Jagadguru MahaBrahmrishi Shree Kumar Swami ji

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ऋतुकाल में स्त्रियों के लिए अद्भुत नियम

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, नारी जीवन में ऋतुकाल की महत्ता बहुत मानी जाती है और शास्त्रों में इस काल में नारी के लिए बहुत से कार्य निषिद्ध किए गए हैं जबकि आधुनिक नारी व्यवहार व दैनिकचर्या में लापरवाही बरतती है। जो कि हमारे ऋषियों-मुनियों ने उनके लिये निर्दिष्ट किए हैं। तो क्या इस उल्लंघन या अवहेलना का कोई दुष्प्रभाव नारी के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है ? परम पूज्य गुरुदेव : आपने अति महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा है। नारी को अवश्यमेव शास्त्रोक्त नियमों का पूर्ण श्रद्धा से पालन करना चाहिए। महाभारत की कथा सबको मालूम है कि कैसे ऋतु स्नान के काल में द्रौपदी को जनसभा में बुलाकर अपमानित किया गया और इसका अन्त कितना महा विनाशकारी विध्वंसकारी हुआ। ऋतु स्नान काल में अगर स्त्री तुलसी के पौधे को पानी दे दे तो पूरी जिंदगी वह तुलसी का पौधा फल-फूल नहीं सकता और अगर वह स्त्री गुलाब के पौधे को पानी दे दे तो पूरी जिंदगी उस गुलाब के पौधे पर फूल नहीं लगेगा। अगर कोई सांप किसी ऋतु स्नान वाली स्त्री को देख ले तो वह सांप अन्धा हो जाएगा। उस समय स्त्री के अन्दर जो आवेग ऊर्जा होती है वह खाद्यान्नों पर भी दुष्प्रभाव डालती है। जैसे जब पापड़ बन रहे हैं, अगर ऐसी स्थिति वाली स्त्री उसे देख लें तो वह पापड़ भूना जाने के बाद लाल रंग का हो जाएगा। अगर ऐसी स्त्री अपने हाथों से आटा गूंथ कर सोन चिड़िया को खिला दे तो खाते ही वह चिड़िया मर जाएगी। उन दिनों में (ऋतुकाल में) स्त्री के अन्दर से कोई दिव्य ऊर्जा निकल रही होती है। प्रभु कृपा से नकारात्मक शक्तियों का निष्कासन हो रहा होता है।

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रोगनाशक है बांसुरी की तान

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, बांसुरी की तान से कौन-कौन से रोगों का इलाज हो सकता है? परम पूज्य गुरुदेव : यह मानव कल्याण का प्रश्न है। पृथ्वी की उत्पत्ति अनहद नाद से हुई थी। अनहद नाद को ॐकार भी कहा गया है। ऋषि-मुनियों के अंतर में जिस परमात्मा की ध्वनि का अनुभव हुआ है वह नाद ही है। बांसुरी की ध्वनि में जो सातों स्वर हैं वे उसी तरह हैं। भगवान विष्णु जिनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, जब उन्होंने स्वयं श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया तो उन्होंने केवल बांसुरी के द्वारा ही मानव की सोई चेतना को जगाया। आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि भगवान श्रीकृष्ण ने सबसे पहले गाय को, स्त्रियों को यह संगीत सुनाया। क्योंकि जिस धरती पर गाय और स्त्रियां प्रसन्न रहती हैं वहां पर किसी प्रकार के दुःख का प्रारंभ ही नहीं होता। हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव की उत्पत्ति गाय से मानी है। जब मानव का पतन होता है तब वह बंदर की योनि में जाता है और नीचे गिरता जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने केवल गाय को प्रसन्न किया, स्त्रियों को प्रसन्न किया। स्त्रियों को कभी धन या किसी अन्य तरह से प्रसन्न नहीं किया जा सकता, वे प्रेम के वशीभूत होती हैं और गाय भी प्रेम के वशीभूत होती है। भगवान श्रीकृष्ण तो कोई भी वाद्य या ऐसा संगीत चुन सकते थे जिससे मानव चेतना को जगाया जा सके, लेकिन उन्होंने सिर्फ बांसुरी को चुना। जिसका परिणाम हम देख रहे हैं कि भारत में भक्ति है, प्रेम है, जबकि विदेशी संस्कृति में कोई भाई को भाई नहीं समझता, माता-पिता को कुछ नहीं समझते। बच्चे माता-पिता से भी साल में एक दिन मिलने जाएंगे, ऐसा कोई दिन बना देंगे जो ‘मदर डे’ या ‘फादर डे’ होगा। भारत की धरती पर जो प्रेम है, मर्यादा है वह अद्भुत है। भगवान श्रीकृष्ण ने बांसुरी की तान से अनेक रोगों का नाश किया। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया था, उस समय किसी को अर्थराइटिस, रूमोटिज्म, हाईपरटेंशन, थाइराईड, कैंसर, ट्यूमर जैसे कोई रोग नहीं थे। अगर कोई व्यक्ति भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके उसी की लय में उनकी भक्ति के संगीत में खोकर बांसुरी बजाएगा या सुनेगा तो उसके नाना प्रकार के रोगों का अंत होगा और उसके आने वाले रोग भी समाप्त हो जाएंगे, ऐसा ऋषि-मुनियों द्वारा जाना गया है।

