Jagadguru MahaBrahmrishi Shree Kumar Swami ji

General

General

आदर्श गृहस्थ

जिस घर में पति व पत्नी का झगड़ा नहीं होता और शांति रहती है तो वह घर स्वर्ग के समान होता है तथा वे पति-पत्नी पूजनीय होते हैं। हमारे अवतारों ने लीला करके ग्रह-कलेश के दुष्परिणामों के बारे में विस्तारपूर्वक बताया है। भगवान शंकर की अवज्ञा करके माता सती जब अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ आयोजन में हिस्सा लेने चली गई तब उसका दुष्परिणाम घटित हुआ। पौराणिक कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति भगवान शंकर को पसंद नहीं करते थे अतः अपने यज्ञ आयोजन में समस्त देवताओं को तो उन्होंने आमंत्रित किया लेकिन भगवान शंकर को नहीं किया। जब माता सती कुछ शिवगणों सहित वहां पहुंचीं तो उन्होंने देखा कि भगवान शंकर का आसन वहां नहीं था और न ही उन्हें यज्ञ के भाग का अधिकारी माना गया था। माता सती की मां ने ही उनका सत्कार किया और पिता ने तिरस्कार किया। जब माता सती ने भगवान शंकर के प्रति किए व्यवहार के विषय में पिता से प्रश्न किया तब पिता दक्ष ने अपमानित भाषा का प्रयोग किया। इससे कुपित होकर माता सती ने यज्ञ के कुंड में कूदकर अपने प्राण दे दिए। वहां उपस्थित शिवगणों ने यज्ञ विध्वंस कर दिया। भगवान शंकर को जब ज्ञात हुआ तब वे विरह से व्याकुल हो गए और माता सती के शव को उठाकर समस्त ब्रह्मांड में भ्रमण करने लगे। इनकी विरहाग्नि से समस्त लोक जलने लगे। भगवान विष्णु ने स्थिति की भयावहता को भांपते हुए माता सती के अंगों को अपने सुदर्शन चक्र से 52 टुकड़ों में विभक्त कर दिया। ये अंग पृथ्वी पर जहां भी गिरे वे शक्तिपीठ बन गए। हिमाचल प्रदेश में भी माता सती के अंग गिरे और यह माता की शक्ति से भरपूर हो गया।  महाभारत की घटना भी द्रोपदी के कारण ही घटित हुई। यदि द्रोपदी दुर्योधन को ‘अंधे का पुत्र अंधा’ नहीं कहती तो वह भयंकर नरसंहार वाला महाभारत युद्ध कभी नहीं होता। मां सीता ने भगवान श्रीराम का कहना नहीं माना था। हालांकि वह भी माता सीता की लीला ही थी जिससे उन्होंने हम सांसारिक जीवों को शिक्षा प्रदान की। माता सीता को भगवान श्रीराम ने कहा कि सोने का मृग होता ही नहीं है लेकिन वे न मानीं। अंततः उस मायावी मृग के पीछे उन्हें जाना पड़ा। इसके बाद जब मायावी आवाज आई कि लक्ष्मण मेरी सहायता करो, तब भी माता सीता न मानी और भगवान लक्ष्मण के बार-बार समझाने पर भी उन्हें भगवान श्रीराम की खोज के लिए भेज दिया। जाते-जाते भगवान लक्ष्मण ने रेखा खींच दी और कहा कि हे माता इसका उल्लंघन मत करना। माता सीता ने यह भी नहीं माना और रेखा का उल्लंघन कर दिया तथा रावण उनका हरण करके लंका में ले गया। जब-जब स्त्री मर्यादा की रेखा का उल्लंघन करती है, उसका हश्र होता है। रामायण भारत में है, इसलिए यहां अभी संस्कार शेष हैं वर्ना अमेरिका, कनाडा व पश्चिम के देशों में तो जैसे संस्कार हैं ही नहीं। भगवान श्रीराम ने आजन्म एक पत्नीव्रत धर्म का पालन किया। भगवान श्रीराम जैसा आज्ञाकारी पुत्र, भरत, लक्ष्मण जैसे भाई इतिहास में कोई नहीं है। रामायण के आदर्शों से ही भारत में धर्म व संस्कृति बची हुई है। पश्चिम के देशों में तो रिश्ते जैसे नाममात्र के लिए हैं। एक पति की कई पत्नियां तो एक पत्नी के कई पति । इनकी संतानों का भी नहीं पता होता है कि कौन सी संतान किस पति या पत्नी की है। बेटियां, दामाद, पुत्र, पुत्रवधू, माता-पिता सबका एक जगह शराब पीना, वहां आम बात है। उचित तो यह होता है कि पति-पत्नी एक दूसरे की भावनाओं की कद्र करें और किसी भी मतभेद को संवाद से ही निपटा लें। घर की लड़ाई घर से बाहर न जाए, इसी को आदर्श गृहस्थ कहा जाता है। (शिमला समागम) –प्रभु कृपा पत्रिका,जनवरी, 2019

