Jagadguru MahaBrahmrishi Shree Kumar Swami ji

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गुरु पूर्णिमा

आषाढ़ मास की पूर्णिमा गुरु के चरणों में समर्पित होकर कृतज्ञता प्रकट करने का ऐसा दिवस है जो कालचक्र की सभी तिथियों से सर्वोच्च महत्व रखता है। गुरु पूर्णिमा सद्गुरु के पूजन का पावन पर्व है जिसे व्यास पूजा भी कहा जाता है। इस पूजन के माध्यम से शिष्य सद्गुरु के शरीर में उपस्थित विदेही आत्मा जो परब्रह्म परमात्मा का स्वरूप है, का पूजन करते हैं। ब्रह्मज्ञान का पूजन करते हैं, गुरु पूजा का शास्त्रोक्त विधान है। शास्त्र का अर्थ है-वैदिक साहित्य । शास्त्रों में वर्णित है कि आध्यात्मिक गुरु ईश्वर के समान श्रेष्ठ है। गुरु पूजा अथवा व्यास पूजा का अर्थ है- गुरु को सम्मान, योगदान व भावनाएं प्रदान कर कृतज्ञता प्रकट करना। ‘सकसाद धृतिवान समस्ता शास्त्र’ अर्थात् सभी शास्त्रों में और वैदिक साहित्य में गुरु को भगवान के रूप वर्णित किया गया है। गुरु कभी नहीं कहता कि मैं ईश्वर हूं, शिष्य का कर्तव्य है कि वह गुरु का सम्मान करे क्योंकि यह सम्मान भगवान का सम्मान करना कहलाता है। स्कन्द पुराण के उत्तर खण्ड में उमा-महेश्वर संवाद में भगवान शिव ने कहा है कि वेदान्तों के प्रवक्ता, सर्वश्रेष्ठ रत्नों से सुशोभित चरणकमल वाले सद्गुरुदेव जी की उच्च सिंहासन पर विराजमान करके पूजा करनी चाहिए। गुरु पूजा का शास्त्रोक्त विधान सृष्टि के आरंभ से चला आ रहा है। वैदिक काल में पौराणिक आख्यान यह स्पष्ट करते हैं कि भगवान नारायण ने भगवान ब्रह्मा जी के माध्यम से सृष्टि की रचना व पालन का कार्य किया। इस प्रकार भगवान नारायण अर्थात् भगवान विष्णु से भगवान ब्रह्मा को ज्ञान मिला अतः वे इनके गुरु हुए। गुरु परम्परा के द्वारा भगवान ब्रह्मा से यह ज्ञान उनके मानसपुत्र देवर्षि नारद को मिला और फिर कालान्तर में इसी परंपरा के द्वारा महर्षि व्यास को मिला। यह परंपरा आज भी उसी प्रकार चली आ रही है। इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। वैसे तो व्यास नाम के कई विद्वान हैं लेकिन यह दिन महर्षि कृष्ण द्वैपायन व्यास को समर्पित है जिन्होंने पंचम वेद कहे जाने वाले महाभारत ग्रंथ की रचना की थी। महर्षि वेद व्यास चारों वेदों के प्रथम व्याख्यान करने वाले संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। इन्होंने वेदों का संकलन ही नहीं किया बल्कि 18 पुराणों और 18 उपपुराणों की रचना भी की थी जिनमें अतुलनीय ‘भागवत पुराण’ भी शामिल है। भगवान वेद व्यास ने वेद ऋचाओं को संकलित करके चार भागों में, चार वेदों के रूप में बांटा था अतः इन्हें आदिगुरु भी कहा जाता है। गुरु पूर्णिमा पर्व भगवान वेद व्यास का जन्मदिवस भी है इसलिए इस दिन की जाने वाली गुरु पूजा को व्यास पूजा कहा जाता है। संभवतः प्रथम गुरु पूर्णिमा पर्व की शुरुआत भगवान वेद व्यास की पूजा से ही हुई है। ऐसे साक्ष्य हैं कि इस दिन भगवान वेद व्यास जी ने महाभारत ग्रंथ की रचना पूर्ण की थी और सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘ब्रह्मसूत्र’ का लेखन आरंभ किया था। इस शुभ अवसर पर कृतज्ञ देवताओं ने भगवान वेद व्यास की प्रथम पूजा की थी। भगवान वेद व्यास को भगवान विष्णु का अंशावतार माना जाता है। गुरु पूजन का शास्त्रोक्त, पौराणिक व ऐतिहासिक विधान गुरु पूर्णिमा को गुरु पूजन के लिए मान्यता मिलने से पहले से ही गुरु पूजा का विधान रहा है। यह बात और है कि इस दिन को द्वापर युग में भगवान वेद व्यास को समर्पित करके व्यास पूजा अथवा गुरु पूजा के लिए निश्चित कर दिया गया । त्रेता युग में भगवान श्री रामचन्द्र जी ने गुरु वशिष्ठ से शिक्षा ग्रहण की और उनका पूजन भी किया। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में सर्वप्रथम गुरु की वंदना की – ‘बंदऊ गुरु पद पदुम परागा’। भगवान श्री रामचन्द्र व भगवान श्री लक्ष्मण को गुरु विश्वामित्र जी ने परा और अपरा नाम की शक्तियां प्रदान कीं तथा अपने आश्रम में रखकर दिव्य शस्त्र व अस्त्रों के संचालन की विधि का ज्ञान भी करवाया। भगवान श्री रामचन्द्र जी व भगवान श्री लक्ष्मण जी ने भी कृतज्ञ भाव से उनके यज्ञ की रक्षा की तथा ताड़का-सुबाहु जैसे राक्षसों का संहार कर गुरु पूजन किया और गुरु दक्षिणा प्रदान की। महाराज जनक ने भी मुनि अष्टावक्र का गुरु पूजन किया और शिष्य भाव से ज्ञान प्राप्त किया। इसी प्रकार त्रेता युग में गुरु शिष्य परंपरा के कई महान दृष्टान्त हैं। यहां तक कि भगवान शिव से जब माता सती ने पूछा कि सभी आपको ध्याते हैं लेकिन आप किसकी पूजा करते हैं। तब भगवान शिव ने कहा कि मैं भगवान श्री रामचन्द्र जी की गुरुरूप में पूजा करता हूं। दूसरी तरफ भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्थापना करके पूजा की और कहा कि शिव के समान मुझे कोई भी प्रिय नहीं। भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश को गुरु रूप में साधकों ने पूजा है और शक्तियां तथा वरदान प्राप्त किए हैं यथा- गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥  अर्थात ब्रह्मा, विष्णु, महेश गुरू के रूप में पूजित हैं और ये ही साक्षात परब्रह्म हैं, मैं इन्हें प्रणाम करता हूं। या यूं कहें कि गुरु में ब्रह्मा, विष्णु, महेश समाहित हैं। गुरु ब्रह्मा, विष्णु, महेश की तरह अपने शिष्य को कृपा प्रदान करते हैं। इस दिन गुरु की इस रूप में पूजा की जाती है। साथ ही देवतागण अपने गुरु बृहस्पति और असुरगण गुरु शुक्राचार्य का पूजन करते रहे हैं। यह परंपरा सृष्टि के प्रारंभिक काल से चली आ रही है। देवताओं और असुरों के उत्थान में इन दोनों गुरुओं की महती भूमिका के विषय में हमारे पुराणों और ग्रंथों में विस्तारपूर्वक किया गया है। काल में भी देवताओं, असुरों द्वारा गुरु की पूजा के प्रेरणादायी प्रसंग आते हैं। नचिकेता ने भगवान यमराज की गुरु के रूप में पूजा भक्ति की और ज्ञान प्राप्त किया था। देवर्षि नारद जी भी भगवान ब्रह्मा के मानसपुत्र और शिष्य थे। भगवान हनुमान जी से इस रूप में प्रार्थना की जाती है-‘जय जय जय हनुमान गुसाईं, कृपा करहु गुरुदेव की नाई।’ स्वयं भगवान हनुमान जी को भगवान सूर्यदेव ने गुरु के रूप में ज्ञान दिया था। रामायण काल में गुरु शिष्य परंपरा की साक्षी ऋषिवर अत्रि, अगस्त्य, सुतीक्षण, महर्षि वाल्मीकि, भारद्वाज आदि द्वारा स्थापित वे आश्रम थे जिनकी रक्षा स्वयं भगवान श्री रामचन्द्र जी ने अपने वनवास काल में की थी। द्वापर