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नीम के अद्भुत रहस्य

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, नीम किन-किन रोगों में प्रयोग होता है तथा उससे किन-किन रोगों का उपचार होता है ? परम पूज्य गुरुदेव : अगर कोई व्यक्ति जिन्हें टी.बी. है, अगर तीन माह नीम की छाया में सो जाये तो उसका टी.बी. रोग भी ठीक हो जायेगा। ऐसा नीम की हवा में प्रभाव है। जो भी व्यक्ति नीम की पत्तियों का प्रयोग करता है, नीम के फलों का सेवन करता है, उसे यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि नीम के पत्तों को संध्या के समय नहीं तोड़े। इस जगत में नीम, पीपल तथा वट वृक्ष ऐसे पेड़ हैं जिसके नीचे रात-दिन सोया जा सकता है, रहा जा सकता है। अन्यथा ऐसा दूसरा कोई भी वृक्ष नहीं है। यह नीम एलर्जी के लिए, खांसी, कफ, बालों, त्वचा, लीवर, किडनी, कैंसर, ट्यूमर, टी.बी. के लिए रामबाण औषधि है। ऐसा कोई भी रोग नहीं है जिसमें नीम का प्रयोग नहीं होता है। जो भी व्यक्ति नीम का सेवन करता है तो उन्हें इन बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि अलग-अलग रोगों के लिए अलग-अलग तोड़ने की विधि है। इनके अलग-अलग तोड़ने का समय है तथा अलग-अलग तोड़ने का मंत्र है। जिन व्यक्तियों को ट्यूमर है, कफ है, एलजी है, अस्थमा है तो उन्हें नीम दोपहर 2 बजे के बाद तोड़ना चाहिए। जो व्यक्ति मंत्र के साथ नीम के पत्ते उचित समय पर तोड़ता है तथा सुबह उबालने के बाद सेवन करता है, ऐसे व्यक्ति उक्त रोगों से मुक्ति पा जाते हैं। जिन स्त्रियों के बाल गिरते हैं या जिनके आँखों के नीचे कालिमा आ जाती है। वह सुबह के समय मंत्र के साथ नीम के पत्ते को तोड़ते हैं तथा केले एवं टमाटर के रस के साथ नीम की पत्तियों के रस को मिलाकर आँखों के नीचे अर्थात् कालिमा वाली जगह पर रसों को लगाते हैं तो पंद्रह दिन के अंदर उनका कालापन दूर हो जायेगा। इसी प्रकार नीम का अलग-अलग रोगों में अलग-अलग उपयोग है। अर्थराइटिस, गैस तथा रूमाटिज्म जैसे रोगों में भी नीम का प्रयोग होता है। कैंसर का इस धरती पर कोई इलाज नहीं है परंतु सिर्फ नीम से ही कैंसर रोग से मुक्ति पाई जा सकती है। इस नीम में दिव्य गुण हैं, औषधीय गुण हैं। अगर किसी व्यक्ति को नींद नहीं आती है तो ऐसे व्यक्ति सुबह नीम के तीन पत्ते तोड़ लें और तीन तुलसी के पत्ते तोड़ लें। तत्पश्चात् उन पत्तों को तकिये के नीचे रख लें तथा मंत्र ‘तद्विद्धि प्रणिपातेन…’ का तीन बार उच्चारण करें तो ऐसे व्यक्ति को पन्द्रह मिनट में नींद आ जायेगी। ऐसे व्यक्ति को किसी चिकित्सक के पास जाने की या नींद की दवाई का प्रयोग करने की जरूरत नहीं है। एड्स को दूर करने के लिए नीम का प्रयोग किया जा सकता है। लेकिन उसके लिए दैवीय आह्वान करना जरूरी है। इसके लिए सूर्य का मंत्र है। जिस भी व्यक्ति को वायरल अटैक करेगा या एड्स होगा तो उसका सूर्य ग्रह सदा कमजोर होगा। सूर्य की जो आभा है तथा शनि का जो प्रकोप है एवं राहु-केतु की जो दशा है, उसकी वजह से वायरस होता है या एड्स होता है। अगर सूर्य के मंत्र के साथ नीम का प्रयोग करेंगे तो एड्स जैसे रोगों से भी मुक्ति प्राप्त करेंगे।