General

काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जीवन में आवश्यक

यह सृष्टि विकार सहित है। बिना विकारों के यह गतिशील नहीं हो सकती। हमारे ऋषि-मुनियों ने विकारों को सुन्दर संज्ञा प्रदान की है। संसार में जितने भी कर्म होते हैं, उन सब में विकार होता है। यदि विकार न हो तो सृष्टि का चक्र चल ही नहीं सकता। जो भी इस पृथ्वी पर जन्म लेता है या उत्पन्न होता है वह नष्ट अवश्य होता है। इसलिए इस पृथ्वी को मृत्युलोक भी कहा जाता है। क्षरण होना हर पदार्थ का गुण है। काम, क्रोध, लोभ, मोह ये पांच प्रकार के विकार मनुष्य के अंदर अवश्यंभावी होते हैं। जब काम उत्पन्न होता है तो संतान वृद्धि होती है। संतान के मोह उत्पन्न होता है। इस मोह के वश में होकर मनुष्य अर्थ की तरफ दौड़ता है अर्थात् अत्यधिक धन कमाना चाहता है। मकान बनाता है, धन जोड़ता है और सुख-संपदा एकत्रित करने का प्रयास करता है। जब उसका यह मकसद पूरा नहीं होता तब उसे क्रोध आता है। जब मनुष्य को धन-संपदा के साथ संतान सुख मिलता है, ऐश्वर्य – कीर्ति, पद-प्रतिष्ठा मिलती है, तब उसे मद हो जाता है अर्थात् घमंड हो जाता है। इन विकारों को भी हमारे ऋषियों-मुनियों ने अत्यंत सुन्दर प्रारूप बताया है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन को कहा कि हे अर्जुन मोक्ष तक पहुंचने का मार्ग-धर्म, अर्थ व काम है। अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यही मनुष्य का लक्ष्य होना चाहिए। पहले मनुष्य धर्म को जाने, फिर अर्थ अर्जित करते हुए काम को अपनाए और तत्पश्चात् मोक्ष की तरफ अग्रसर हो जाए। इस मनुष्य शरीर के लिए देवता भी तरसते हैं। इसका कारण केवल एक ही है कि इस मनुष्य शरीर के द्वारा ही मोक्ष की प्राप्ति संभव होती है। हमें इस मनुष्य शरीर की कद्र करनी चाहिए जो 84 लाख योनियों में भ्रमण करने के पश्चात ही प्राप्त होता है। इस दुर्लभ योनि में प्राप्त तन को स्वच्छ रखना चाहिए क्योंकि यदि तन स्वस्थ है तब ही प्रभु का नाम स्मरण किया जा सकता है। पहला सुख निरोगी काया होता है अतः इसमें रोग उत्पन्न न हों, इसका हमें ख्याल रखना पड़ेगा। तन के साथ-साथ अंदर की स्वच्छता भी बहुत जरूरी होती है। हमारा अंतर्मन भी साफ होना चाहिए। जिस प्रकार तन पर रोग न हो उसी प्रकार हमारा मन भी रुग्ण न हो अर्थात् कुत्सित विचारधारा वाला न हो। यही स्थिति मनुष्य को मोक्ष तक पहुंचने की यात्रा में सहायता प्रदान करती है। आज जो पाठ मैं आपको प्रदान कर रहा हूं वह तन के साथ-साथ मन को भी स्वच्छ बनाता है। (मोहड़ी समागम) –प्रभु कृपा पत्रिका,जनवरी, 2019

General

बिना कहे ही करते हैं गुरु कृपा

गुरु से कभी मांगने की जरूरत नहीं होती। ऐसे ही मंदिरों में जाकर रोने से कभी कुछ प्राप्त नहीं होता और न ही याचना करने से लाभ होता है। आपको तो बस यह करना चाहिए कि गुरु के समक्ष या मंदिर में जाकर बैठ जाएं और चुप करके अपने श्रद्धासुमन भेंट करें। गुरु बिना कहे भी सब कुछ दे देता है। आप वार्तालाप करके अपनी हानि करते हैं। मैं अपने गुरु के द्वार पर एक महीना तक बैठा रहा था। कोई वार्तालाप हमारे बीच नहीं होता था। एक महीने बाद गुरु जी ने मुझे एक पाठ दिया। केवल निस्वार्थ सेवा भाव से ही कृपा मिलती है। कोई भी सेवा करें तो यह भाव मन में भी न लाएं कि मैंने यह सेवा की है। किसी को बताओ भी मत, नहीं तो सब व्यर्थ हो जाएगा। जब बिना जाहिर किए सेवा की जाती है तो आपको इतना मिलेगा कि उठाया भी नहीं जा सकेगा। सेवा हमेशा विनम्र भाव से करनी चाहिए। (फरीदाबाद समागम) किसी शरीर में नहीं आते देवी-देवता शोर मचाना, नारे लगाना, ढोल-नगाड़े बजाना-मां की भक्ति नहीं कहलाती। दुर्गा मां की भक्ति केवल शांति से पाठ करने और उसमें ध्यान लगाने से ही होती है। कई बार कुछ लोग सिर हिलाते हैं और उल्टी-सीधी हरकतें करते हैं। उनका कहना होता है कि उनमें दुर्गा मां आ गई हैं। कई कहते हैं कि भूत-प्रेत आ गए हैं। पहली बात तो यह है कि दुर्गा मां किसी के शरीर में क्यों आएंगी और आएंगी भी तो वह सिर क्यों हिलाएंगी। दुर्गा मां कभी सिर हिलाती हैं, उछल-कूद करती हैं? यह ढोंग है, आडंबर व प्रपंच है। यह वो लोग हैं जो विक्षिप्त होते हैं और अपनी ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिए ऐसा करते हैं। जब कोई ऐसा करे तो उसकी ओर ध्यान मत दो। उसे कहीं दूर ले जाकर छोड़ दो, वह अपने-आप ही शांत हो जाएगा। भला दुर्गा मां भगवान शिव, बजरंगबली किसी के शरीर में क्यों आएंगे? जबकि इनका पाठ करने से भूत-प्रेत दूर भाग जाते हैं। भगवान बजरंगबली ने बाल्यावस्था में सूर्य को एक फल समझकर मुख में रख लिया था। माता सीता की खोज में जब गए तो समुद्र को एक ही छलांग में पारकर दिया था। भगवान लक्ष्मण के मूर्छित हो जाने पर उनके लिए संजीवन बूटी वाला पहाड़ ही उठा लाए थे। अहिरावण जब भगवान श्रीराम व भगवान लक्ष्मण का अपहरण करके ले गया तब उसका वध करके इन्हें मौत के मुख से निकालकर लाए थे। भला ऐसे भगवान हनुमान किसके शरीर में समा सकते हैं जो आज भी अजर-अमर और कलियुग के देवता हैं। इन्होंने महाभारत युद्ध में भी भगवान श्रीकृष्ण व अर्जुन की सहायता की थी। इसके पश्चात् भी उनमें कर्ताभाव नहीं आया। वे इन सब कार्यों से अंजान थे। उनका कहना था कि यह सब मैंने नहीं किया, यह तो स्वयं भगवान श्रीराम की लीला है। (पालमपुर समागम) -प्रभु कृपा पत्रिका,जनवरी, 2019

