहे हैं तो साइडों पर पड़े कूड़ेदानों या नालियों से घृणा नहीं करते। आप अपने रास्ते से निकल जाते हैं। ऐसे ही

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