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सात दिनों के गोपनीय रहस्य

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, विभिन्न दिवसों का वैज्ञानिक महत्व क्या है जैसे कि कहा जाता है कि मंगलवार और शनिवार को अगर कोई विशेष गतिविधि अपनाई जायेगी तो अधिक फल मिलेगा। भगवान हनुमान जी भगवान शनिदेव जी ईश्वर के रूप में माने जाते हैं तो हम इन्हें दिवस में कैसे बाँध सकते हैं ? परम पूज्य गुरुदेव : भगवान बजरंग बली, भगवान शनिदेव मंगलवार के अधिष्ठाता हैं। सूर्य प्रतिदिन समान रूप से प्रकाश देता है, पेड़-पौधे समान रूप से हवा देते हैं, ऐसा वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, यह पाश्चात्य संस्कृति पर आधारित है। जनवरी, फरवरी, मार्च यह विदेशी संस्कृति पर आधारित है और विदेशी संस्कृति में कहीं भी देवी-देवताओं का स्थान नहीं है। वह किसी आध्यात्मिक शक्ति एवं देवी-देवता को आधार मानकर नहीं चलते हैं। वह नहीं मानते हैं कि किसी जनवरी का कोई देवता है। जैसे हम देखते हैं कि हमारे देश या विश्व में कहीं भी अस्पताल बन रहा है या सड़कों का निर्माण हो रहा है, हवाई जहाज बन रहे हैं, रेलें चल रही हैं, बसें चल रही हैं। आम लोग यह सोचते हैं कि यह किसी व्यक्ति ने बनाया होगा परंतु हमारे देश अथवा समूचे विश्व में अलग-अलग विभाग के अलग-अलग मंत्री होते हैं। उसी तरह यह जो वार हैं, इनके भी अलग-अलग देवता हैं। जैसे सोमवार के भगवान शिव है, मंगलवार के भगवान बजरंगबली हैं। जो व्यक्ति मंगलवार को मांस-मदिरा का उपयोग करता है, मंगलवार को नाई के पास जाकर बाल कटवाता है तो अगर वह अपने शरीर की जाँच करवायेगा तो देखेगा कि उसका इ एस आर उसी दिन से हाई हो गया है और उसके शरीर में कैल्शियम पैंथोनेट की कमी हो गई है इसके साथ-ही-साथ उसे एलर्जी जैसा रोग हो जायेगा। अगर कोई व्यक्ति शनिवार या मंगलवार को तेल को अपने शरीर पर लगाता है तो उसे एलर्जी होगी, त्वचा के रोग होंगे। जो व्यक्ति रविवार के दिन नौशादर का उपयोग करेगा या कैल्शियम का प्रयोग करेगा उसके शरीर में वह पदार्थ जायेगा। जिस प्रकार भगवान् बुद्ध, महावीर या बड़े-बड़े नेताओं के जन्म दिवस हैं। ठीक उसी तरह इन देवी देवताओं के भी दिवस होते हैं। ये इन दिनों के मालिक होते हैं, अधिष्ठाता होते हैं। ये वहाँ उस दिन उपस्थित होते हैं। अगर कोई व्यक्ति शनिवार के दिन काला वस्त्र पहनेगा तो उसे कभी एलर्जी नहीं होगी, रूमाटिज्म नहीं होगा, उन्हें कष्ट कारक तत्व नहीं होंगे। अगर कोई व्यक्ति मंगलवार के दिन पीले वस्त्रों को पहनता है तो उसे नाना-नाना प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है। इसी तरह अलग-अलग देवी-देवताओं के अलग-अलग रंग हैं, खाद्य पदार्थ हैं। जैसे शुक्रवार को अगर कोई खट्टी चीज खायेगा तो उसका पेट खराब हो जायेगा। अगर व्यक्ति देवी-देवता के विधान को समझकर, उस ढंग से अपने जीवन में प्रयोग करेगा तो उसे किसी भी प्रकार के रोग नहीं होंगे। अगर कोई व्यक्ति सोमवार के दिन दाल-चावल-सब्जी एक साथ खायेगा तो उसे रूमाटिज्म प्रारंभ होना शुरू हो जायेगा। अगर वही व्यक्ति बुधवार को ऐसा भोजन करता है तो उसका रूमाटिज्म खत्म हो जायेगा। अगर कोई व्यक्ति सोमवार के दिन काले वस्तु का उपयोग करता है तो उसके शरीर में थाईमिन हाईड्रो क्लोराइड की कमी हो जायेगी। अगर कोई व्यक्ति बुधवार के दिन पालक-पनीर का सेवन करता है तो उसे किडनी स्टोन हो जायेगा। इस विज्ञान को समझने के लिए काफी मशक्कत की आवश्यकता है, काफी समय की आवश्यकता है क्योंकि किस-किस व्यक्ति का जन्म दिवस क्या है, उसे कौन-कौन से रंग के वस्त्र पहनने चाहिए अथवा कौन-कौन से दिन में क्या-क्या खाना चाहिए, किस दिशा में कौन-कौन से दिन जाना चाहिए, इन सभी का ध्यान रखकर ही विभिन्न प्रकार के कष्टों से बचा सकता है। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, अगर हम भगवान शनिदेव का पूजन सोमवार, मंगलवार, बुधवार को करते हैं तो क्या इस पूजन का वह महत्व नहीं होगा जो शनिवार के दिन पूजन करने से होता है ? परम् पूज्य गुरुदेव : यह प्रश्न मानव कल्याण के लिए बहुत ही सारगर्भित प्रश्न है। जैसे सभी नदियां सागर में मिलती हैं। ठीक उसी तरह समस्त देवी-देवता का प्रादुर्भाव प्रभु से है। जिन ऋषि-मुनियों ने गहरी साधना करके, तपस्या करके ज्योतिष शास्त्र का निर्माण किया, अनेक ग्रंथों का निर्माण किया है। उन ग्रंथों के अनुसार पूजन करने के कुछ विधि-विधान हैं। ऋषि-मुनियों ने देवी-देवताओं की तपस्या करने, साधना करने, पूजन करने के बाद ये नियम बनाए। क्योंकि ऋषि-मुनि इन देवी-देवताओं के महत्व को जानते हैं। जैसे कुंभ के मेले हैं। बाहरी रूप से वैज्ञानिक यह समझेंगे कि इस समय स्नान करने से कोई फायदा नहीं है जबकि संत-महात्मा जानते हैं कि इन दिनों में कितने देवी-देवता यहाँ विराजमान होते हैं। इसी प्रकार दिन एवं स्थान का भी महत्व है। इन दिनों अगर कोई कुंभ स्नान करता है तो उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। इसी तरह मंगलवार का जो दिन है वह बजरंगबली का है। जिन ऋषि मुनियों ने भगवान बजरंगबली को जाना है, उनके शरीर कांप जाते हैं। उन्हें ऐसे-ऐसे प्रकाश दिखाई देते हैं कि उनका सूक्ष्म शरीर प्रकाशमय हो जाता है। कुछ चीजों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं जाना जा सकता है। उदाहरण स्वरूप भगवान राम ने रावण को मारने के लिए एक नियत समय की प्रतीक्षा की, भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के उपयुक्त समय की प्रतीक्षा की। उसी तरह उपयुक्त समय में ही पूजन करना चाहिए। वैसे सच यह भी है कि भगवान शनिदेव की किसी भी दिन पूजन करेंगे तो भगवान शनिदेव उतना ही फल देंगे, परन्तु शनिवार के दिन भगवान शनिदेव की पूजा करने से विशेष लाभ प्राप्त होगा।

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वास्तु ज्ञान का अति दुर्लभ सत्य