General, Science & Spirituality

संगीत से ब्रह्मनाद तक

संगीत का और मंत्रों का गहरा संबंध है। जब इस सृष्टि की रचना का प्रारंभ हुआ तो उस समय एक भीषण शब्द उत्पन्न हुआ, वह था – ‘ॐ’ । इसी से सारी सृष्टि बनी है। आकाश ही शब्द का आधार है। संगीत में रागों का बहुत महत्व है। हमारे ऋषि-मुनि वेदों की ऋचाओं को रागों में ही गाया करते थे। राग का परा व अपरा दोनों से ही सम्बन्ध है क्योंकि राग के गायन को सुनने या गाने के परिणाम स्वरूप मनुष्य अपरा से परा में चला जाता है और परा का अर्थ है-‘परमात्मा’। नाद से ब्रह्म तक पहुंचा जा सकता है। मंत्रों का सृजन शब्दों से ही होता है और सभी मंत्रों में सर्वोपरि शब्द है-‘ॐ’ । श्रीगुरुग्रंथ साहिब जी में ‘एक ओंकार’ की महिमा है। भगवान शिव को नटराज कहा जाता है-नृत्य के देवता। मां सरस्वती वीणावादिनी हैं तो भगवान श्रीकृष्ण को भी नटवर नागर कहा जाता है। इनकी बांसुरी सभी का मन मोह लेती थी। हमारी सृष्टि में संगीत, कला, चित्रकारी का बहुत महत्व है। हमारी ऋषि-मुनि ध्रुपद घमाज में वेदों की ऋचाओं का सस्वर पाठ किया करते थे। स्वामी हरिदास जी जो तानसेन के गुरु थे, वे वृंदावन में भगवान के लिए ही रागों में गायन करते थे। उन्हें उसी दौरान समाधि लग जाती थी और वे ब्रह्म तक पहुंच जाते थे। नाद से ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है अतः इसे ब्रह्मनाद कहा जाता है। वृंदावन के वनों में दूर-दूर तक बनी झोंपड़ियों व आश्रमों में भी कई संत-महात्मा रागों के गायन के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण व मां राधा की स्तुति करते हुए मिल जाएंगे। समय के अनुसार वे रागों का गायन करते हैं और मस्त रहते हैं। वहां अपूर्व शांति होती है। मेरा जब भी मन होता है, वहां चला जाता हूं और उन्हें सुनता हूं। वहां से वापिस आने का मन ही नहीं करता है। कलकल बहती नदी के किनारे बैठकर जब रागों का गायन होता है तो वहां का वातावरण विशेष प्रकार की आभा और ताजगी से भर जाता है। महलों में रागों का गायन गुणीजन करते थे। इन्हें राजा-महाराजा सुनते थे। कई गवैये वहां नियुक्त होते थे जो प्रथम प्रहर से लेकर आठ प्रहर तक समयानुसार रागों का गायन करते थे लेकिन अब वो परंपराए नहीं रहीं और न ही महल रहे। यह शास्त्रीय गायन अब कुछ ही लोगों के पास धरोहर के रूप में बचा हुआ है। (बोधगया समागम) -प्रभु कृपा पत्रिका, जनवरी, 2019