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क्यों होते हैं गुम्बद

परम पूज्य सद्गुरुदेव जी ने कहा कि आपने देखा होगा कि मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे में गुंबद होते हैं। ये गुंबद गोलाकार होते हैं और शंकुलाकार भी होते हैं। इनके पीछे जो मकसद है वह मानव शरीर के लिए बहुत लाभकारी है। किसी भी पूजा स्थल पर जो पूजा की जाती है, अजान दी जाती है या घंटे-घड़ियाल बजाए जाते हैं, उनके प्रभाव से जो ऊर्जा उत्पन्न होती है वह तमाम असाध्य रोगों के कीटाणुओं को समाप्त करने में सक्षम होती है। ये गुंबद पूजा स्थल में लोगों द्वारा की गई पूजा व मंत्र पाठ की ऊर्जा को बाहर नहीं जाने देते। जब भी कोई व्यक्ति वहां पूजा के लिए जाएगा और बैठ जाएगा तो उसे वह ऊर्जा स्वतः ही प्राप्त हो जाएगी। इसके प्रभाव से उसके असाध्य रोग भी समाप्त हो जाएंगे। इसलिए पूजा की छत पर गुंबद बनाए जाते हैं।

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ग्रह दोषों का रोगों से संबंध

नवग्रहों का मानवजीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। मानव जीवन इन नवग्रहों की दशा व ग्रहदोष के दुष्प्रभाव के कारण रोगों से ग्रस्त हो जाता है। शिशु के गर्भ से बाहर आने से ही इन ग्रहों की भूमिका शुरू हो जाती है। जिस क्षण शिशु जन्म लेता है उस क्षण जिस ग्रह की रश्मियां उस स्थान पर उपस्थित होती हैं, उसका शरीर उसे आत्मसात् कर लेता है। उस समय मुहूर्त में जिस ग्रह की जैसी उपस्थिति होती है, उसी के अनुरूप ही उसकी कुंडली निर्धारित होती है तथा उसी के आधार पर उसके भावी जीवन का भविष्य व जीवन का संचालन निर्धारित होता है। अर्थात् ग्रहदशाओं व दोषों का प्रभाव जातक के जीवन पर उम्रभर होता है। जिस ग्रह का स्वामित्व जातक की कुंडली में होता है, उसी के गुणों व अवगुणों के कारण ही सुख-दुख, रोग, कष्ट, उन्नति आदि की प्राप्ति होती है। ग्रह-दोषों के कारण विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। सूर्य: सूर्य तमोगुणी ग्रह है। इसका कुप्रभाव मनुष्य के मस्तिष्क अर्थात् मानसिक रोग तो प्रदान करता है साथ ही शारीरिक विकृतियां भी देता है। मनुष्य के दिमाग सहित शरीर का दायां भाग दुष्प्रभावित हो जाता है। यह सिरदर्द, ज्वर, महाज्वर, नेत्र विकार का कारक है। व्यक्ति अपना विवेक खो देता है। शरीर में अकड़न आ जाती है। मुंह में हमेशा थूक बनता रहता है। व्यक्ति को हृदय रोग हो जाता है तथा धड़कन कम या ज्यादा होती रहती है। मुंह और दांतों में रोग हो जाता है। बेहोशी का विकार भी मनुष्य में आ जाता है। चन्द्र : यह जल तत्व प्रधान सतोगुणी ग्रह है जो मनुष्य के रक्त परिभ्रमण को विशेष रूप से प्रभावित करता है। इसके कुप्रभाव से जल, कफ, कृशता, उदर रोग तथा विशेष रूप से स्त्री रोग उत्पन्न हो जाते हैं जैसे मासिकधर्म का गड़बड़ा जाना, स्मृति का कमजोर हो जाना। मिर्गी का रोग हो जाता है। मानसिक रोगों में पागलपन की स्थिति भी बन जाती है। फेफड़े संबंधी रोग हो जाते हैं और बेहोशी की व्याधि लग जाती है। मनुष्य के शरीर का बायां हिस्सा जिस तरफ दिल होता है, कुप्रभावित होता है और हृदय रोग हो जाता है। मानसिक तनाव बना रहता है। इससे मन में घबराहट बनी रहती है। मन में तरह-तरह की शंकाएं व कुविचार आते रहते हैं। विशेषत: आत्महत्या का विचार आता-जाता रहता है। जातक सर्दी-जुकाम से हमेशा ही पीड़ित रहता है। मंगल : यह तमोगुणी ग्रह है और इसका विशेष अधिकार क्षेत्र मनुष्य का सिर है। यह अग्नि तत्व प्रधान ग्रह है। इसके कुप्रभाव से रक्त संबंधी रोग जैसे