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि अपने घरों, व्यावसायिक स्थानों आदि को वास्तु के हिसाब से बनाना चाहिए इससे कार्य सिद्ध होते हैं परंतु बहुत से लोगों का तर्क है कि उनके घर वास्तु के हिसाब से नहीं बने हैं, फिर भी उनके कार्य सिद्ध हो रहे हैं। इसके पीछे क्या रहस्य है? परम् पूज्य गुरुदेव : आपने जन-कल्याण के लिए आधुनिक वर्ग के लोगों की, युवा वर्ग की, बुद्धिजीवी वर्ग की जो समस्या रखी है वह बहुत उत्तम है यह सत्य है कि व्यक्ति इन सब चीजों को नहीं मानते हैं। इसके पीछे कुछ कारण है। जैसे हमारी भाषा है, हमारा व्यवहार है, वह हमें संस्कारों से मिला है। इस तरह हमारा वातावरण बना है। आजकल सभी समझते हैं कि मैं मुसलमान हूँ, मैं हिन्दू हूँ, मैं सिक्ख हूँ, मैं ईसाई हूँ। यह कोई नहीं मानते हैं कि मैं मानव हूँ। उनके मन में यह भावना रहती है कि मैं अपने-अपने धर्म के लिए कुछ करूंगा। इतने उत्तम शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी उनके अंदर यह भावना नहीं आती है कि मैं मानवता के लिए कुछ करू। आजकल ऐसे कम व्यक्ति हैं जो मानवता के लिए कुछ करते हैं। धर्म का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अर्थ होता है धारण करना। जब कोई व्यक्ति विशेष ज्ञान को ग्रहण करता है, जब व्यक्ति ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जानता है, ज्ञान के रहस्यमय तत्व को जानता है तो उसे जानने को ही धर्म कहा जाता है, धारण करना कहा जाता है। इतने शैक्षिक वातावरण में भी किसी शिक्षण संस्थानों में इसके बारे में कुछ नहीं बताया जाता है। इसको बताने के लिए उस विषय में शिक्षक का निपुण होना अत्यन्त आवश्यक है। जिस वातावरण में मनुष्य रहता है, वहाँ जो उनके गुरुजन है, धर्माधिकारी हैं, उस पर आधारित होता है। जो व्यक्ति सनातन प्रवृत्ति के हैं, उनके माता-पिता उन्हें शुरू से ही इस सभी का बोध करायेंगे। अगर व्यक्ति सनातन धर्म में आने के बाद किसी और गुरु से संबंधित हो जाये। अगर ऐसे गुरू के पास शिष्य-चला जाता है तो वह गुरू कहता है कि वह ही केवल परमात्मा है, केवल उसी को माने तथा किसी देवी-देवता को नहीं माने। अगर व्यक्ति किसी वास्तु की पूजा करेगा या देवी-देवता की पूजा करेगा तो उस गुरू का महत्व कम हो जायेगा। अतः ऐसे गुरु ऐसा ज्ञान अपने शिष्य को नहीं बताते हैं। हिन्दू धर्म वाले मुस्लिम धर्म की अच्छाइयों को जानना नही चाहते हैं। ठीक उसी तरह मुस्लिम धर्म वाले हिन्दू धर्म की अच्छाइयों को जानना नहीं चाहते हैं। व्यक्ति का जो दृष्टिकोण है, व्यक्ति किस ग्रह में पैदा होता है, बाकी उसकी जन्मकुंडली क्या है, इस पर उसका आधा जीवन आधारित होता है और आधा जीवन आधारित होता है कि वह किस घर में रहता है। अगर किसी व्यक्ति के ग्रह की स्थिति इतनी सशक्त है, इतनी पूर्ण है कि उस पर गुरू (बृहस्पति) की कृपा है तो उस पर कोई भी बाधा नहीं आयेगी, कोई भी संकट नहीं आयेगा। यह उसके पूर्व जन्मों का प्रताप है। आज हम जिन्हें ऊँचे-ऊँचे पदों पर देखते हैं, वह उनके पूर्वजन्मों का फल है, तप का प्रभाव है। आज जो दावा कर रहे हैं कि वास्तु के हिसाब से मेरा घर नहीं है परंतु सभी कार्य सिद्ध हो रहे हैं, वह अहंकार वश ऐसा कहते हैं। सत्यता यह है कि उनके घर में कष्ट है, रोग हैं क्योंकि जो व्यक्ति शांत प्रवृत्ति का है, शांत है, वह कभी भी दावा नहीं करेगा। वह वैज्ञानिक प्रक्रिया से गुजर कर जीवन यापन करेगा। अगर कोई व्यक्ति वास्तु देवता की पूजा-अर्चना कर व्यवहार करेगा तो उसके सारे कार्य सफल होंगे। जो व्यक्ति वास्तु के अनुसार दुकान, फैक्ट्री, बिजनेस को चलायेगा, उसके व्यापार में काफी धन की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति तत्ववेत्ता संत के पास जाकर वास्तु के मर्म को समझकर अपना कार्य प्रारंभ करता है तो ऐसे व्यक्ति के सारे कार्य सिद्ध होते हैं, फलदायी होते हैं। ऐसे व्यक्ति शतायु होकर जीते हैं एवं धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की दृष्टिकोण से जीवन जीते है। उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि जब किसी व्यक्ति के घर का मुख्य द्वार उत्तर दिशा में हो या पूरब दिशा में हो तो उसके सारे कार्य सिद्ध होते हैं और अगर यह स्थिति न हो तो कोई न कोई विघ्न आ जाते हैं, इसके पीछे क्या रहस्य हैं? परम पूज्य गुरुदेव : यह संपूर्ण विश्व के कल्याण का प्रश्न है। हमारा जीवन ग्रह स्थिति पर आधारित है। हमारा जन्म किस ग्रह स्थिति में हुआ, यह जीवन का आधा हिस्सा है। इससे ज्योतिष आचार्य या आयुर्वेदाचार्य उसकी ग्रह दशा देखकर जीवन का आकलन करते हैं। अगर व्यक्ति के ग्रह-दोष ठीक न हों और उसमें वास्तु दोष भी अधिक हों तो व्यक्ति का जीवन अनंत दुःखों से घिर जाता है। अगर किसी व्यक्ति का टायलेट, बाथरूम पूरब दिशा की ओर होगा तो उसके घर में काफी संकट होगा, काफी रोग आएंगे या किसी के घर का मुख्य द्वार दक्षिण की ओर होगा तो उसके घर में काफी रोग आएंगे। उसके घर में ऐसे-ऐसे रोग आएंगे जो मृत्यु जैसे दुःखदायी होंगे। इसी तरह से एक अनंत विज्ञान है जिसमें कई चीजें देखी जाती हैं जैसे ‘उसकी मिट्टी कैसी है, घर की आभा कैसी है, उसमें पिता का स्थान कहां है, पुत्र या पुत्री कहां रहते हैं, संबंधियों का बिस्तर कहां है, बेड का सिर कौन सी दिशा में है, जल का स्थान कहां है आदि। जिन व्यक्तियों के घरों में ये दोष दूर हो जाते हैं उन्हें किसी तरह की कोई कमी नहीं रहती। जो तत्त्ववेत्ता संत हैं, ऋषि-मुनि हैं वह अपने आत्मीय तल से वहां रहने वाली आत्माओं से साक्षात्कार करते हैं और उससे वार्तालाप कर वहां से हटा सकता है और दिव्य आत्मा को निमंत्रित कर सकता है। ऐसे जो वास्तु शास्त्र के विशेषज्ञ हैं उनमें जब इस प्रकार की आभा आती है तो उसके अन्दर दिव्य आत्मा का आगमन होता है। प्रभु कृपा से इस रहस्य को जानने के लिए काफी लंबे समय की आवश्यकता होती है। फिर भी मैं ऐसे योग बताऊंगा जिसे करने से व्यक्ति अपने नये घर का निर्माण