General, Science & Spirituality

आधुनिक विज्ञान की सीमा

आधुनिक विज्ञान मनुष्य के कृत्रिम अंग प्रत्यारोपित करने में सक्षम है। हार्ट में पेसर लगा देते हैं, कान में सुनने के लिए मशीन, आंख का आपरेशन कर लैंस लगा देते हैं, किडनी व लीवर भी ट्रांसप्लांट कर देते हैं लेकिन वे डीएनए नहीं बना पाए। टेस्ट ट्यूब बेबी पैदा कर सकते हैं लेकिन बच्चा नहीं बना पाए। यह आधुनिक विज्ञान डीएनए नहीं बना पाया। वीर्य की एक बूंद से 90 हजार बच्चे पैदा हो सकते हैं और जो स्त्री के गर्भाशय में प्रवेश करता है वह केवल सुई की नोक से भी सूक्ष्म होता है। वैज्ञानिक केवल इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन व प्रोटॉन तक ही पहुंच पाए हैं। इन्होंने समझा कि हमने इस ब्रह्मांड का रहस्य पा लिया है, अब हमें कोई जरूरत नहीं है परमात्मा की। सृष्टि जो चल रही है, उसका एक सिस्टम है और इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। हैरत तो यह है कि ये वैज्ञानिक मानते हैं कि हम इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन व प्रोटॉन बना नहीं सकते इसलिए ये कहने लगे कि गॉड पार्टिकल्स ही यह कार्य करते हैं। जब इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन व प्रोटॉन स्वत: ही गतिमान है तो वे गॉड पार्टिकल्स की बात क्यों करने लगे? इतना ही नहीं गॉड पार्टिकल्स को ढूंढ़ने के लिए दो बड़े प्रयोग भी किए गए जिसमें सारी दुनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिक शामिल हुए लेकिन असफल रहे। जब ये लोग गॉड अथवा परमात्मा को ही नहीं मानते तो गॉड के पार्टिकल्स कहां से आए। इसके बाद इनका यह भी कहना है कि यदि हमें गॉड पार्टिकल्स मिल जाएं तो हम पृथ्वी, चन्द्रमा व तारे भी बना सकते हैं। ढूंढ रहे हैं और ढूंढते ही रहेंगे लेकिन इन्हें कभी नहीं मिल सकता इनका मनचाहा। न मिला है, न मिलेगा, कभी अंधेरे को सूरज मिला है। इस जगत् में जो भी है वह बिना कारण के नहीं है। हम कौन हैं, यहां क्यों हैं और यहां कैसे आए इसका भी कारण है-जो किसी को नहीं पता और न ही कोई इस बारे में विचार ही करता है। आदमी के पास इसके लिए वक्त ही नहीं है। जो उसे दिखाई देता है उसे ही मानने लगता है। आदमी यह मानने लगता है कि जब हम बच्चा पैदा कर सकते हैं तो इसमें भगवान की क्या भूमिका है? जो कुछ भी है विज्ञान है। जो यंत्रों द्वारा दिखाई देता है वही सत्य है। परमात्मा इन्हें दिखाई नहीं देता इसलिए वह है ही नहीं। (लुधियाना समागम) -प्रभु कृपा पत्रिका, जनवरी 2019