रक्तअल्पता या अशुद्धि, उच्च रक्तचाप हो जाते हैं। नेत्र, अंधता व वातरोग जैसे-पित्त, वायु,गुर्दे में पथरी का प्रकोप हो जाता है। कर्णरोग, त्वचा रोग जैसे-खुजली, फोड़े-फुंसी, जख्म, चोट आदि से जातक पीड़ित रहता है। बार-बार पेशाब आना, शरीर में कंपन होना भी इसके कुप्रभाव जनित रोग हैं। गठिया रोग भी इसी की देन है। स्त्री जातकों में प्रजनन में अत्यधिक पीड़ा होती है या शिशु जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। बुध : वैसे तो यह सात्विक गुण वाला ग्रह है तथा इसका अधिकार क्षेत्र मनुष्य की गर्दन व कंधा है। इसके शुभ प्रभाव से मनुष्य को व्यापार व लेनदेन के कार्यों में निपुणता प्राप्त होती है तथा भाग्यवर्धन होता है लेकिन इसके कुप्रभाव के फलस्वरूप मनुष्य की संभोग शक्ति का ह्रास होता है। खांसी, तुतलाहट का विकार आ जाता है और सूंघने की शक्ति क्षीण हो जाती है। समय पूर्व ही दांत खराब होकर टूट जाते हैं। इस ग्रह का कुप्रभाव हृदय रोग, कुष्ठ रोग व आंत संबंधी रोग भी उत्पन्न करता है। गुरु (बृहस्पति ) : यह रजोगुणी ग्रह है। इसका अधिकार क्षेत्र मनुष्य का मूत्राशय है। इसके कुप्रभाव से मूत्राशय के रोग तथा फोड़ा-फुंसी हो जाते हैं। कुंडली में गुरु-शनि, गुरु-राहु और गुरु-बुध की युति से श्वास रोग, वायु-विकार, फेफड़ों में दर्द, अस्थमा, दमा, श्वास रोग, गर्दन, नाक व सिर में दर्द रहता है। इसके अतिरिक्त पेचिश, पेट फूलना, कब्ज, रक्त विकार, हड्डियों में दर्द तथा जिगर का रोग भी हो जाता है। शुक्र : यह तमोगुणी ग्रह है तथा इसके दुष्प्रभाव से प्रमेह, मेदवृद्धि, कर्णरोग के अतिरिक्त मुख्य रूप से वीर्य विकार हो जाता है जिससे वीर्य की कमी हो जाती है । यौनरोग उत्पन्न हो जाते हैं तथा कामेच्छा समाप्त हो जाती है। नपुंसकता व इन्द्रिय रोगों से मनुष्य ग्रस्त हो जाता है। त्वचा संबंधी रोग हो जाते हैं। आंतों के रोग के साथ-साथ गुर्दे का रोग भी हो जाता है। जातक के पांवों में तकलीफ होती है तथा अंगूठे में दर्द बना रहता है। ऐसा हो तो यह समझ लेना चाहिए कि शुक्र की दशा है। कई बार तो इसके कुप्रभाव के फलस्वरूप जातक का अंगूठा बिना रोग के ही बेकार हो जाता है। शनि : यह तमोगुणी ग्रह है। हमारी पौराणिक कथाओं में इस ग्रह के कुप्रभाव के विषय में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है कि इसकी दशा से कोई भी नहीं बच पाया है। इसके कुप्रभाव के फलस्वरूप मनुष्य उन्माद से ग्रस्त रहता है। कनपटी की नसों में दर्द रहता है तथा सिर की नसों में तनाव बना रहता है। चिन्ता व घबराहट तो जीवनचक्र का हिस्सा ही बन जाते हैं। समय से पूर्व आंखें कमजोर हो जाती हैं तथा भवों के झड़ जाते हैं। सिर के बाल भी झड़ने लगते हैं। फेफड़ों में सिकुड़न आने लगती है और सांस लेने में तकलीफ होती है। रक्त-अल्पता के रोग के साथ-साथ रक्त में बदबू आने लगती है। उदर रोग हो जाता है तथा पेट फूलने की समस्या विकराल रूप से सामने आ जाती है। राहु : यह तमोगुणी व क्रूर ग्रह है। इसका जातक के पैरों पर अधिकार रहता है। इसके दुष्प्रभाव के कारण इससे मनुष्य में मस्तिष्क विकार, अनिद्रा, मानसिक तनाव, पागलपन, जैसे रोग उत्पन्न हो जाते हैं। मस्तिष्क में पीड़ा व दर्द बना रहता है। नाखून अपने आप टूटने लगते हैं। इस ग्रह की दशा के कुप्रभाव से कोई भी ऐसा रोग हो जाता है जो मनुष्य की मृत्यु का कारण भी बन सकता है। केतु : राहु की तरह यह ग्रह भी तमोगुणी व क्रूर है। इसके कुप्रभाव से मनुष्य को अशुभ भावनाएं, भयानक स्वप्न, दुर्घटना, जलाघात, चर्मरोग, कर्णरोग, बहरापन, रीढ़ की