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यमुना जल का वैज्ञानिक महत्व

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, जैसी माँ गंगा की दिव्यता है। वैसी मां यमुना की भी है। आप कृपया बताएं कि माँ यमुना के तट पर आकर कौन-कौन से रोगों से मुक्ति मिलती हैं? परम् पूज्य गुरुदेव : आपने जनकल्याण के लिए, समाज की जो समस्या रखी है, उनको सामने रखते हुए जगत के लिए जो अनूठा, जिज्ञासा भरा प्रश्न का अनुरोध किया है, वह निश्चय ही अर्थपूर्ण है। इस पहलू को समझने के लिए हमें कई आयामों को देखना पड़ेगा। तभी इसके महत्व के सार को जाना जा सकता है। सबसे पहले हमें इसके प्रारंभिक रूप में जाना पड़ेगा। जैसे आम जगत् में जो श्रेष्ठ पुरुष हैं या ऊँचे-ऊँचे पदों पर बैठे व्यक्ति हैं वे जब अपने स्थान का चुनाव करेंगे तो वे निकृष्ट स्थान का चुनाव नहीं करेंगे। वे उस स्थान को चुनेंगे जो अति उत्तम लगेगा। व्यक्ति अपने भ्रमण के लिए, मानसिक शांति के लिए उत्तम स्थानों का ही चयन करता है। भगवान् विष्णु ने जगत् कल्याण के लिए लीला करने के लिए वृंदावन की धरती को चुना। अगर इन्होंने इस स्थान का चयन किया, जहाँ उन्होंने बाल क्रीडा की, जहाँ से उनका अत्यंत लगाव रहा तो यह निश्चय ही परम् गहन रहस्य की बात है। यह धरती परम कल्याणकारी है, दिव्यता रखती है। जहाँ भगवान् के चरण पड़े, उस धरती की महिमा उसी तरह रहती है जैसे पूर्व में थी अर्थात् उनके समय में थी। भगवान् श्रीकृष्ण ने माँ यमुना के स्थान को चुना था, उन्होंने इस धरती का स्पर्श किया था, उन्होंने इस स्थान पर अपनी आभा दी, जल विहार किया तो उसका जो महत्व है वह हमेशा एक सा रहेगा। यह जो यमुना की बाहरी गंदगी है वह बाहरी परिवेश से संबंध रखती है, वातावरण से संबंधित है, सरकार से संबंधित है। इस पवित्र स्थान में जहाँ भगवान् विष्णु इतने वर्षों तक रहे हैं, वैसे स्थान की महत्ता किसी दूसरे स्थान की अपेक्षा अधिक है। भगवान् श्रीकृष्ण ने यमुना में स्नान किया है। इसलिए इस स्थान की जो दिव्यता है वह कभी खत्म नहीं होगी। इसका जल साफ नहीं है या यहाँ के रहने वाले लोगों की स्थिति अच्छी नहीं है, यह बाहरी वातावरण है, वह भगवान् की दिव्यता से संबंधित नहीं है। यह जो यमुना का बाहरी प्रारूप है, वह यहाँ के विभाग के कारण है। अगर यहाँ के विभाग के मंत्री चाहें, संचालक चाहें तो इसके प्रारूप को वे सुन्दर बना सकते हैं। अगर इसे स्वच्छ नहीं रखा जा रहा है तो यह हमारे लिए दुर्भाग्य की बात है। जब व्यक्ति यहाँ आता है तो अद्भुत आभा से युक्त हो जाता है। यमुना जी में स्नान करता है तो अद्भुत शांति मिलती है। अगर कोई व्यक्ति इसकी आभा को आँखों से देखना चाहेगा तो नहीं देख पायेगा क्योंकि यह दिव्यता का विषय है। यमुना के तट पर माँ यमुना के सिमरण के बाद भगवान् श्रीकृष्ण तथा राधा का जो सिमरण करता है ऐसे व्यक्ति को हजारों-करोड़ों वर्षों की तपस्या का फल मिलता है, क्योंकि यहाँ पर भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्यता प्रस्फुटित होती रहती है। इस बात को आप इस तरह समझें कि हमारी माँ जब बूढ़ी हो जाती हैं। तो वह तब भी हमारे लिए माँ ही रहती है। ठीक इसी प्रकार यमुना जी के गंदा होने से माँ यमुना का महत्व कम नहीं हो जाता है। माँ यमुना के दर्शन मात्र से ही जन्मों-जन्मों का फल प्राप्त होता है। अगर कोई व्यक्ति मानसिक अवसाद से ग्रस्त है, उसके मस्तिष्क में अवरोध है, वह तनाव से ग्रस्त है तो वैसा व्यक्ति अगर यमुना के किनारे आकर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का सिमरण करता है, तो केवल एक दिन के सिमरण करने से उसके मानसिक अवसाद, तनाव देखते-ही-देखते क्षण भर में खत्म हो जायेंगे।

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गंगा जल का वैज्ञानिक महत्व

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, गंगा जल का आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। हमारे हिन्दू संस्कृति के लोग गंगा को एक देवी के रूप में, एक माँ के रूप में स्वीकारते हैं। लेकिन आजकल की जो आधुनिक पीढ़ी है, वह गंगा को केवल साधारण नदी मानते हैं। गुरुदेव यह बताने की कृपा करें कि गंगा जल का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से क्या महत्व है? परम् पूज्य गुरुदेव : इस पृथ्वी पर जितनी भी नदियाँ हैं उनकी धारा का प्रवाह तथा गंगा नदी की धारा का प्रवाह एकदम विपरीत है। जिस दिशा में गंगा का प्रवाह है, उस दिशा में किसी भी नदी का प्रवाह नहीं है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर आप किसी नदी में हड्डी डाल देंगे तो वह वैसी की वैसी रह जाता है जबकि गंगा नदी में अगर हड्डी डाल देंगे तो वह हड्डी गलकर जल में विलीन हो जाती है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर किसी मुर्दे को गंगा में डाल देंगे तो मुर्दे से किसी भी प्रकार की दुर्गंध नहीं आयेगी। इसके अलावा कुछ मंत्रों का उच्चारण गंगा जल के द्वारा ही संभव है। जो व्यक्ति गंगा जल का सेवन नियमित करता है, उससे उसके हृदय को ताकत मिलती है एवं विभिन्न प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। अगर किसी आदमी को ल्यूकोड़मा है जिसका कोई इलाज नहीं है। ऐसे व्यक्ति अगर कुलंजना की जड़, मैनमिश की जड़ तथा बेरीगेटाकेना की जड़ को गंगा जल में रख कर पीस लें तथा उस स्थान पर लगायें, जिस स्थान पर ल्यूकोडुमा हुआ है तो पाँच-छः माह के अंदर ही वह रोग से छुटकारा पा जायेगा। त्वचा संबंधी अगर किसी को रोग हैं जैसे फोड़े-फुंसी, एग्जिमा आदि तो अगर नीम के पत्ते तथा चंदन को गंगा जल में पीस कर उक्त स्थान पर लगा लेगा तो त्वचा संबंधी रोग दूर हो जायेगा। गंगा जल का ऐसा प्रभाव है कि इस पर पूरे ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, माँ गंगा के स्नान करने से किस प्रकार के रोगों का उपचार होता है? इसके जल से किन-किन फलों की प्राप्ति होती है? परम् पूज्य गुरुदेव : आज अगर भारतीय भूमि पर शांति है यहां लोगों में आपसी प्रेम है तो वह तीन कारणों से है-गंगा, गीता तथा गायत्री। इनकी कृपा से यह सारा जगत प्रकाशमय है। अगर गंगा पृथ्वी पर न रहे तो पूरी पृथ्वी ऐसी हो जाएगी जैसे शरीर से आत्मा निकल जाती है। वैसे तो गंगा देखने से जल के समान प्रतीत होती है लेकिन इसके कुछ आह्वान मंत्र हैं। अगर कोई व्यक्ति गंगा के किनारे रात दो बजे गुरुमंत्र के बाद ग्यारह बार माँ गंगा के स्त्रोत का उच्चारण करेगा तो वह इक्कीस दिनों में ही माँ गंगा की अनुभूति करने लगेगा और अगर वह इकतालीस दिन इसका सिमरण करेगा तो माँ गंगा के साक्षात् दर्शन करने में सफल होगा। माँ गंगा से मन चाही मुराद पा सकता है पर वह नकारात्मक सोच का व्यक्ति न हो। कोबरीक के वृक्ष की लकड़ी कोई उपयोग में नहीं आती, उसके पत्ते कोई पशु-पक्षी भी नहीं खाते हैं। मगर सुबह के समय इसके फल को अगर गंगा जल में रख कर गंगा स्त्रोत (कवच) के बाद कोई उस गंगा जल का सेवन करता है तो उसका शरीर काँति से पूर्ण हो जाएगा। उसे धन की कभी कमी नहीं होगी, ऐसे परिवार में कभी क्लेश नहीं होगा एवं पति-पत्नी के बीच कभी तनाव नहीं होगा। अगर कोई व्यक्ति एड्स, कैंसर जैसे भयानक रोग से ग्रस्त है तो वह अगर चालीस दिन तक ऐसे जल का सेवन करेगा तो वह भी ठीक हो जाएगा। ऐसी माँ गंगा एवं कोबरीक फल की महिमा है। ऐसे-ऐसे ऋषि-मुनि गंगा तट पर बैठे हैं। जो देखने में गरीब लगते हैं परंतु इनमें कुछ ऐसे हैं जो साधन संपन्न होते हुए भी माँ गंगा के तट पर भगवान् गणपति, माँ लक्ष्मी, माँ गंगा, भगवान् शिव, भगवान् विष्णु एवं भगवान् ब्रह्मा का सिमरण करते रहते हैं और उन्हें प्रभु की कृपा प्राप्त होती है। जो भी व्यक्ति अपना पूजन शिवलिंग पर करता है तो उसे हजार गुणा फल मिलता है परंतु जो व्यक्ति अपने पूजन को गंगा स्नान कर गंगा के किनारे करता है, उसे अरबों-अरबों वर्षों का फल मिलता है एवं अनेक प्रकार से दैवीय कृपा की प्राप्ति होती है।