General, Ramayan

भगवान श्री राम व माता सीता का जीवन चरित्र

समय चक्र यदि उल्टी गति से चलने लगे तो हम कलयुग से निकलकर द्वापर से गुजरते हुए उस त्रेता युग में पहुंच जाएंगे जो भगवान श्रीरामचन्द्र जी व माता सीता जी के उद्दात जीवन चरित्रों का साक्षी है। वे सभी घटनाएं चलचित्र की तरह आंखों में दृश्यमान हो जाएंगी जो आज के युग के मानव के लिए अकल्पनीय व अविश्वसनीय हैं। लेकिन ये सब उतनी ही सत्य हैं जैसे आसमान में सूर्य। भगवान श्रीरामचन्द्र जी व माता सीता जी जैसे पात्र त्रेता युग में ही अवतरित हुए हैं किसी अन्य युग में नहीं। हम यदि गहनता से इन चरित्रों का पुनरावलोकन करेंगे तो ऐसा प्रतीत होगा कि जैसे ये किसी दिव्य लोक से पृथ्वी पर अवतरित वे दिव्य आत्माएं हैं जो मानवता को जीवन आदर्शों का संदेश देकर पुन: अपने लोकों में वापस चली गईं। सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी, जो पितु मातु बचन अनुरागी । भगवान श्रीराम जी के राज्याभिषेक की तैयारियां जोर-शोर से हो रही हैं। पूरी अयोध्या सहित राजदरबार व महलों को अति सुन्दरता से सजाया गया है। माता कौशल्या, माता कैकेई व माता सुमित्रा बहुत ही प्रसन्न हैं। प्रजा में हर्ष की लहर प्रसारित हो रही है। घर-घर खुशियां मनाई जा रही हैं। सभी प्रसन्न हैं लेकिन एक स्त्री ऐसी भी है जो परम दुखी है। उसके मन में घोर विषाद है। वह स्त्री इस राजकुल में बहुत ही महत्व रखती है क्योंकि वह महारानी कैकेई की मुख्य दासी है। इसे कैकेयराज ने महारानी कैकेई के साथ दहेज के रूप में ही महाराज दशरथ को सौंपा था। इस दासी का मुख्य कार्य है कि वह समय आने पर महारानी कैकेई को यह याद दिला दे कि महाराज दशरथ ने उन्हें दो वरदान धरोहर प्रदान किए हैं। मंथरा को यह बिल्कुल भी नहीं सुहा रहा है कि श्री भरत लाल की जगह श्रीरामचन्द्र जी को राजतिलक हो । रात्रि का प्रथम प्रहर प्रारंभ हो चुका है और मंथरा ने अपने शब्द जाल से महारानी कैकेई को यह समझा दिया है कि आप की भलाई इसी में है कि राजा श्री भरतलाल हों। साथ में तरीका भी बता दिया है कि किस प्रकार आज की रात बीतने से पहले ही महाराज दशरथ से दो वरदान मांगने हैं ताकि भगवान श्रीरामचन्द्र जी राजा बनने की बजाय वनों को चले जाएं और श्री भरतलाल जी को राजपद मिल जाए। इसी घटनाक्रम में महारानी कैकेई कोपभवन में चली गई। महराज दशरथ को जब ज्ञात हुआ तब वे वहां पहुंचे। उन्होंने महारानी कैकेई को मनाने का भरसक प्रयास किया क्योंकि वे उन्हें अत्यंत प्रेम करते हैं। महारानी कैकेई ने उन्हें राम की सौगंध से बांधकर दो वर जो धरोहर हैं, वे मांग लिए। पहले वर में श्री भरतलाल को राज्य और दूसरे वर में भगवान श्रीरामचन्द्र जी को चौदह वर्ष का वनवास। महाराज दशरथ ने जब ये सुना तब वे मूर्छित हो गए। मूर्छा जाने के बाद महारानी कैकेई को समझाया लेकिन वह नहीं मानीं और अपनी बात पर अड़ी रही। अंततः त्रिया चरित्र ने रंग दिखाया और महाराज दशरथ ने ये दोनों वरदान उन्हें दे दिए। इसके पश्चात महाराज दशरथ को गहन आघात के कारण मूर्छा आ गई। भगवान श्रीरामचन्द्र जी को ज्ञात हुआ तब वे वहां आए और सारा घटनाक्रम जानने के बाद माता कैकेई से कहा-‘हे माता, सुनो! वही पुत्र बड़भागी है जो पिता-माता के वचनों का पालन करने वाला है। माता-पिता को संतुष्ट करने वाला पुत्र हे जननी, सारे संसार में दुर्लभ है। वन में विशेष रूप से मुनियों का मिलाप होगा जिससे मेरा सभी प्रकार से कल्याण है। उसमें भी पिता जी की आज्ञा और आपकी सम्मति है। मेरे प्राणप्रिय भरत राज्य पाएंगे, इन सभी बातों को देखकर यह प्रतीत होता है कि आज विधाता सब प्रकार से मेरे अनुकूल है। जो भगवान श्रीरामचन्द्र जी अगले दिन राज्यपद पाने वाले हैं, रात्रि भी बीती और उन्हें वनवास की आज्ञा मिल गई। दृश्य इस प्रकार पलट गया जिसकी कल्पना आज का मानव कर ही नहीं सकता। यदि ऐसा आज किसी युवक के साथ हो जाए तो वह अपने माता-पिता के विरुद्ध होकर क्या कुछ नहीं कर सकता? लेकिन भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने कितनी सहजता से इस वनवास को स्वीकार कर लिया। आज्ञाकारी पुत्र की तरह उन्होंने पिता के हर वचनों का मान रखा। इस संसार में ऐसा आज्ञाकारी विरले ही देखने को मिलता है जो पिता के कहने मात्र से राजपाट छोड़कर वन के लिए निकल जाता हो। राम को आदर्श मानने वाले विद्वानजन भी अपने पिता की आज्ञा के लिए इस प्रकार का त्याग नहीं कर सकते। ऐसा दुर्लभ उदाहरण कहीं देखने को नहीं मिलता कि कोई पुत्र पिता के कहने पर अपना राजसी वैभव तुरंत त्यागकर जंगल में भटकने को चला जाए। किन्तु राम के व्यक्तित्व की सबसे दुर्लभ विशेषता यही है कि वे एक आदर्श पुत्र की तरह अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हैं और हर प्रकार के असहनीय दुखों को भोगने को तत्पर दिखाई देते हैं। यौवन की अवस्था में 14 वर्ष का लंबा वनवास भोगना किसी के लिए भी संभव नहीं है किंतु भगवान राम बिना संकोच के वन को चल पड़ते हैं। माता-पिता के आज्ञाकारी होने का ऐसा उदाहरण न कभी भूतकाल में था और न ही वर्तमान है। तथा भविष्य में भी नहीं होगा। प्रथम राम भेंटी कैकेई, सरल सुभायं भगति मति भेई माता कैकेई जो भगवान श्रीरामचन्द्र जी को माता कौशल्या से भी अधिक प्रेम करती हैं, दुर्बुद्धी मंथरा दासी के बहकाने से अपना मार्ग भूल गईं। यही माता समय बीत जाने पर अपने पुत्र श्री भरतलाल जी द्वारा प्रताड़ित करने पर पश्चाताप की अग्नि में जलने लगीं। जब सारा परिवार भगवान श्रीरामचन्द्र जी को वापिस अयोध्या लौटाने के लिए श्री भरतलाल जी सहित गया तब उनके साथ माता कैकेई भी हैं। श्री लखन लाल जी ने जब उन्हें देखा तो उन्हें क्रोध आया और उन्होंने माता कैकेई की अवहेलना की लेकिन भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने सबसे पहले माता कैकेई के चरण स्पर्श किए और आशीर्वाद लिया। भगवान श्रीरामचन्द्र जी के मन में उनके लिए कोई दुर्भावना का विचार ही नहीं है।। इसके पश्चात जब भगवान श्रीरामचन्द्र जी वनवास काटकर अयोध्या में लौटे तो सर्वप्रथम वे माता कैकेई के ही चरण स्पर्श करते हैं। जबकि श्री भरतलाल जी