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विरुद्ध आहार स्वास्थ्य पर वार

प्रायः ऐसा देखा जाता है कि रात किसी पार्टी में गए और अगले सुबह उठे तो पेट बहुत भारी-भारी होता है। खट्टी डकारें, सीने में जलन और उसके बाद उल्टियों का सिलसिला शुरू हो जाता है। यह सिलसिला यहां ही नहीं रुकता है। सिरदर्द, चक्कर और न जाने क्या-क्या होने लगता है। कुछ तो डाक्टर की क्लीनिक पर दो-तीन दिन चक्कर लगाकर ठीक हो जाते हैं लेकिन ज्यादातर लंबे समय तक दवा खाते हैं या लंबी समयावधि तक किसी रोग से ग्रस्त हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि पार्टियों में परोसे जाने वाले व्यंजन विभिन्न प्रकार के होते हैं। इनमें दूध, दही, खमीर, तैलीय, विभिन्न दालों व सब्जियों से बने व्यंजनों के साथ-साथ फल, शीतल पेय, कॉफी, चाय आदि तो होते ही हैं, कहीं-कहीं तो मांसाहार भी होते हैं। आजकल तो चाउमिन, पिज्जा, दक्षिण भारतीय व्यंजन तथा सलाद आदि भी भोजन की सूची में शामिल होते हैं। पार्टियों में मिठाइयों के साथ-साथ आइसक्रीम का भी चलन है। अब होता यह है कि इतनी वैरायटी को देखकर मन यह करता है कि प्रत्येक को चखा जाए। बस यहीं से शुरू होता है विरुद्ध आहार का वार । न केवल पार्टियों में घर में भी इस प्रकार के विरुद्ध आहार से कई रोगों के शिकार हो जाते हैं। क्या होता है विरुद्ध आहार जब हम दो विपरीत प्रकृति वाले भोज्य पदार्थों का सेवन कर लेते हैं और बीमार पड़ जाते हैं तो इस आहार को विरुद्ध आहार कहा जाता है। अर्थात् विरोधी तासीर वाली चीजों को खाने से जो दुष्परिणाम होता है उसे विरुद्ध आहार की श्रेणी में माना जाता है। आयुर्वेद में आहार को चिकित्सा का अंग माना गया है। इसमें यह सुनिश्चित किया गया है कि रोगी पथ्य व अपथ्य का ध्यान रखे। रोग के अनुसार ही आहार ग्रहण करना आयुर्वेद की पहली शर्त है। चरक सूत्र में विरोधी आहार की परिभाषा इस प्रकार दी है कि जो आहार द्रव्य या औषधि दोषों को अपने स्थान से उभार दे लेकिन शरीर से बाहर न निकाले वे सभी आहार-द्रव्य अहितकर अर्थात् विरोधी होते हैं। चरक सूत्र में यह भी कहा गया है कि देह की धातुओं के विपरीत गुण वाले जो द्रव्य शरीर की धातुओं के विरुद्ध होते हैं, उन्हें विरोधी आहार कहा जाता है। ऐसा भी होता है कि सब प्रकार से रुचिकर दिखने वाला भोजन शरीर के स्वास्थ्य को हानि पहुंचा कर रोगी बना देता है। इसका कारण है-आहार अर्थात् भोजन में नौ प्रकार के गुणों का समंवय न होना। ये नौ गुण इस प्रकार हैं-वर्ण, प्रसाद, सुखम, संतुष्टि, सौस्वरयम, पुष्टि, प्रतिभा, मेध और बल। हमारे आहार में इन नौ गुणों का समन्वय, सामंजस्य और पूर्ति होने से संतुलित आहार कहलाता है। यह खाने में अच्छा लगने वाला, पचने वाला और पुष्टिवर्धक होता है। आयुर्वेद के अनुसार कभी भी दो विरुद्ध प्रकृति वाली भोज्य वस्तुओं को एक साथ नहीं खाना चाहिए। जो खाद्य पदार्थ रस- रक्तादि धातुओं के विरुद्ध गुण-धर्म वाले व वात-पित्त-कफ इन त्रिदोषों को पैदा करने वाले हैं तो इनके सेवन से रोगों की उत्पत्ति होती है। चरक सूत्र, वाग्भट की अष्टांगहृदयम्, अष्टांगसंग्रह तथा भावप्रकाश