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भगवान श्रीकृष्ण के माखन चुराने का रहस्य

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, बाबा नंद एवं माँ यशोदा के यहाँ नौ लाख गायें हुआ करती थीं, उनके घर में मक्खन की प्रचुरता थी। फिर भी भगवान श्रीकृष्ण गोपियों के घर जाकर मक्खन क्यों चुराया करते थे ? परम् पूज्य गुरुदेव : यह अत्यंत मनोरम, भाव प्रधान एवं भक्तिपूर्ण, प्रशंसनीय प्रश्न है। भगवान की लीलाओं को जानने के लिए अनंत अनंत शास्त्रों का अध्ययन करना पड़ता है। आम मानव जब इस संसार में आता है तो वह कर्मों के दंड को भुगतने के लिए संसार में जन्म लेता है। लेकिन भगवान का अवतार जब इस धरती पर होता है तो वह अपने भक्तों का उद्धार करने, कल्याण करने के लिए होता है। अधर्म का नाश करके धर्म को स्थापित करना – यह भगवान् का मूल उद्देश्य होता है। भगवान् श्रीकृष्ण के समय में अर्थात् जहाँ-जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण ने विचरण किया, वहाँ जो भी ग्वाल-बाल थे, गोपियाँ थीं, वे सभी पिछले जन्म में असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी थे। उन्होंने अनेक जन्मों तक प्रभु से कामना की थी, ‘हे प्रभु हमें अपने चरणों में स्थान दो।’ ये सारे पूर्व जन्मों में ऋषि-मुनि थे। जब इन ऋषि-मुनियों का भगवान के साथ जन्म हुआ तो भगवान् ने उनके हृदय के वास्तविक अर्थों को जानने के लिए ऐसा मायाजाल रचा। वे यह जानना चाहते थे कि किन्हें प्रभु के प्रति समर्पण है तथा किनके हृदय में कोई लोभ है या नहीं है। जो भक्त आत्मा होगी, वह जितना देगी, उसके हृदय में और अधिक विशालता आयेगी। सद्गुरु भगवान् नारायण यह देखना चाहते थे कि ये सभी पूर्व जन्मों की तरह कार्य कर रहे हैं अथवा नहीं। भगवान श्री कृष्ण के समय मक्खन का व्यापार किया जाता था। वैसे इन गोपिकाओं को मालूम था कि भगवान श्रीकृष्ण अवतारी पुरुष हैं। साधारण मनुष्यों को अपने पिछले जन्म का स्मरण नहीं रहता है परंतु ऋषि-मुनियों को पिछले जन्मों का स्मरण रहता है। अतः भगवान् श्रीकृष्ण इन गोपियों अर्थात् पूर्व जन्म के ऋषियों द्वारा दिये गये वचन की परीक्षा लेने के लिए उनकी जो प्रिय वस्तु मक्खन है, उसको चुरा लिया करते थे। उन्हें मालूम था कि यह भगवान् की लीला है उन्हें इस मक्खन चोरी की क्रीड़ा में आनंद आता था। भगवान देखते थे कि कौन मुझे तन-मन-धन से प्रेम करता है। यह उनकी लीला थी क्योंकि भगवान की एक-एक क्रीड़ा अर्थ रखती है। वे अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें कुछ देने के लिए लीला करते थे क्योंकि जो सद्गुरु के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पित करता है, उसे समस्त चीजों की प्राप्ति होती है। वे ग्वालों एवं गोपियों के दुःखों को दूर करने के लिए ऐसा करते थे।

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पर्वतीय क्षेत्रों के अद्भुत प्रभाव