General, Ramayan

‘राम’ मंत्र की अति गोपनीय महिमा

ये दो अक्षरों का शब्द ‘राम‘ बहुत ही चमत्कारी है। हम जिस रामायण वाले राम की बात करते हैं तो वह तो एक अवतार था और उनके सिमरण मात्र से ही कल्याण होता है। लेकिन इसका मूल बता रहा हूं कि ‘राम’ शब्द का उद्भव ‘ह्रांग’ से हुआ है। जब हम ह्रांग का उच्चारण करते हैं तो यह रांग के रूप में जिह्वा पर आता है अर्थात् हमें रांग सुनाई देता है। निरंतर रांग उच्चारित यह रांग ‘राम’ में परिवर्तित हो जाता है। इस तरह राम एक महामंत्र के रूप में जब साधक को सिद्धि प्रदान कर देता है तब इसके दूरगामी परिणाम तो होते ही हैं, तत्क्षण प्रभाव भी होता है। राम शब्द का जाप करते ही साधक अपनी सब परेशानियों व चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है। राम का जाप साधक के चारों तरफ एक सुरक्षा कवच बना देता है जिससे भी नकारात्मक शक्ति उसे हानि नहीं पहुंचा पाती। तनाव व डिप्रेशन तो तत्क्षण ही नष्ट हो जाते हैं और साधक में आत्मविश्वास, नवचेतना व ऊर्जा का संचार होने लगता है। ‘रांग’ के निरूपण ‘राम’ को निरंतर जाप करने वाला व्यक्ति हर क्षेत्र में उन्नति करता है और उसके कार्य में आने वाली बाधाएं समाप्त हो जाती हैं। इस राम नाम के महामंत्र को बड़े-बड़े संतों, महात्माओं और ऋषि-मुनियों ने निरंतर काल तक जपा है। महर्षि वाल्मीकि ने तो उल्टा ‘मरा-मरा’ जपते-जपते ही राम को पा लिया था। (पंचकुला समागम)  प्रभु कृपा पत्रिका, जनवरी, 2019

General, Mahabharat

पेड़ों को काटने के दुष्परिणाम

पेड़ों को काटना नहीं चाहिए। पेड़ों को काटने का अपराध भी मनुष्य की हत्या करने के समान ही है। पेड़ हमें जीवन प्रदान करते हैं। आज जितनी भी प्रदूषण व पर्यावरण की समस्या पूरे विश्व के सामने है, वह पेड़ों को काटे जाने की वजह से है। हमें जितना भी संभव हो वृक्ष लगाने चाहिए। पेड़ हमें प्राण वायु प्रदान करते हैं, ऊर्जा देते हैं। महाभारत की एक कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपनी मृत्यु के अंतिम क्षण शर-शैय्या पर लेट कर बिताए थे। उल्लेखनीय है कि उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान मिला हुआ था और वे सूर्य के उत्तरायण होने पर ही प्राण त्याग करना चाहते थे, जिसमें अभी देर थी। उतने दिनों तक वे रणभूमि में ही शर-शैय्या पर लेटे रहे। एक दिन उनसे मिलने के लिए भगवान श्रीकृष्ण आए। भीष्म पितामह ने विनम्र भाव से उनसे पूछा कि हे प्रभु, मैंने तो पूरा जीवन सनातन मर्यादाओं का पालन करते हुए धर्माचरण से व्यतीत किया है लेकिन मुझे यह क्यों भोगना पड़ रहा है कि मैं इस शर-शैय्या पर कष्टपूर्वक लेटा हुआ हूं? भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि हे पितामह, आपने एक समय पीपल के पेड़ के पत्ते को अपने बाण की नोक से बींध दिया था जिसके फलस्वरूप आपको यह संताप भोगना पड़ रहा है। पीपल के पेड़ को बींधने मात्र की इतनी बड़ी सजा भीष्म पितामह को भोगनी पड़ी तो वृक्ष को काटने की सजा क्या हो सकती है, वह आप अंदाजा लगा सकते हैं। पेड़ों की सेवा करने और उनका पालन करने से परमात्मा प्रसन्न होते हैं और इनकी दुआएं मिलती हैं। इनको कष्ट पहुंचाने व काटने से ऐसी बदुआएं मिलती हैं कि मनुष्य का जीवन नर्क बन जाता है।  हमें इन पेड़-पौधों से वे जड़ी-बूटियां प्राप्त होती है जो जीवनदायिनी होती हैं। अब यह दुखद स्थिति है कि जंगल तो नाममात्र के लिए रह गए हैं, पहाड़ों तक पर लोग वृक्षों व पौधों को उजाड़ रहे हैं। अज्ञान के अभाव में हम जड़ी-बूटियों की और औषधीय गुणों वाले पौधों की पहचान नहीं कर पाते और उन्हें नष्ट कर देते हैं। हमारे ऋषि-मुनियों के आश्रमों की भूमि में ऐसे-ऐसे विलक्षण पेड़-पौधे होते थे कि जो तत्क्षण प्रभाव करने वाले औषधीयगुणों से युक्त होते थे। आज की एजुकेशन इस तरह का ज्ञान नहीं देती। साथ ही यह भी बता देना चाहता हूं कि विदेशों के वैज्ञानिकों ने इस ज्ञान को पकड़ लिया है। अब हमारी इन जड़ी-बूटियों का उपयोग वे कर रहे हैं। वह दिन दूर नहीं कि वे इन्हें अपना पेटेंट भी करा लें। हमें समय आते जाग जाना चाहिए। जो आयुर्वेद हमारी धरोहर है अब उपयोग दूसरे देश कर रहे हैं। -प्रभु कृपा पत्रिका, जनवरी, 2019