निघण्टु में विरुद्ध आहार के प्रकार बताए हैं। विरुद्ध आहार के प्रकार देश विरुद्ध : किसी भी देश अथवा स्थान की जलवायु के अनुसार भोजन करना चाहिए। शुष्क प्रदेश में सूखे या तीखे अर्थात अधिक मसालेयुक्त भोजन नहीं करना चाहिए। किसी भी दलदली भूमि वाले प्रदेश या स्थान में चिकनाई वाला भोजन नहीं करना चाहिए। यदि ऐसा करते हैं तो यह विरुद्ध आहार कहा जाएगा। काल विरुद्ध : कालानुसार ही भोजन करना चाहिए। सर्दियों में सूखी और ठंडी भोज्य वस्तुएं नहीं खानी चाहिए और गर्मियों के समय तीखी व कशाय भोजन नहीं करना चाहिए। यदि ऐसा करते हैं तो यह विरुद्ध आहार कहलाएगा। अग्नि विरुद्ध : जठराग्नि के अनुसार यदि आहार न मिले तो इसे अग्नि विरुद्ध कहा जाता है। उदाहरणार्थ यदि जठराग्नि मध्यम है और व्यक्ति गरिष्ठ भोजन करे तो इसे अग्नि विरुद्ध कहा जाएगा। मात्रा विरुद्ध : उचित मात्रा में नहीं लिया गया आहार विरुद्ध कहा जाएगा। इस प्रकार कि जैसे शहद और घी बराबर मात्रा में मिलाकर खाया जाए तो यह विरुद्ध आहार है। सात्म्य विरुद्ध : जिसको जैसे आहार की प्रवृत्ति हो गई है, उसे वैसा ही भोजन अनुकूल होगा। यदि नमकीन भोजन खाने वाले की प्रवृत्ति वाले व्यक्ति को मीठा व रसीला भोजन करना पड़े तो यह विरुद्ध आहार है। दोष विरुद्ध : जो आहार व्यक्ति के त्रिदोष अर्थात् वात-पित-कफ को बढ़ाने वाला होवह दोष विरुद्ध आहार कहलाता है। संस्कार विरुद्ध : अनुचित ढंग से पकाया गया भोजन संस्कार विरुद्ध कहलाता है। उदाहरण के तौर पर यदि दही व शहद को गर्म कर लिया जाए तो ये जहरीले हो जाते हैं। कोष्ठ विरुद्ध : जिस व्यक्ति की कोष्ठबद्धता की स्थिति हो उसे थोड़ी मात्रा व कम मल बनाने वाला भोजन देना और शिथिल गुदा वाले व्यक्ति को अति गरिष्ठ और ज्यादा मल बनाने वाला भोजन देना कोष्ठ विरुद्ध आहार कहलाता है। वीर्य विरुद्ध : गर्म तासीर वाली भोजन सामग्री को ठंडी तासीर वाली भोजन सामग्री के साथ खाना वीर्य विरुद्ध कहलाता है। अवस्था विरुद्ध : शारीरिक अवस्था के अनुरूप आहार नहीं करना अवस्था विरुद्ध कहलाता है। कोई व्यक्ति जो परिश्रम, व्यायाम या मैथुन के कारण थका हुआ है और वातवर्धक आहार करता है या जो अधिक सोता है और आलसी है और कफवर्धक आहार लेता है तो यह अवस्था विरुद्ध आहार है। क्रम विरुद्ध : यदि कोई व्यक्ति मल-मूत्र का बिना त्याग किए हुए भोजन करता है, जब भूख न लगी हो तब करता है अथवा भूख मर जाने पर करता है तो उसे क्रम विरुद्ध आहार कहते हैं। परिहार विरुद्ध : वैद्य व चिकित्सक के द्वारा निषेध की हुई भोज्य वस्तुओं को जब कोई व्यक्ति सेवन करता है तो इसे परिहार विरुद्ध कहा जाएगा। उदाहणार्थ जब किसी व्यक्ति को दूध नहीं पचे और वह फिर भी उसका सेवन करे तो यह परिहार विरुद्ध हैं। उपचार विरुद्ध : किसी विशिष्ट उपचार विधि में नहीं खाने योग्य वस्तु को खाना उपचार विरुद्ध कहलाता है। जैसे घी का सेवन करने के बाद ठंडी चीजों का सेवन अथवा पानी पीना। पाक विरुद्ध : दूषित ईंधन से पकाई गई अधपकी, अधिक पकी या जली हुई भोज्य सामग्री का

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किसी भी पूजा, ध्यान, तप से अधिक श्रेष्ठ है सेवा