गुरुदास : परम् पूज्य गुरुदेव, जैसे कि माना जाता है कि उत्तरांचल (पर्वतीय प्रदेशों) में एक ऊर्जा प्रवाहित होती है। इस ऊर्जा से किन-किन रोगों का निदान और उपचार होता है। आप कृपा करें। परम् पूज्य गुरुदेव : जो व्यक्ति इण्डस्ट्री के वातावरण में या प्रदूषण के वातावरण में रहता है, उन्हें छाती के रोग, गले के रोग, आँखों के रोग, कानों के रोग, त्वचा संबंधी रोग, श्वास संबंधी रोग हो जाते हैं। ऐसे व्यक्ति को नाना-नाना प्रकार के रोग घेर लेते हैं और इन सब रोगों का कोई उपचार भी नहीं है। आज इतनी एलर्जी जो हो रही है उसका मुख्य कारण प्रदूषण है। मुंबई, दिल्ली अथवा बड़े-बड़े शहरों में जायेंगे तो छोटे-छोटे बच्चे जो एक माह के हैं, दो माह के हैं, तीन माह के हैं, उन्हें निमोनिया, एलर्जी हो रही है, ट्यूमर हो रहे हैं, कैंसर हो रहे हैं। यह सब केवल प्रदूषण के कारण हो रहा है। लेकिन उत्तरांचल की धरती पर प्रदूषण का नामोनिशान तक नहीं है। इतना सुंदर, शुद्ध और स्वच्छ है कि जो व्यक्ति रोग से ग्रस्त हैं वे यहाँ आकर रहेंगे तो बिना चिकित्सा के ही ठीक हो जाएंगे क्योंकि इन पौधों, औषधियों में जो देवीय गुण हैं। इनकी आभा है, इनकी जो हवा है, इन्हें छूकर जब यह हमारे श्वास में जाती है तो नाना प्रकार के रोगों का अंत कर देती है। अगर कोई व्यक्ति इण्डस्ट्री के एरिया में रहता है, वह मात्र एक महीना उत्तरांचल की धरती पर रहे तो उसका ई एस आर का लेवल ठीक हो जायेगा। टी एल सी डी एल सी ठीक हो जायेगा तथा उनका हिमोग्लोबिन का लेबल भी बढ़ जायेगा। अगर व्यक्ति को श्वास के रोग हैं। अथवा जो व्यक्ति स्टीराईड मेडिसिन तक ले रहे हैं, उन्हें लेने की आवश्यकता नहीं होती। हर मानव को चाहिए कि उत्तरांचल की धरती पर आये। यहाँ आकर देवी-देवताओं के महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों का भ्रमण करें, रसास्वादन करे और दैवीय कृपा का आशीर्वाद भी प्राप्त करें। इस सुन्दर, स्वच्छ एवं शुद्ध वातावरण में अपने तन और मन को स्वस्थता प्रदान करें। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, उत्तरांचल की धरती पर जो दिव्य वातावरण है, यह जो दिव्य स्थान है, उसका रोगों के निदान तथा उपचार में बहुत बड़ा महत्व है। हम सप्त ऋषि सरोवर के घाट पर बैठे हैं। इस सप्त ऋषि सरोवर के दिव्य वातावरण में किस प्रकार के रोगों का उपचार होता है? आप कृपा करें। परम् पूज्य गुरुदेव : इस दिव्य भूमि का महत्व है कि यहाँ भगवान् नारद मुनि, सभी सप्तऋषि और अन्य कई देवी-देवता यहाँ आकर साधना कर चुके हैं। आज भी बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, तपी तपस्वी यहाँ आकर साधना करते हैं। और कई-कई ऋषि-मुनि ऐसे हैं जिन्होंने कई जन्मों से यहाँ तपस्या की है, साधना की है। इस धरती का यह प्रभाव है कि इस धरती के आभामंडल में जो भी आत्मा आ जाती है, उसके धर्म, अर्थ, काम संबंधी सभी दोषों का, सभी रोगों का निवारण होता है। जो भी इन महात्माओं के सानिध्य में आ जाता है, इनके आशीर्वादों से ही रोग से ही उन रोगों से मुक्त हो जाता है, जिन रोगों का आधुनिक चिकित्सा जगत् में कोई उपचार नहीं है। यहां ऋषि-मुनियों का इतना आशीर्वाद और प्रभाव है कि जो आम मानव हैं, पापी प्राणी हैं, जिस मानव ने निकृष्ट काम किए हैं, वह भी अगर इस धरती पर आ जाता है तो उसे भी प्रभु की कृपा से पुण्य की प्राप्ति होती है। यहां जितनी भी प्रकार की जड़ी-बूटियाँ हैं, उसका तो अपना महत्व है ही परंतु साथ ही उन ऋषि-मुनियों का अधिक महत्व है जिसकी कृपा से उन जड़ी-बूटियों में दिव्यता आती है, आभा आती है। अगर आयुर्वेद की जड़ी-बूटियों में ऋषि-मुनियों का आशीर्वाद न हो, प्रभाव न हो तो ये जड़ी-बूटियाँ मौन हैं, कुछ कार्य नहीं कर सकती हैं। गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, उत्तरांचल की भूमि पर कौन-कौन सी दिव्य औषधियाँ है? परम् पूज्य गुरुदेव : वैसे तो विश्व में जितनी भी प्रकार की औषधियाँ है, उसका पचास प्रतिशत् भाग उत्तरांचल की धरती पर अवतरण हुआ है क्योंकि विश्व में जितने भी ऋषि-मुनि, जितने भी दिव्य संत हैं उनमें पचास प्रतिशत् संतों का उत्तरांचल की धरती पर आगमन हुआ है। उनके चरण पड़े हैं। इस धरती की जो आभा है, वह अपने-आप में दिव्य है, अनूठी है। वैसे सफाई के दृष्टिकोण से अनेक स्थान है लेकिन दिव्यता की दृष्टि से इस धरती की जो महिमा है, वह सभी ऋषि-मुनियों ने गाई है, ग्रंथों में वर्णित है। इसलिए पृथ्वी के जितने भी आध्यात्मिक लोग हैं वे इस धरती पर भ्रमण करने, पूजा करने, तीर्थयात्रा के दृष्टिकोण से आते रहते हैं। इस धरती पर इतनी दिव्य औषधियां है जिसका वर्णन करना अत्यंत कठिन है। इस धरती पर जितने भी तरह के घास हैं, वृक्ष हैं, वे सारी औषधि हैं। ऐसी कोई भी जड़ी-बूटी नहीं है जिसमें दिव्य गुण न हो, जो कोई-न-कोई रोग को ठीक न करती हो। इसको जानने के लिए ऋषि-मुनियों के द्वारा जो मंत्र हैं, उसे उच्चारण करके औषधियों को तोड़ा जा सकता है। क्योंकि इसमें कई ऐसी-ऐसी जड़ी बूटियां हैं जो स्वयं बोलती हैं कि मुझे इस रोग के लिए उपयोग किया जाये। ऐसी कितनी ही जड़ी-बूटियों का चिकित्सा शास्त्र में वर्णन भी नहीं है। लेकिन ऋषि-मुनि इनके मंत्रों द्वारा या भाव जगत् के द्वारा इन्हें पहचान सकते हैं क्योंकि यह जड़ी-बूटियाँ भाव तल में रहती हैं। जब ऋषि-मुनि भावातीत अवस्था में चले जाते हैं तब जड़ी-बूटियाँ स्वयं बोलती हैं कि मुझमें गुण है, मुझे इस प्रकार से तोड़ा जाए और मेरा इस प्रकार से प्रयोग किया जाए। ये दिव्य औषधियाँ हंसती हैं, बोलती हैं। ये हमारे दुःखों का निवारण करती हैं, हमारे रोगों को खत्म करती हैं। इसमें सारी प्रकार की आभा है। जो भी व्यक्ति सिर्फ इस उत्तरांचल की धरती पर आकर प्रणाम भी कर लेता है तब भी उसके रोगों का यह धरती अंत करने वाली है। जो भी कोई इन औषधियों को मंत्रों द्वारा तोड़ने जायेगा तो वह देखेगा कि इन जड़ी-बूटियों में किसी में सफेद ऊर्जा, किसी में हरी तथा किसी में पीली ऊर्जा निकलती है। क्योंकि ये जड़ी-बूटियां मन के पार के जगत में रहती है, ये भावातीत तल में रहती है, ये आत्मिक तल