General, Ramayan

अहंकार रहित सेवा भाव

घमंड के भाव आ जाने से व्यक्ति का पतन हो जाता है। मुगल बादशाह अकबर ने देवी मां के दरबार में सोने का छत्र चढ़ाया लेकिन वह सोने का ही नहीं रहा, न जाने किस धातु का हो गया। मां ज्वाला जी के भवन पर आज भी सुरक्षित रखा हुआ है। उसकी धातु का ही नहीं पता लगा। इसका कारण बादशाह को घमंड था। उसने छत्र चढ़ाते हुए मां के दरबार में कहा था कि मां तेरे दरबार में बहुत भक्त आते हैं लेकिन किसी ने भी इतना बड़ा सोने का छत्र नहीं चढ़ाया है जितना बड़ा मैं चढ़ा रहा हूं। इतना कहते ही वह छत्र सोने का ही नहीं रहा और देवी मां ने उसे अस्वीकार कर दिया। इस घटना से उस महान बादशाह अकबर का घमंड चूर हो गया और उसने पश्चाताप भी किया। सेवा करो लेकिन मन में घमंड नहीं होना चाहिए सेवा निस्वार्थ भाव से करनी चाहिए। जो सेवा किसी स्वार्थ से की जाती है, उसका फल प्राप्त नहीं होता। भगवान हनुमान जी निस्वार्थ सेवा के महानतम उदाहरण हैं। भगवान हनुमान जी ने भगवान श्रीरामचन्द्र जी की निस्वार्थ सेवा की। इसके बदले में उन्होंने कुछ मांगा भी नहीं। भगवान लक्ष्मण के प्राण बचाने हेतु रात ही रात में संजीवनी बूटी लाए लेकिन इसका श्रेय भी उन्होंने भगवान श्रीराम जी को ही दिया। यदि भगवान हनुमान न होते तो शायद राम-रावण युद्ध का कोई और ही प्रारूप होता। लंका विजय में भगवान हनुमान जी ने अहम् भूमिका निभाई थी। अहिरावण जब भगवान श्रीराम जी व भगवान श्री लक्ष्मण जी को अपनी माया से हरण करके ले गया तब भगवान हनुमान जी अहिरावण को मारकर इन्हें छुड़ा कर लाए थे। माता सीता की खोज करके लंका में आग लगाने वाले भी भगवान हनुमान ही थे। इतना ही नहीं महाभारत काल में भी भगवान हनुमान जी ने सहायता की थी। अर्जुन के ध्वज में स्थापित होकर अपनी शक्ति प्रदान की थी। भगवान श्रीकृष्ण के गोलोक को प्रस्थान करने तक भगवान हनुमान जी की उपस्थिति का वर्णन है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इन्हें कलियुग का अधिकृत देव नियुक्त करते हुए कहा था कि कलियुग में संसार के जीवों के दुख निवारण का कार्य मैं तुम्हें सौंपता हूं। इनकी स्तुति में कहा जाता है- संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलवीरा || जिन्होंने भगवान श्रीरामचन्द्र जी की स्वार्थवश सेवा की, उन्हें भी मनवांछित फल मिला है। अंगद को युवराज पद मिला। विभीषण को लंका का राज्य मिला लेकिन हनुमान जी ने केवल प्रभु के चरणों की भक्ति ही मांगी। इन्हें न किसी राज्य की इच्छा की और न ही बहुमूल्य हीरे-मोती और जवाहरात की । जिस वस्तु में भगवान श्री सियाराम नहीं, उनके लिए वह व्यर्थ ऐसा भाव भगवान हनुमान जी का था। आज ये ही वंदनीय हैं। सभी देवों में सर्वोपरि और अजर-अमर हैं। नव निधि व अष्टसिद्धि से युक्त और इन्हें भक्तों को भी प्रदान करने वाले भगवान हनुमान जी सेवादारों में अनुकरणीय है। भगवान हनुमान जी गुरु के रूप में भी वंदित हैं-‘जय जय जय हनुमान गुसांईं, कृपा करो गुरुदेव की नाईं’। भगवान श्रीराम से भी बड़ा राम का नाम है, ऐसा भगवान हनुमान जी ने कहा है लेकिन भगवान हनुमान जी के नाम स्मरण से बड़े-बड़े कष्ट मिट जाते हैं। मैं जो पाठ आपको प्रदान कर रहा हूं उससे भगवान हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है। -प्रभु कृपा पत्रिका, जनवरी, 2019