प्राचीन काल में एक धनवान व्यक्ति एक ब्रह्मवेत्ता संत के आश्रम में पहुंचा और उनके चरणों में प्रणाम करके आश्रम में स्थान देने की विनती की। साथ ही उसने यह भी – अभिलाषा प्रकट की कि वह ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना चाहता है। संत जी को उस पर दया आ गई और उसे आश्रम में रहने की आज्ञा प्रदान कर दी। वह उस आश्रम में रहकर सेवा करता और अपने भोजन की व्यवस्था अपने धन से ही करता था। इस प्रकार सेवा करते हुए कई वर्ष बीत गए और उसका धन समाप्त हो गया। संत जी उसकी सेवा से प्रसन्न थे। उसे परेशान देखकर उन्होंने पास बुलाकर पूछा कि तुम भोजन कहां करते हो। उसने जो सच था वह बता दिया। संत जी ने लंगर की व्यवस्था करने वाले सेवादारों को आदेश दिया कि यह भी आज से लंगर से ही भोजन प्राप्त करेगा। उन सेवादारों को उस व्यक्ति से ईर्ष्या थी क्योंकि संत जी उसे प्रेम करते थे। पहले तो उन्होंने उसे कच्चे आटे की रोटियां खाने को दी और फिर कड़ी सेवा का कार्य भी बताने लगे। वह जैसे-तैसे अपना पेट भरता और दूर जंगल से लंगर के लिए लकड़ियां काटकर लाता था। इस दौरान वह जंगली कंदमूल फल से भी अपना पेट भर लेता था। उन्होंने देखा कि इसे तो कोई असर नहीं हुआ तब उन्होंने उसे अधिक नमक डालकर रोटियां देनी शुरू कर दी। वह व्यक्ति रोटियों को भिगोकर रख देता था और जब उसका नमक निकल जाता तब उन्हें खा कर भूख मिटा लेता था। सेवादारों ने उसे और भी दूर से लकड़ियां लाने की सेवा प्रदान की। लेकिन वह प्रसन्नता से यह कार्य करता रहा। सेवादारों ने रोटियों में बाल मिली हुई रोटियां देनी शुरू कर दी। वह व्यक्ति रोटियों को सुखाकर बालों को निकाल कर खाने लगा। लगातार कड़ी मेहनत और ठीक प्रकार से भोजन नहीं मिलने के कारण वह कमजोर हो गया। लेकिन उसकी सेवा भावना में कोई कमी नहीं आई। इस प्रकार सेवा करते हुए कई वर्ष बीत गए और वह बहुत ही दुर्बल भी हो गया। वह जिस मकसद से आया था वह भी पूरा हुआ। एक दिन जब वह लकड़ियों का गट्ठर सिर पर रखकर आश्रम की तरफ आ रहा था तब जोर से आंधी चलने लगी। इसके फलस्वरूप वह लड़खड़ा कर गड्ढे में गिर गया। गड्ढे में गिरते ही उसके मुंह से निकला कि अभी तो सद्गुरु से कृपा भी प्राप्त नहीं हुई है और यह शरीर गिर भी गया। तभी उसे अपने शरीर में शक्ति का संचार महसूस हुआ और वह प्रयास करने से गड्ढे से बाहर आ गया। जब वह आश्रम में पहुंचा तो देखा कि संत जी संगत व शिष्यों के साथ विराजमान हैं। उन्होंने उसे बड़े प्रेम से अपने चरणों में बिठाया और कहा कि तुमने क्या कहा था कि सद्गुरु की कृपा प्राप्त नहीं हुई और यह शरीर गिर गया। संत जी ने उसके सिर पर अपना हाथ रख दिया। सिर पर हाथ रखते ही उस व्यक्ति को ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हो गई। सद्गुरु ने उसे निःस्वार्थ व सच्ची सेवा का फल प्रदान कर कृतार्थ कर दिया। श्री गुरु साहिब रामदास जी की सेवा सद्गुरु की आज्ञापालन व निस्वार्थ सेवा के कारण एक साधारण मनुष्य भी उच्च पद तक पहुंच सकता है। ऐसा ही एक ज्वलंत उदाहरण है जो आज भी अनुकरणीय है- यह कथा पंजाब के गांव बासरके के जेठा नाम के एक किशोर की है। दानी स्वभाव का जेठा उबले हुए चने बेचकर गुजर बसर करता था। पिता हरिदासजी और माता दयाकौर जी के घर चूनामंडी लाहौर (पाकिस्तान) में जन्मा जेठा सात वर्ष की उम्र में ही अनाथ हो जाने के कारण नाना के गरीब घर में रहता था। जेठा बचपन से ही धार्मिक विचारधारा वाला और साधु-संतों की सेवा करने वाला था। गुरु अमरदास जी की महिमा सुनकर यह किशोर जेठा गुरु साहिब के दर्शनों के लिए गोइंदवाल साहिब पहुंच गया। यहां आकर गुरु के चरणों में ऐसी लगन लगी कि यहीं का होकर रह गया। गुरुजी व गुरुजी की संगत की प्यार से सेवा करते और अपने गुजारे के लिए घुघनियां भाव बेचते, यह किशोर व्यस्क हो गया। सब इन्हें श्रद्धा से जेठा जी कहकर पुकारने लगे। एक दिन गुरु माता मनसा देवी जी ने गुरु अमरदास जी से कहा कि हमारी बेटी बीबी मानी के लिए यदि जेठा जैसा कोई वर मिल जाए तो कितना अच्छा हो। भोले स्वभाव के गुरु साहिब अमरदास जी बोले कि इस जैसा तो परमात्मा ने इसी को बनाया है। इस प्रकार जेठा जी का विवाह बीबी मानी जी के साथ हो गया। गुरु अमरदास जी ने इन्हें अपने बड़े जंवाई श्री रामा जी की तरह ही अपने घर में रख लिया। इनके सेवा भाव को देखकर ‘रामदास’ के नाम से विभूषित कर दिया। एक बार गुरु साहिब ने श्री रामदास जी व श्री रामा जी को बड़ा थड़ा (चबूतरा) बनाने का हुक्म फरमाया। श्री रामदास जी व श्री रामा जी कुछ सेवकों के साथ बड़ा थड़ा बनाने की सेवा में लग गए। जब थड़ा बनकर तैयार हो गया तो गुरुजी बोले यह तो ठीक नहीं बना है, इसे गिराकर दोबारा बनाओ। श्री रामदास जी व श्री रामा जी ने इस थड़े को गिराकर दोबारा बना दिया। अगले दिन गुरु साहिब ने उसे देखकर कहा कि यह ठीक नहीं बना, इसे गिराकर फिर बनाओ ये इसे गिराकर बनाने में लग गए। इस प्रकार अनेक बार बना हुआ थड़ा गिरवाकर बनवाया गया, लेकिन गुरुजी संतुष्ट नहीं हुए। यह सिलसिला 5-6 दिन तक चला। इस प्रकार के व्यवहार से श्री रामा जी व अन्य सेवकों ने सेवा से हाथ खींच लिया। श्री रामा जी ने तो यहां तक कह दिया कि गुरु साहिब काफी बुजुर्ग हो गए हैं अतः सोचने-समझने की शक्ति भी क्षीण हो गई है लेकिन श्री रामदासजी सेवा में लगे रहे। जब उनसे पूछा गया तो नम्रता से उत्तर दिया कि इसमें गुरु साहिब की मेहर है कि मुझ मंदबुद्धि को बार-बार थड़ा बनाने के बारे में नए सिरे से समझाते हैं, लेकिन मुझसे ही भूल हो जाती है। गुरुजी की खुशी में ही मेरी खुशी है। इतना कहकर वे फिर अकेले ही प्राणपण से थड़ा बनाने की सेवा में लग गए।