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पूर्वजों का जीवन में महत्व

गुरुदास : परम पूज्य गुरुदेव, हमारे पूर्वजों का आधार क्या है? परम पूज्य गुरुदेव : यह प्रश्न जगत कल्याण के लिए तथा बड़ा ही सारगर्भित व रहस्य की जिज्ञासा से परिपूर्ण है। आधुनिक जगत में युवा वर्ग, विज्ञान व अनेक प्रकार के धार्मिक व मनोवैज्ञानिक व्यक्तियों द्वारा बार-बार इसकी खोज की गई है। आत्मा सदैव एक रस, एक जगह रहती है तो फिर लोक-परलोक, शरीर बदलना या पितृदोष क्या है? इसका रहस्य क्या है? इस पर बड़े-बड़े वैज्ञानिकों, आधुनिक युग के व्यक्तियों तथा शिक्षार्थियों द्वारा विवेचना हुई है। इस पर सभी की अलग-अलग राय है। इस प्रश्न को केवल वे ऋषि जान सकते हैं जो शरीर के पार जाते हैं और शरीर के रहस्य को जानते हैं। आत्मा वास्तव में आती-जाती नहीं है। जैसे अगर हमारे शरीर को जला दे, नष्ट कर दें या पीड़ा पहुंचाए तो हमारी आत्मा को कष्ट नहीं होता। हमारे तन के द्वारा मन को कष्ट होता है। मन के साथ चित्त वृत्तियां होती हैं। नाना प्रकार के मन पिण्डों का रूप धारण करते हैं। जब भी शरीर का जन्म होता है तो आत्मा के साथ मन, बुद्धि और ऐसे नाना प्रकार के जो क्रिया कलाप हैं, भौतिक तत्व हैं जो अदृश्य तत्व हैं। उनका समावेश होता है। इस तरह यह चित्त द्वारा शरीर में आता जाता है। जैसे कई बार हम स्वप्न में अन्य-अन्य लोकों में चले जाते हैं या समुद्र में घूमते हैं या ऐसे-ऐसे स्थानों पर जाते हैं जहां पहले कभी नहीं गए होते। यह मन के द्वारा या मन की जो सूक्ष्म इन्द्रियां हैं उनके द्वारा होता है। जो ब्रह्मवेत्ता सत्य को जानकर ऋषि-मुनियों द्वारा सारगर्भित ब्रह्म को जान लेता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता, वह कभी इस लोक में नहीं आता। लेकिन जो मानव ब्रह्म तत्व को नहीं जानता, प्रभु के तत्व को नहीं जानता वह इसी जन्म में, इसी लोक में बार-बार लौटते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने भी इसके बारे में गीता में लिखा है, “जो भी अतृप्त आत्माएं होती हैं, अतृप्त मन होते हैं, अतृप्त इन्द्रियां होती हैं वे अपनी कामना की पूर्ति के लिए बार-बार आती हैं।” कुछ व्यक्ति तो ऐसे हैं जो शरीर छोड़ते हैं तो अपने घरों के आसपास ही रहते हैं। या अपनी दुकानों के पास रहते हैं। वे किसी भी योनि में जा सकते हैं, किसी भी शरीर में जा सकते हैं। ऐसे-ऐसे आधुनिक मनोवैज्ञानिकों द्वारा यह जाना गया है। अतृप्त आत्माएं (मन) फिर दूसरे के शरीर में आकर दुःख भी देते हैं और सुख भी देते हैं और नाना प्रकार के कष्टों से मुक्ति भी देते हैं। ऐसा ऋषि-मुनियों द्वारा प्रत्यक्ष जाना गया है। श्राद्ध के दिनों में या पवित्र स्थानों में या अमावस या पूर्णमासी के दिनों में जो स्त्री-पुरुष रति क्रिया में ग्रस्त होते हैं, उन्हें नाना-नाना प्रकार के रोगों से ग्रस्त होना पड़ता है, ऐसा ऋषियों द्वारा जाना गया है। यह शास्त्रों का मत है कि जो शास्त्रों द्वारा बताए गए मार्ग पर चलते हैं, प्रभु कृपा से उन्हें सभी रोगों से मुक्ति प्राप्त होती है। एक सत्य कथा है – एक बार एक आदमी ने काफी मेहनत करके एक अच्छी दुकान बनाई, लेकिन उसका बेटा लायक नहीं था। उस व्यक्ति की मृत्यु हो गई तो उसके बेटे ने दुकान संभाली। कुछ समय बाद देखते हैं कि एक कुत्ता आता है। वह दुकान के बाहर बैठा रहता है। लड़का बार-बार उस कुत्ते को मारता, कुत्ता नहीं जाता। लड़का फिर उस कुत्ते को डंडा मारता है पर कुत्ता नहीं भागता। ऐसा करते-करते एक दिन लड़के ने कुत्ते को ऐसा मारा कि उसकी मृत्यु हो गई। उसी समय एक तत्ववेत्ता संत वहां पहुंचे। उन्होंने कहा-“आपने यह क्या किया, यह तो पूर्व जन्म में आपके पिता थे। क्योंकि आपने कभी भी अपने पिता का कहना नहीं माना। उनका ध्यान सदैव दुकान और आप पर लगा रहता। वे आपकी रक्षा के लिए तथा आपको देखने के लिए दुकान के आगे बैठा करते थे कि आप दुकान ठीक से चलाते हैं या नहीं। ”  जिसका अंत समय में धन में या वासना में ध्यान रहता है, वह नीच योनि में भी जा सकता है, ऐसा शास्त्रों में वर्णित है।

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