General, Ramayan

भगवान श्रीरामचन्द्र जी व माता सीता से सम्बद्ध काल गणना

भगवान श्रीरामचन्द्र जी का इस पृथ्वी पर त्रेतायुग में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा अर्थात प्रथम शरदीय नवरात्र तिथि में हुआ। ये इक्ष्वाकुवंश में महाराज दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में अवतरित हुए। प्रायः कालगणना व तिथि आदि के बारे में लोगों को शंका हो जाती है क्योंकि इनके शासनकाल आदि के विषय में हजारों की संख्या बताई जाती है। यह इसलिए है कि इनका अवतरण आज से दस हजार से भी अधिक वर्षों पूर्व जब हुआ था उस समय वेदों पर आधारित काल गणना का प्रचलन था। जो उस समय एक हजार वर्ष है और वह आज की गणना में एक वर्ष है। अतः यह उक्ति प्रचलित हुई- चौदह हजार वर्ष पर्यन्ता, राज कीन्ह श्री लक्ष्मीकन्ता । कई विद्वानों व शोधकर्ताओं ने इस विषय में कहा है कि भगवान श्रीरामचन्द्र जी का गोलोक गमन 155 वर्ष की आयु में हुआ था। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण ग्रंथ को इस विषय में विश्वसनीय साक्ष्य के रूप में माना जा सकता है क्योंकि ये भगवान श्रीरामचन्द्र जी के समकालीन है। भगवान श्रीरामचन्द्र जी वनवास के दौरान इनके आश्रम में मिले हैं। इसके अतिरिक्त माता सीता अपने वनवास काल में महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में ही रहीं और यहीं पर ही भगवान श्रीरामचन्द्र जी के समक्ष पृथ्वी माता की गोद में समाई। महर्षि वाल्मीकि की रामायण के अनुसार जब श्रीरामचन्द्र जी व माता सीता का विवाह हुआ उस समय भगवान श्रीरामचन्द्र जी की आयु 13 वर्ष और माता सीता की आयु 6 वर्ष है। विवाह के उपरान्त माता सीता व भगवान श्रीरामचन्द्र जी 12 वर्षों तक अयोध्या में साथ रहे। इस अवधि के बीत जाने पर भगवान श्रीरामचन्द्र जी के राज्याभिषेक की घोषणा हुई। लेकिन विधि को यह मंजूर नहीं हुआ और इन्हें वन जाना पड़ा। वन गमन के समय भगवान श्रीरामचन्द्र जी की आयु 25 वर्ष और माता सीता जी की आयु 18 वर्ष वर्णित है। वनवास के समय भगवान श्रीरामचन्द्र जी की आयु 25 व माता सीता जी की आयु 18 वर्ष है। भगवान श्रीरामचन्द्र जी 13 वर्ष तक वनों में माता सीता व भ्राता श्री लक्ष्मण जी के साथ रहे। 13 वर्ष बीत जाने के बाद सूर्पणखा प्रसंग के फलस्वरूप रावण ने माता सीता का हरण कर लिया और उन्हें बंधक बनाकर अशोक वाटिका में रखा। माता सीता का यहां रावण के साथ हुआ संवाद उल्लेखनीय है जो रामायण के अरण्यकाण्ड में वर्णित है। रावण के पूछने पर माता सीता कहती हैं- उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूणां निवेशने, भुंजना मानुषान् भोगान सर्व कामसमृद्धिनी । अभषेचयितुं रामं समेतो राजमंत्रिभिः, परिगृह्य तु कैकेयी श्वसुरं सुकृतेन मे । मम प्रव्राजनं भुतुर्भरतस्याभिषेचनम्, द्वावयायत भर्तारं सत्यसंधं नृपोत्तमम्। मम भर्ता महातेजा वयसा पंचविंशकः, अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते। अर्थात 12 वर्ष तक इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ के महल में रहकर मैंने अपने पति के साथ सभी सुख भोगे हैं। मैं वहां सब मनोवांछित सुख-सुविधाओं से सम्पन्न रही हूं। वन आते समय मेरे पति की आयु 25 वर्ष और मेरे जन्मकाल से लेकर उस समय तक गणना के अनुसार मेरी आयु 18 वर्ष की रही है। उल्लेखनीय है कि माता सीता लंका में एक वर्ष 14 दिनों तक रहीं। इससे यह सिद्ध होता है कि वनों से अयोध्या में वापसी के समय और माता सीता की आयु 33 वर्ष है। वनों से लौटने के बाद एक वर्ष तक ये दोनों साथ-साथ रहे और इसके बाद माता सीता को पुनः वनवास प्राप्त हो गया। जब पुनः माता सीता वनों को गईं तब उनकी आयु 34 वर्ष और श्रीराम जी 41 वर्ष के हैं। माता सीता के वनवास काल के प्रथम वर्ष में ही उनके पुत्रों लव-कुश का | अवतरण हुआ। इनका लालन-पालन व शिक्षा-दीक्षा महर्षि वाल्मीकि के संरक्षण में हुई। 12-13 वर्ष की आयु में इन्होंने भगवान श्रीरामचन्द्र जी के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़ लिया और राम से युद्ध में आमना-सामना होने पर माता सीता को बीच में आना पड़ा। उस समय माता सीता की आयु 45-46 वर्ष है और भगवान श्रीरामचन्द्र जी की आयु 56-57 वर्ष है। माता सीता के भूमि में समा जाने के पश्चात लगभग 100 वर्षों तक भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने पत्नी विहीन जीवनयापन किया और राजा के तौर पर प्रजा का पालन किया तथा पृथ्वी की चारों दिशाओं रामराज्य की स्थापना की। निसंदेह भगवान श्रीरामचन्द्र जी एक आदर्श पुत्र, एक आदर्श भाई, आदर्श पति, आदर्श शिष्य, आदर्श सखा, आदर्श राजा ही नहीं एक आदर्श शत्रु भी हैं। जय रघुनंदन जय सियाराम, हे दुखभंजन तुम्हें प्रणाम। -प्रभु कृपा पत्रिका, अप्रैल 2022

Scroll to Top