Ayurvigyan, General

सूर्य ग्रहण और अध्यात्म विज्ञान – सतगुरु वाणी

व्यावहारिक जगत और आधुनिक युग ग्रहण के प्रभाव को वहीं तक परिसीमित मानता है जहां पर ग्रहण दृष्टिगोचर होता है।  सूतक काल भी वहां मान्य नही होता जहां ग्रहण दिखाई नही देता। इस विषय में परम पूज्य सदगुरुदेव जी ने ऐसे अद्भुत रहस्य उद्घाटित किए जहां पहुंचकर ग्रन्थ शास्त्र भी मौन हो जाते हैं।  ज्योतिष और आधुनिक जगत दोनों ग्रहण के खगोलीय प्रारूप की वार्ता करते हैं। ग्रहण के प्रारूप को समझाते हुए परम पूज्य सदगुरुदेव जी ने भगवान राम और हनुमान जी की एक अद्भुत वार्ता का उल्लेख किया।  गुरुदेवजी ने उल्लेख किया कि भगवान हनुमान जी हर विषय के ज्ञाता हैं।  यह सारा ज्ञान भगवान हनुमान जी को भगवान सूर्य ने दिया था। गुरुदेवजी ने एक विलक्षण घटना का उल्लेख किया जिसमें ज्ञान देने वाले ज्ञान लेने वाले से भी ज्यादा विनम्र थे जो कि सामान्य स्थिति से भिन्न है।  यह घटना है भगवान राम और हनुमान जी के वार्तालाप की जिसमें भगवान राम जी गर्व से पूछ रहे हैं और हनुमान जी दंडवत प्रार्थना करके ज्योतिष के विषय में भगवान राम जी को बता रहे हैं।  हनुमान जी ज्ञान दे रहे थे पर अति विनम्र भाव से भगवान राम जी से पूछ रहे हैं कि हे भगवन! आप बताएं मैं किस विषय पर बोलू, आपकी क्या सेवा करूँ ? भगवान राम अवलोकन कर रहे थे कि हनुमान के पास हर विषय का ज्ञान है।  ये सूर्य चंद्रमा को भी अधीन कर सकते हैं।  ब्रह्माण्ड को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं।   हनुमान जी भगवान राम से भी शक्तिशाली हैं। राजा दशरथ के बेटे राम से शक्तिशाली हैं, भगवान राम से नही।   एक राम दशरथ का बेटा,  एक राम घट घट में लेटा (जो कण कण में है)  एक राम है जगत पसारा (जिसने जगत को पैदा किया है)  एक राम है जगत से न्यारा (जो जग से पार है) – इस राम को कोई नही मिटा सकता।   यह राम हनुमान को भी मिटा सकते हैं।  पूरे जगत को मिटा सकते हैं।   भगवान राम देख रहे थे कि हनुमान जी को ज्योतिष एवं अनंत विषयों का ज्ञान लेकर कहीं अहंकार तो नही हो गया ? पर उन्होंने देखा कि हनुमान जी में ज्ञान की वार्ता करते हुए लेश मात्र भी अहंकार नहीं था।   गुरुदेवजी ने समझाया कि ज्योतिष और अध्यात्म दो अलग विषय हैं, ज्योतिष अध्यात्म नही बन सका। ज्योतिष अध्यात्म के बारे में केवल बात करता है।  भगवान राम और हनुमान जी का संवाद भी खगोलीय ज्योतिष का था।   यह विषय मूल तत्व का है, तत्ववेत्ताओं और ब्रह्मवेत्ताओं का है।  बुद्धीजीवियों और ज्योतिष की समझ से पार का विषय है।  सदगुरुदेव जी समझाते हैं कि भगवान राम और भगवान कृष्ण की एक सुई जितनी बात भी हमने नही जानी और ना ही किसी ने लिखी। रामायण और रामचरित्रमानस भगवान राम के प्रारूप का जो समुद्र है उसकी लहर मात्र ही उद्घाटित करते हैं।  जो भगवान वाल्मीकि जी ने प्रगट किया वह भगवान राम के महासागर के लहर की एक बूंद मात्र है। भगवान राम जी हनुमान जी को देख रहे थे और उनसे पूछ रहे थे कि जगत में इतने ज्ञान है पर आप मुझे ज्योतिष की बात ही क्यों बताना चाहते हैं ? भगवान हनुमान ने कहा प्रभु ज्योतिष का ज्ञान प्रत्यक्ष है, तथ्यगत है। आध्यात्म और अन्य विषयों का तो पता ही नही चलता कि अगले पल क्या हो जाए।   इस पर गुरुदेवजी ने उल्लेख किया कि ज्योतिष का ज्ञान तत्थ्यगत है पर सत्यगत नही है।  हम भगवान कृष्ण को मानते हैं कि इतनी रानियां हैं, इतने बच्चे हैं।  यह तथ्य भी नही है, सत्य तो बहुत दूर की बात है।   ज्योतिष के विषय में चर्चा करते हुए भगवान राम हनुमान जी से गर्व से कहते हैं कि मुझे अपरा की बात नही करनी। हनुमान जी दंडवत प्रणाम करके बैठे रहे।  भगवान राम तेज़ आवाज़ में बोले हनुमान तुम सूर्य से यह क्या ज्ञान लेकर आ गए ? यह तो शिक्षा है, यह ज्ञान मन से है। भगवान राम जी डांट रहे हैं कि हनुमान तुम यह क्या सीख कर आ गए ?  क्यों गए थे यह ज्ञान लेने ?  किस से पूछ कर गए ? हनुमान जी दंडवत प्रणाम कर के सुन रहे थे।  हनुमान जी ने आंख उठाकर नहीं देखा।   अध्यात्म का ज्ञान मन और बुद्धि से पार है।  चन्द्रमा मन स्वरुप है, सूर्य आत्मा स्वरुप है। चन्द्रमा का सारा प्रभाव मन पर पड़ता है।  जिसका चन्द्रमा कमज़ोर होगा वह अहंकार की बात करेगा।  जिसका सूर्य प्रगाढ़ होगा वह अपरा प्रकृति की बात ही नही करेगा।  ग्रहों का प्रभाव दुर्गा मां को छोड़कर भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश सभी देवी देवताओं पर भी पड़ता है।   आगे सदगुरुदेव जी ने अभूतपूर्व ज्ञान दिया कि जो सूर्य ग्रहण का प्रभाव है वह जहां ग्रहण दृष्टिगोचर नही होता वहां ज्यादा लगता है। यह सोच, समझ, मन, बुद्धि से पार का विषय है।   सदगुरुदेव जी ने समझाया – बरसात होती है एवेरेस्ट पर तब एवेरेस्ट पर रहने वाले चिंतित हो जाते हैं कि नियमित उपयोग का पानी कहां से आएगा।  वो बरसात का जल नही पी सकते।  पानी की सबसे ज्यादा कमी ऊंचाई पर जल के स्त्रोत्र के पास होती है और सबसे ज्यादा बीमारियाँ वहां होती है जहां पानी जाकर ठहरता है।  दूर जहां जाकर पानी ठहरता है वहां का पानी सबसे खराब होता है।   जहां सूर्य ग्रहण लगा हुआ है या दृष्टिगोचर हो रहा है वहां प्रभाव बहुत कम होगा। जहां नही लगा वहां ज़्यादा होगा, वहां ज्यादा रोग आएंगे, वहां ज्यादा कष्ट आएंगे।    जब महाभारत हुआ, सूर्य ग्रहण लगा। युद्ध खत्म हुआ, तब सूर्य ग्रहण लगा। तब सबसे ज़्यादा पाप वहां लगा जहां ग्रहण नही लगा था।  युद्ध वाले तो सब उसी क्षण मुक्त हो गए।   आगे पूज्य गुरुदेवजी ने समझाया सबसे ज्यादा बीमारियां तब होंगी जब गर्मी आने वाली है या जाने वाली है, बीच में कम होती हैं।  ज्यादा ठंड में नही होती, ज़्यादा गर्मी में नही होती। शिमला में बरसात हो रही है, आप दिल्ली में बैठे हैं तो सबसे ज़्यादा ठंड का ख़राब प्रभाव वहां पड़ेगा जहां बरसात नही हुई।  खासी, ज़ुकाम बीमारियाँ वहां ज़्यादा होंगी जहाँ बरसात नही हुई। तेज़ बरसात से छत पर प्रभाव नही होगा, पानी निकल जायेगा

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Decline of Gurukul System

India has always boasted of a rich tradition in the area of learning and education since ancient times. It is well known that people from other parts of the world such as Europe, the Middle East etc came to India to get a quality education. One of the famous educational systems practised in India in the ancient times was The Gurukul System. Why gurukul culture went extinct in india? The Gurukul system was an ancient form of education in India, where students lived with their teachers (Gurus) in an ashram-like environment and received holistic education. This system was prevalent in India for several centuries, but it gradually declined and eventually disappeared. There are several reasons for the decline of the Gurukul system in India: British colonialism: The British colonization of India had a significant impact on Indian education systems. The British introduced a modern system of education that was modeled on the Western education system, which led to the decline of traditional Indian education systems like the Gurukul. Lord Macaulay, the then Governor General Of India beleived that in order to rule over India they would have to destroy the ancient and traditional aspects of Indian Education System and replace it with the British Education in order to make the population easy to be colonized. Industrialization: The rapid industrialization of India post colonization also contributed to the decline of the Gurukul system. The focus shifted from traditional education to more modern, specialized education that could support the needs of industrialization. Urbanization: The shift of population from rural to urban areas also led to the decline of the Gurukul system. As the population shifted to urban areas, traditional systems of education were replaced by more modern forms of education that could meet the needs of an urban population. Lack of patronage: The Gurukul system relied heavily on the patronage of wealthy individuals and kings. As the political and economic systems changed in India, the patronage for traditional systems of education declined, leading to the eventual extinction of the Gurukul system. In summary, the decline of the Gurukul system was the result of several factors, including British colonialism, industrialization, urbanization, and a lack of patronage. While the system is scarcely prevalent in India, it has left a lasting impact on Indian culture and education.

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